पंजाब की भाषा क्या है? पंजाबी चलती है, गुरुमुखी में। हिंदी चलती है, देवनागरी में। अंग्रेज़ी भी थोड़ी-बहुत। पचास साल पहले ऐसा नहीं था। पंजाबी तो तब भी थी, लेकिन लिपि उर्दू वाली थी, जिसे अब शाहमुखी कहा जाता है और जो अब सरहद के परली तरफ़ ही चलती है। जितने बुज़ुर्ग बचे हैं, उनसे बात कर लीजिए, कलम हाथ में देकर लिखवा लीजिए। न हिंदी निकलेगी, न पंजाबी। उर्दू ही होगी वह। शायर, अदीब, साइंसदां, मिस्त्री-मज़ूर, अमली-अफ़ीमची, सारे उर्दूदां। अख़बार उर्दू के। ग्रैफिटी उर्दू की। वह नस्ल यहां से वहां हो गयी। ख़ूनख़राबा हुआ। बंटवारा हुआ। घर-बार, खेत-खलिहान, पास-पड़ोस, सब बदल गये। ज़बान नहीं बदल पायी। पूर्वी पंजाब में भी उर्दू चलती रही। पर साठ का दशक आते-आते यह सीन बदल गया। उर्दू कम होती गयी। अब यहां लगभग नहीं है। तीस-पैंतीस बरसों में एक ज़बान काठ हो गयी। दायें से बायें लिखने वाली लोकप्रिय ज़बान की जगह गुरुमुखी वाली पंजाबी आ गयी।
(हालांकि उसका विकास पहले से था, लेकिन आम चलन में नहीं थी वह।)
है आसां नहीं 'दाग़' यारों से कह दो
कि आती है उर्दू ज़ुबां आते-आते
(सालों पहले पढ़ा था ये शेर। इसलिए कुछ ग़लत-सलत लिखा गया हो तो माफी ग्रांट कीजिएगा।)
वैसे मेरे कहने का मतलब ये है कि क्या करें, उर्दू आयी ही नहीं?
जहां तक
जावेद अख़्तर साहब की बात है, तो उसमें उनकी क्या ग़लती? कैमरे के सामने जो आएगा, कैमरा उसी को तो क़ैद करेगा। हो सकता है बहुत से तरक़्क़ी-पसंद मुसलमान सामने आना न चाहते हों! शायद कन्फ्यूज्ड हों! बहुत सारे शायरों को देखा है। जब भीड़ के सामने होते हैं, तो ‘भीड़’ की भाषा बोलते और सुनते हैं। भीड़ को जो पसंद है, वही राग अलापते हैं।
मुनव्वर राना साहब को एक मुशायरे में देखा। शेर बोलते-बोलते हाथ का इशारा ठीक वैसे किया, जैसे कोई हवाई जहाज़ किसी इमारत में घुस रहा हो। लेकिन यही साहब और कहीं पर होंगे, तो तरक्की पसंद कहे जाएंगे।
‘
जांनिसार अख़्तर एक पाएदार शायर थे। लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता की हैसियत से कई साल भूमिगत रहे।’
ये लिखना कितना ज़रूरी था...? या फिर किसी को तरक़्क़ी-पसंद तभी समझा जाएगा, जब वह कम्युनिस्ट हो?
शिवकुमार मिश्र
ऐसा सिर्फ़ इसलिए कि उर्दू, शाहमुखी या दाएं से बाएं वाली लिपि मुसलमानों की है। और तमाम जुड़ावों के बाद भी हमेशा यही लगता है कि वे हमारे शत्रु हैं। सो पंजाब की नयी पीढ़ी, जिसने विभाजन को झेला कम, सुना ज़्यादा था, उसे घरनिकाला दे दिया। खोज-खोज कर पंजाबी में हिंदी शब्द डाले गये। ऐसा ही लाहौर में भी हुआ। वहां शाहमुखी अपनायी गयी। खोज-खोजकर फ़ारसी ठूंसी गयी। आम आदमी के मुंह से सुनेंगे, तो रत्ती-भर फ़र्क़ नहीं दोनों ज़बानों में। पर सत्ता की सुनेंगे, तो क़हर फ़र्क़ है साब। ज़मीन बंटी, देश बंटा, ज़बान के दो टुकड़े हो गये। लिल्लाह।
भाषा का सबसे बड़ा नुक़सान तब होता है, जब वह किसी धर्म से जोड़ दी जाती है। संप्रदाय-विशेष की पहचान बना दी जाती है। भाषा हमारे समय का सबसे बड़ा राजनीतिक अखाड़ा है।
ऑड्रियन रिच की एक कविता है,
आग की राजनीति उसकी लपट में है
उठती है, गिरती है, औचक फिर उठ जाती है
पानी की राजनीति उसकी लहरों में
स्त्री की राजनीति उसकी देह में होती है
पुरुष की उसकी भुजाओं मेंसमय की सारी राजनीति चलती है
भाषा के हरे-काले चारागाहों में।
जिस देश में भाषा के आधार पर सरहदें बांधने की पुरानी रिवायत हो, वहां यह राजनीति साफ़-साफ़ दिख जाती है। हमारे यहां उर्दू को लेकर जो राजनीति होती है, वैसी ही पाकिस्तान में हिंदी को लेकर। मशहूर कहानीकार हैं
इंतज़ार हुसैन। पाकिस्तान में कोई भी नौसिