बाज़ार के अखाड़े में भाषा का फ़ैसला होना है!

प्रियंकर

भाषाओं की दुनिया में हो रही उथल-पुथल पर यह एक अच्छा लेख हो सकता था, पर इसे इसकी नाटकीय शैली और भावपूर्ण तक़रीर झाड़ने के उत्साह ने कमज़ोर कर दिया। बुल्ले शाह, वारिस शाह और बाबा शेख फ़रीद को पंजाबी से कौन निकाल रहा है और कौन निकाल सकेगा? किसी माई के लाल में इतनी हिम्मत नहीं है। सो ऐसे संकेत ही नासमझी भरे लगते हैं।

उर्दू हिंदुस्तान की भाषा है। हमारे साझेपन की सबसे शानदार मिसाल। तुलसीदास की मानस के अलावा हिंदुस्तान का आम आदमी सम्भवतः सबसे ज्यादा उर्दू शेर ही उद्धृत करता है, जाति-धर्म निर्विशेष। उर्दू की दुर्दशा के भी वही कारण हैं जो हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं की दुर्दशा के हैं। उर्दू के लिए हम सबके मन में बेचैनी और फ़िक्र है।

राजभाषा के रूप में हिंदी की स्थिति, जिसे अक्सर एक ‘ऐडवांटेजियस’ स्थिति मान कर हथियार पैने किये जाते है, उससे हिंदी को क्या फ़ायदा हुआ है? अंग्रेज़ी की भूमिका पर कुछ भी बोले बिना कुछ लेखक-पत्रकार किशोरों को लजाने वाले उत्साह के साथ हिंदी पाठकों से इस तरह मुखातिब होते हैं मानो उर्दू की दुर्दशा के आरोपियों से लोहा ले रहे हों। इस ‘प्लेन’ पर आकर मामला कुछ-कुछ पनचक्कियों को राक्षस मानने जैसा हो जाता है।

भाषा की लड़ाई इस समय ‘पैशन’ के नहीं, ज़रूरत के - उपयोग के - उपकरणों के सहारे लड़ी जा रही है। जहां फ़ैसला होना है, वह सबसे बड़ा अखाड़ा है बाज़ार। ऐसा लगता है, मानो बाज़ार की नीयत ही भाषा की नियति गढेगी।

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मैं एड़ी में लगे तीर से मर रहा हूं

रवींद्र व्यास

आपने दुखती रग पर हाथ रख दिया है। अभी पाकिस्तानी शायर अफ़ज़ाल अहमद को पढ़ रहा था। हिंदी की बेहतरीन पत्रिका पहल (45) ने सालों पहले इस शायर पर विजय कुमार के संपादन में एक खास पुस्तिका छापी थी। सयोग से यह मेरे ऑफिस की दराज में रखी हुई थी। इसमें शामिल अफ़ज़ाल अहमद की एक नज्म कदीम तलवारों की जंग में एक पंक्ति आती है- मैं एड़ी में लगे तीर से मर रहा हूं। अब इस पाकिस्तानी शायर की एक नज़्म में यह जो पंक्ति है, कहां से आयी है, ज़रा ग़ौर फ़रमाएं। दोस्तो, ज़ेहन पर थोड़ा जोर देंगे तो पाएंगे कि यह कृष्ण की एड़ी में लगे तीर से पैदा हुआ दर्द है। तो ये है साहित्य की दुनिया, जहां कोई भी अपनी बात कहने के लिए कहीं से भी बिंब, प्रतीक, रूपक, रंग और ख़ुशबू हासिल कर सकता है। और यदि इसमें तंग नज़र होगी, तो ज़ाहिर है भाषा ही नहीं हर तरह की स्पेस सिकुड़ती चली जाएगी। हिंदी में ही शमशेर की कविताओं का पाठ आप किस तरह से करेंगे? सुदीप बैनर्जी की कविताएं पढि़ए, उन्होंने अपनी कविता में कितनी ख़ूबसूतर ज़बान हासिल की है, जिसके असर में लीलाधर मंडलोई लिखते हैं। और यदि पापुलर कल्चर से ही मिसाल देना हो, तो गुलज़ार के गीतों को पढ़ें-सुने या उनकी गैरफ़‍िल्‍मी कविताओं को देखे।
टोपी-दाढ़ी और तिलक-चोटी (कहानीकार प्रकाशकांत के शब्द) वालों के बढ़ते दबदबे से एक दिन हमारी इस धड़कती-धधकती ख़ूबसूरत भाषा का सत्यानाश होना ही है।

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सब भाषा की राजनीति है बाबू

पंजाब की भाषा क्‍या है? पंजाबी चलती है, गुरुमुखी में। हिंदी चलती है, देवनागरी में। अंग्रेज़ी भी थोड़ी-बहुत। पचास साल पहले ऐसा नहीं था। पंजाबी तो तब भी थी, लेकिन लिपि उर्दू वाली थी, जिसे अब शाहमुखी कहा जाता है और जो अब सरहद के परली तरफ़ ही चलती है। जितने बुज़ुर्ग बचे हैं, उनसे बात कर लीजिए, कलम हाथ में देकर लिखवा लीजिए। न हिंदी निकलेगी, न पंजाबी। उर्दू ही होगी वह। शायर, अदीब, साइंसदां, मिस्त्री-मज़ूर, अमली-अफ़ीमची, सारे उर्दूदां। अख़बार उर्दू के। ग्रैफिटी उर्दू की। वह नस्ल यहां से वहां हो गयी। ख़ूनख़राबा हुआ। बंटवारा हुआ। घर-बार, खेत-खलिहान, पास-पड़ोस, सब बदल गये। ज़बान नहीं बदल पायी। पूर्वी पंजाब में भी उर्दू चलती रही। पर साठ का दशक आते-आते यह सीन बदल गया। उर्दू कम होती गयी। अब यहां लगभग नहीं है। तीस-पैंतीस बरसों में एक ज़बान काठ हो गयी। दायें से बायें लिखने वाली लोकप्रिय ज़बान की जगह गुरुमुखी वाली पंजाबी आ गयी।
(हालांकि उसका विकास पहले से था, लेकिन आम चलन में नहीं थी वह।)

है आसां नहीं 'दाग़' यारों से कह दो
कि आती है उर्दू ज़ुबां आते-आते
(सालों पहले पढ़ा था ये शेर। इसलिए कुछ ग़लत-सलत लिखा गया हो तो माफी ग्रांट कीजिएगा।)

वैसे मेरे कहने का मतलब ये है कि क्या करें, उर्दू आयी ही नहीं?

जहां तक जावेद अख़्तर साहब की बात है, तो उसमें उनकी क्या ग़लती? कैमरे के सामने जो आएगा, कैमरा उसी को तो क़ैद करेगा। हो सकता है बहुत से तरक्‍़क़ी-पसंद मुसलमान सामने आना न चाहते हों! शायद कन्फ्यूज्ड हों! बहुत सारे शायरों को देखा है। जब भीड़ के सामने होते हैं, तो ‘भीड़’ की भाषा बोलते और सुनते हैं। भीड़ को जो पसंद है, वही राग अलापते हैं। मुनव्वर राना साहब को एक मुशायरे में देखा। शेर बोलते-बोलते हाथ का इशारा ठीक वैसे किया, जैसे कोई हवाई जहाज़ किसी इमारत में घुस रहा हो। लेकिन यही साहब और कहीं पर होंगे, तो तरक्की पसंद कहे जाएंगे।

जांनिसार अख़्तर एक पाएदार शायर थे। लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता की हैसियत से कई साल भूमिगत रहे।’

ये लिखना कितना ज़रूरी था...? या फिर किसी को तरक्‍़क़ी-पसंद तभी समझा जाएगा, जब वह कम्‍युनिस्ट हो?

शिवकुमार मिश्र

ऐसा सिर्फ़ इसलिए कि उर्दू, शाहमुखी या दाएं से बाएं वाली लिपि मुसलमानों की है। और तमाम जुड़ावों के बाद भी हमेशा यही लगता है कि वे हमारे शत्रु हैं। सो पंजाब की नयी पीढ़ी, जिसने विभाजन को झेला कम, सुना ज़्यादा था, उसे घरनिकाला दे दिया। खोज-खोज कर पंजाबी में हिंदी शब्‍द डाले गये। ऐसा ही लाहौर में भी हुआ। वहां शाहमुखी अपनायी गयी। खोज-खोजकर फ़ारसी ठूंसी गयी। आम आदमी के मुंह से सुनेंगे, तो रत्ती-भर फ़र्क़ नहीं दोनों ज़बानों में। पर सत्ता की सुनेंगे, तो क़हर फ़र्क़ है साब। ज़मीन बंटी, देश बंटा, ज़बान के दो टुकड़े हो गये। लिल्लाह।
भाषा का सबसे बड़ा नुक़सान तब होता है, जब वह किसी धर्म से जोड़ दी जाती है। संप्रदाय-विशेष की पहचान बना दी जाती है। भाषा हमारे समय का सबसे बड़ा राजनीतिक अखाड़ा है। ऑड्रियन रिच की एक कविता है,
आग की राजनीति उसकी लपट में है
उठती है, गिरती है, औचक फिर उठ जाती है
पानी की राजनीति उसकी लहरों में
स्त्री की राजनीति उसकी देह में होती है
पुरुष की उसकी भुजाओं मेंसमय की सारी राजनीति चलती है
भाषा के हरे-काले चारागाहों में।
जिस देश में भाषा के आधार पर सरहदें बांधने की पुरानी रिवायत हो, वहां यह राजनीति साफ़-साफ़ दिख जाती है। हमारे यहां उर्दू को लेकर जो राजनीति होती है, वैसी ही पाकिस्तान में हिंदी को लेकर। मशहूर कहानीकार हैं इंतज़ार हुसैन। पाकिस्तान में कोई भी नौसिखिया नक़्क़ाद या आलोचक उठता है और इनका गला पकड़ लेता है। इनकी कहानियों में हिंदी के शब्दों, जातक कथाओं, हिंदू मिथकों की भरमार होती है। भाई लोगों के गले नहीं उतरता। बीसियों बार अदबी फ़तवे जारी हो गये, ज़ातबाहर करने के। ऐसे ही एक और कथाकार हैं असद मोहम्मद ख़ां। ‘बसोड़े की मरियम’ और ‘मई दादा’ इनकी बेहतरीन कहानियां हैं। उनमें भी हिंदी, यहां के मिथ, ईदो-दीवाली साथ मनाने के दृश्‍य हैं, तो ऐसी ही फ़तवेबाज़ी उनके साथ भी। इंतज़ार हुसैन तो हिंदी-अंग्रेज़ी में अनूदित होकर दुनिया-भर में पहुंच गये, असद भाई रह गये। तमाम ‘क्लास’ के बाद भी। फ़ैसलाबाद से दोस्त नक़्क़ाद ज़ुबैर हसन बताते हैं कि पचीस साल पहले ऐसे ढेरों अफ़सानानिगार, शायर थे, जिनके यहां हिंदी भरपूर थी। पर कट्टरपंथी नक़्क़ादों की धमकियों ने सबको किनारे लगा दिया। हमारे यहां गुलशेर ख़ां ‘शानी’ को ऐसी दिक़्क़तों से दो-चार होना पड़ा। फ़‍िराक़ की स्वीकृति को लेकर अक्सर दो-मन रहे। रावलपिंडी से एक प्रोफ़ेसर साहब आये पिछले दिनों, यहां हमारे दफ़्तर में। घंटों बातें हुईं। बताया, लाहौर कॉलेज की लाइब्रेरी में एक सेक्शन ऐसा है, जिसमें कोई नहीं जाता। दरअसल, जाने ही नहीं दिया जाता। उस सेक्शन में संस्कृत की ढेरों पांडुलिपियां धूल खा रही हैं। मूल लिखतें हैं वे। उनमें पूर्वोत्तर का सांस्कृतिक इतिहास क़ैद है। कॉलेज प्रशासन, सरकार, तथाकथित बुद्धिजीवी उसे हिंदुओं का इतिहास मानते हैं, क्‍योंकि संस्कृत बभ्भनों की भाषा है। कोई छात्र उस पर रिसर्च करना भी चाहे, तो उसे हतोत्साहित किया जाता है। पश्चिमी पंजाब में कितने ही लोग गुरुमुखी में लिखे उर्दू साहित्य पर शोध करना चाहते हैं, पर उन्हें वीज़ा नहीं दिया जाता। यह भाषा की ही राजनीति है, भाषा के ज़रिये ही हो रही है।

हिंदी, हिंदू की भाषा है, उर्दू मुसलमान की। जोसेफ़ डेविड झाबुआ में रहता है, पर हम मान लेते हैं कि अंग्रेज़ी उसी की है। तमिल आयंगर की है, और बांग्ला घोष बाबू की। ऐसी ही कुत्सित जातीय पहचान के कारण हिब्रू का हश्र क्‍या हुआ? सिमटकर रह गयी। वरना योरप में वह भी ख़ासा बोली जाती थी।

दिल्ली, आगरा के बाज़ारों में उड़द की दाल बेचने वालों ने जैसे उड़दू (आगे चल कर उर्दू) बनायी थी, वैसे ही इंडो‍नेशिया में मंत्र पढ़ने वालों ने बहासा। पर सारी भाषाओं में राजनीति चलती रही और ये मारकाट का ज़रिया बन गयीं। पंजाबी के मित्र कथाकार देसराज काली बताते हैं, पंजाबी के विकास का श्रेय सिख लेते हैं, जबकि सिखों का धार्मिक साहित्य ब्रज, संस्कृत व संतभाखा का मिश्रण है। आम लोगों की पंजाबी सूफ़ीनाथ कवियों ने प्रचलित की, इसीलिए वारिस, बुल्ले आज भी ज़बान पर बैठते हैं। लेकिन उन्हें बाक़ायदा, योजना बनाकर, पंजाबी से बाहर किया गया और मुसलमान शायर कहा गया।

आने वाला समय भाषा के नाम पर और लड़ाइयां करवाएगा। ये तय करना मुश्किल हो जाएगा कि इंडियन इंग्लिश सही है या अमेरिकनसाइको-लिंग्विस्टिक में काम करने वाले नोआम चोम्स्‍की सरीख़े लोग ऐसे ही चेतावनियां नहीं देते फिर रहे। भाषाओं को जातीय पहचान बनाने का विरोध इसीलिए किया जा रहा है। शिकागो में आपके मुंह से स्पैनिश निकलेगी और आपको हिकारत से देखा जाएगा। मुंबई में भोजपुरी निकली कि आपको धक्का दे दिया जाएगा। गुवाहाटी में मैथिली बोली, तो गला रेता जा सकता है। जो हालात आज हैं, कल को यही होने की आशंका है न?

क्‍या करेंगे सारे बुद्धिजीवी, जब मजाज़ को मुसलमान शायर कहा जाता है। कल को मुक्तिबोध किसी मंदिर के प्रांगण में, धोती पहनने वाले धूमिल किसी शाखा में लट्ठ थामे छप सकते हैं। संघ के दफ़्तर में भगत सिंह की तस्वीर तो कई लोगों ने देखी होगी। भाजपाइयों को उनका गुणगान करते देखा होगा। मूंछ पर ताव देते चंद्रशेखर आज़ाद को जनेऊ वाले बाभन के अलावा और किस रूप में देख पाये हैं हम आज तक? क्‍यों नहीं हम कहते, कि अपने समय के युवाओं का हाथ मोमबत्ती से तपाकर प्रगतिशील क्रांतिकारिता की शपथ दिलाने वाले इस नायक को बंदूक़ छाप डकैत, जनेऊ टाइप बाभन, मूंछ टाइप मर्द और नंगे बदन टाइप सामंत के रूप में न दिखाया जाए। एक कम्युनिस्ट संग्रामी में से कम्युनिज़्म को डिलीट करो और हाईजैक कर लो। नये नायक गढ़ने का न तो समय है उनके पास, न उतना श्रम करने की नैतिकता। सो लूट लो, खींच लो, नहीं जमता, तो धकेल दो। हिंदू का नायक हिंदू ही होगा, मुसलमान का मुसलमान।

आखि़र द ग्रेट डिक्टेटर बनाकर मखौल के ज़रिए हिटलर का मज़ाक़ उड़ाने वाले चार्ली चैपलिन को नब्बे के दशक में, बाक़ायदा ‘रिसर्च’ करके, फ़ासीवादी समर्थक साबित करने की कोशिश नहीं की गयी थी?

भाषा की यह चलती हुई-सी राजनीति तभी क़ाबू में की जा सकेगी, जब ज़्यादा से ज़्यादा ‘रघुपति सहाय’ उर्दू जानें, और ज़्यादा से ज़्यादा ‘इंतज़ार हुसैन’, ‘असद ख़ां’ हिंदी को अपनाएं। ‘ग़ालिबओ-फ़ैज़’ का रट्टा लगाने वालों को उर्दू सीख लेने में कोई गुरेज़ है क्‍या?

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किस मजाज़ की बात करते हो तुम?

जोड़-जुगाड़ का साहित्य

अंशुमाली रस्तोगी

साहित्य में संबंधों का बड़ा महत्व होता है। संबंधों के सहारे पहले बातचीत को साधा जाता है, चीजों का आदान-प्रदान होता है फिर अंतत: उन्हें अनाम-से रिश्तों में ढालकर अपने-अपने स्वार्थों को सिद्ध किया और करवाया जाता है। हालांकि पहले साहित्य में स्वार्थसिद्धि को उपेक्षित नजरिए से देखा जाता था लेकिन अब इसे एक नियम या महत्वपूर्ण कार्य के रूप में स्वीकार कर लिया गया है।

कहते हैं समय परिवर्तनशील होता है और साहित्य के भीतर भी परिवर्तन की प्रक्रिया चलती रहनी चाहिए परंतु यदि यह परिवर्तन रचनात्मकता के क्षेत्र में है तो भला किसे ऐतराज हो सकता है मगर केवल संबंधों के सहारे ही चीजें अगर बनतीं-बिगड़तीं हैं तो स्थिति शोचनीय हो जाती है। राजनीति की भांति साहित्य में भी गुटबाजी की परंपरा कुछ ज्यादा ही बलबती होती जा रही है। फिर दिल्ली, जोकि राजनीति के साथ-साथ साहित्य और साहित्यकारों का बड़ा गढ़ बन चुका है, में साहित्यकारों के मध्य विकसीत होती 'साहित्यिक गुटबाजी' ने तो आपसी संबंधों और स्वार्थों के नए कीर्तिमान तक स्थापित कर डाले हैं। खैर मुझको किसी स्थापित कीर्तिमान के विस्तार में नहीं जाना क्योंकि इसे वो महान लोग बेहतर समझ-जान सकते हैं जो परदे के पीछे घटने वाले करतबों से ज्यादा वाकिफ रहते हैं।

देखिए साहित्य में अब आपकी पहचान का सबब आपकी रचनाएं नहीं बल्कि जोड़-जुगाड़ वाले संबंध होने लगे हैं। यहां पुरस्कार और सम्मान दिए या दिलवाए जाने का सही मानक आपकी रचनात्मक योग्यता नहीं बल्कि आपकी पहुंच और संबंधों की गरमाहट है। योग्यता का बोझ तो वे ढोते हैं जिनका यहां कोई 'गॉडफादर' नहीं होता। वैसे साहित्य में भी फिल्मी दुनिया की तरह कम से कम एक 'गॉडफादर' का होना इसलिए भी आवश्यक है ताकि छपने-छपवाने व पुरस्कार लेने-देने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहे। गॉडफादर का संग-साथ होने का एक बड़ा फायदा तो यही है कि वे लाभ के सौदे करवाने में माहिर होते हैं। कल्पना करें अगर राजनीति और साहित्य के बीच से गॉडफादर का अस्तित्व ही समाप्त हो जाए तो तमाम सरकारी और आकादमिक सम्मान-पुरस्कार धरे के धरे ही रह जाएंगें। आखिर गॉडफादर संबंधों को विस्तार ही तो देते हैं। Read More

प्राय: मुझे कुछ महत्वपूर्ण जुमले हिंदी के नामचीन लेखकों-साहित्यकारों के मुख से साहित्य के गिरते स्तर पर सुनने को मिलते रहे हैं। अपने उध्दबोधनों में वे सभी खासा चिंतित दिखते हैं साहित्य में बड़ते कैरियरवाद और मूल्यहीनता के प्रति। अक्सर उनको सुनकर ऐसा महसूस होता है कि साहित्य के असली हितैषी ये ही महापुरुष हैं। इनमें कुछ करगुजरने का जबरदस्त जज्बा है परंतु अगले ही क्षण तस्वीर का दूसरा मगर विकृत रूप देखकर संभल जाना पड़ता है कि यह सब तो दिखावटी चिंताएं हैं अपनी पहचान और महत्ता को स्थापित करने की। साहित्य में रचनाकार को अपनी रचना से कहीं अधिक जब अपने 'नाम' का गुमान होने लगता है तो वो अक्सर नेताओं जैसे ही हो जाता है जिसे अपने नाम और भाषण के सहारे ही सामने खड़ी जनता को लुभाना होता है। साहित्य में बड़े नामों की भी खासी धौंस रही है। बड़ा नाम अक्सर बड़े कारनामों को ही अंजाम देता है। आपका लेखन या विचारधारा कैसी-क्या है अब इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता बस आप कद और पद में बड़े होने चाहिए, फिर देखिए मजा। प्राय: कई बड़े नाम तो पत्र-पत्रिकाओं में यूंही छाप लिए जाते हैं ताकि बिक्री और बाजार के मध्य तालमेल बना रह सके।

आप मानें या न मानें लेखकों-साहित्यकारों का भी अपना एक बाजार होता है। इस बाजार में लेखकों-साहित्यकारों की हैसियत के मुताबिक उसकी रचना की खरीद-फरोख्त भी होती है। मगर भूल जाएं यहां विचारधारा कोई मायने नहीं रखती। आप दक्षिणपंथी हों या वामपंथी कोई फर्क नहीं पड़ता, बस बाजार के अनुरूप होने चाहिए। स्वयं को बाजार के अनुरूप कर या हो लेने में आपके संबंध पुख्ता भूमिका अदा करते हैं। एक बड़े मीडिया विश्लेषक का तो मानना है कि लेखक-साहित्यकार की भलाई बाजार के साथ-साथ चलने में ही है। निश्चित ही बाजार हर रोज नई-नई संभावनाएं तो पैदा करता ही है। फिर लेखक अगर किसी ऊंचे प्रकाशक-संपादक से जुड़ा है तो कहना ही क्या। साल में दो-चार नई पुस्तकों का प्रकाशन और समाचारपत्र में नियमित एक स्तंभ लगभग तय ही जानिए। अरे, खाक डालें लेखक-प्रकाशक के बीच उठे विवाद या मन-मुटाव पर। सीधी-सी बात है उन्हें तो अपने नाम की प्रसिध्दि और नाम के बदले मिले दाम से मजलब है। असल में, विवाद जैसी कुछ चीजें पाठकों के मध्य इसलिए भी 'परोस' दी जातीं हैं ताकि खुराक का असर दोनों तरफ बराबर-सा हो।

कभी-कभी सोचता हूं; शायद ठीक ही सोचता हूं कि प्रेमचंद, रेणु, मुक्तिबोध, मटियानी, नागार्जुन जैसे लेखकों ने नाहक ही गंभीर और साहित्यिक रचनाएं रचीं। इससे उन्हें मिला क्या सिर्फ नाम और प्रतिष्ठा ही तो। अपने रहते उन्हें अपनी धीर-गंभीर रचनाओं के 'वाजिब दाम' तक तो मिल नहीं सके। वो अर्थ-लाभ तो कमाया उनके कथित प्रकाशकों और संबंधियों ने। अरे! कहते रहिए प्रेमचंद इस विचारधारा के थे या मुक्तिबोध उस। इस सब से अपना-अपना मकसद 'हल' होता रहना चाहिए। मैंने पहले भी कहा जब साहित्य के बीच से विचार और संवाद ही सीमित दायरों में आ चुके हों तो धारा बहेगी किस ओर! हिंदी साहित्य में ऐसे कितने 'जीवित लेखक' बचे हैं जो आज भी प्रेमचंद या मुक्तिबोध की विचारधारा के पक्षधर हैं। जनाब अंग्रेज तो तब भी भले थे जो 'फूट डालो और राज करो' की नीति पर चलते थे परंतु अपने हिंदी साहित्य में तो 'फोड़ डालो और तौहीन करो' की रीति-नीति पर ही सब कुछ टिका हैं।

वैचारिक मतभेद कहां नहीं होते परंतु साहित्य के भीतर वैचारिक मतभेद होने का मतलब है कि सामने वाले का हुक्का-पानी तक बंद कर देना। वही सफेदी के विज्ञापन वाली जंग की 'मेरी शर्ट उसकी शर्ट से इतनी सफेद कैसे'? कभी-कभी साहित्यिक मतभेद तो आपसी संबंधो में खल्ल तक डाल देते हैं। इन मतभेदों के बहाने प्राय: व्यक्तिगत छिछालेदर भी की या हो जाया करती है। ऐसे में आपसी संवाद की गुजांइश की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसे प्रसंगों में अक्सर मुझे वर्तमान साहित्य के आलोचना विशेषांक में छोटे सुकुल जी की लिखी व्यंग्यात्मक टिप्पणी आलोचक का भीतर-बाहर याद आ जाती जिसमें उन्होंने कथित आलोचकों के वैचारिक स्खलन की अच्छी खबर ली है। बिडंबना देखिए कुछ बड़े साहित्यकारों को इस टिप्पणी में भाषागत अशलीलता नजर आई। खैर, अपनी-अपनी सोच और समझ है।

लब्बो-लुआब तो यह है जनाब, हिंदी साहित्य की मैट्रो एक ही शर्त पर ठीक चल सकती है जब वहां 'न मैं तुम्हारी कहूं, न तुम मेरी कहो' की धारणा को अपना लिया जाए तथा संबंधों-जुगाड़ों की चिर-परिचित पध्दति को एक दूसरे के ख्याल के मुताबिक स्वीकार कर लिया जाए। चिंता छोड़ें कि साहित्य किस और कैसी दिशा में जा रहा है बस अपना काम निकलता रहना चाहिए। अरे! साहित्य-वाहित्य तो वो फालतू लोग रचते हैं जिनके सरोकार 'केवल साहित्य' से जुड़े होते हैं। आप-हम तो नए बदलते जमाने के साहित्यकार हैं फिर उनमें और हममें थोड़ा बहुत फर्क तो होगा ही।

अब हमारे साहित्यकार पिच्छतर या अस्सी को पार करते ही बेहद ठाठ से अपना अभिनंदन करते-करवाते हैं। ठीक इसी दिन उन्हें और उनके प्रशंसकों को उनके अब तक के रचनाकर्म का ;इतिहासध्दबोध होता है। दरअसल, ये सब कुछ सिर्फ और सिर्फ गहरे संबंधों के कारणवश ही हो पाता है। मुझे नहीं मालूम कि कभी प्रेमचंद या उससे पहले की पीढ़ी के लेखको-साहित्यकारों ने ऐसा कुछ किया या करवाया होगा!

बहरहाल, संबंधों और जुगाड़बाजी का 'संघर्ष' हिंदी साहित्य में यूंही चलते रहना चाहिए ताकि उनकी अगली पीढ़ी के लेखकों-साहित्यकारों को कुछ भी पाने में 'मेहनत' न करनी पड़े।

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उर्दू है जिसका नाम हम जानते हैं दाग़
हिंदोस्‍तां में धूम हमारी ज़बां की है!
ये फ़रमाया होगा कभी दाग़ ने। लेकिन हक़ीक़त ये है कि आज उर्दू पर बन आयी है। भले ही गुलज़ार अपने एक बेहद लोकप्रिय गाने में यह लिख रहे हैं कि

हो यार मेरा ख़ुशबू की तरह, हो जिसकी ज़ुबां उर्दू की तरह!

ग़नीमत है कि गुलज़ार का धंधा उर्दू में अब तक चल रहा है। लेकिन शाहरुख़ जैसा आज का लोकप्रिय अभिनेता चक दे जैसी वाहियात फ़िल्म बेच सकता है, उर्दू नहीं बेच सकता!

सयाने कह गये हैं कि ज़बां वहीं चलती है, जिसमें धंधा हो सके। एक ज़माना था जब ज़िल्ल-ए-सुब्हानी का कारोबार फ़ारसी में चलता था, लेकिन फ़रमान उर्दू में लिखने पड़ते थे क्योंकि अवाम उर्दू समझती थी, फ़ारसी नहीं। कुछ-कुछ उसी तर्ज़ पर कि संस्कृत जनता की भाषा कभी नहीं रही।

इसमें सल्तनत काल ख़ारिज़ कर दीजिए, क्योंकि सल्तनत के सुल्तानों और उनके पूर्व शासकों का मरक़ज़ ख़लीफ़ा था, हिन्दुस्तान की जनता नहीं। ग़ुलाम इल्तुतमिश को धन देकर खलीफ़ा से प्रमाणपत्र लेना पड़ा था कि वह सुल्तान है और तब जाकर उसका चालीस ग़ुलामों के मंडल के गठन का फ़ार्मूला काम कर पाया था। असल बात मुग़लिया सल्तनत से शुरू होती है, ख़ास तौर पर अकबर से। उससे पहले बाबर सिर्फ़ युद्ध जीतता रह गया (ख़ास तौर पर चार युद्ध) और हुमायूं अपनी फ़जीहत करवाता रहा।

अगर आप मुसलमानों के इतिहास पर ग़ौर करेंगे तो पाएंगे कि बादशाह के बाद हिन्दुस्तान में सिर्फ़ अमीर-उमरा की चली है। बादशाह भी ये लोग बदल देते थे। आपको शायद पता हो कि दक्षिण का बहमनी साम्राज्य इन्हीं अमीर-उमरा की वजह से तबाह हुआ था।

कांग्रेस ने इस प्रवृत्ति को बखूबी पकड़ा है। इसीलिए ये लोग मजाज़ को मुसलमान शायर बना कर पेश कर रहे हैं। आज भी तरक्कीपसंद मुसलमानों की क्या पूछ है, ख़ुद उनकी कौम में और निज़ामिया में?

मजाज़ को मजाज लखनवी कहना भी ग़लत है क्योंकि वह लखनऊ के तो थे ही नहीं। उनके पिता आगरा में सरकारी मुलाज़‍िम थे और पारिवारिक मजबूरियों के चलते उनको मेरठ में रहने को घर दिया गया था (यह बात मजाज की बहन ने ख़ुद कही है)। वह बाराबंकी ज़‍िले के रुदौली में पैदा हुए थे। उनका असल नाम था असरार उल-हकफ़ानी बदायूनी को वह अपना उस्ताद शायर मानते थे। उस्ताद मानने की तब यह लगभग यह रवायत ही थी।

यह बात भी सही है कि मजाज़ किसी शराब की दुकान में मरे नहीं पाये गये थे बल्कि लखनऊ के एक होटल में दोस्तों ने उन्हें 5 दिसम्बर 1955 की बेहद सर्द रात में मरने के लिए छोड़ दिया था। ख़ैर इस पर फ़िर कभी... लेकिन लगे हाथ यह बताता चलूं कि मजाज़ की जो किताबें मेरे पास हैं, उनमें ‘आहंग’, ‘शब-ए-ताब’ है। ‘साज़-ए-नौ’ मुम्ब्रा का कोई दोस्त शायर सालों पहले उड़ा ले गया है।

मजाज़ अगर आज जिंदा होते तो मस्जिद के बगल में अपनी तस्‍वीर देख कर निजाम में आग लगा देने की बात करते, लेकिन अब मजाज़ नहीं जावेद अख़्तर जीवित हैं। उन्हें इस बात की ज़्यादा पड़ी है कि कौमी यकजहती का कोई अगर प्रोमो बन रहा हो तो उसमें शबाना आज़मी और वो ख़ुद कैसे चेहरा दिखाएं। यहां यह ज़िक्र कर देना ग़ैर मुनासिब न होगा कि जावेद के वालिद जांनिसार अख़्तर एक पाएदार शायर थे और कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता की हैसियत से कई साल भूमिगत रहे। उसी दौरान यह जनाब भोपाल से मुम्बई तशरीफ लाये थे।

सोचना पड़ता है कि क्या अब हिन्दुस्तान में यही दो चहरे तरक्की पसंद मुसलमानों के रह गये हैं! आख़िर इन्होनें उर्दू ज़बान के लिए किया क्या है?

दोस्तो, उर्दू और मजाज की बहस को आगे बढाएं, उससे पहले सरदार जाफ़री की ‘लखनऊ की पांच रातें’ पढ़िये जो उन्होंने मरने के तकरीबन दो साल पहले शाया करवायी थी।

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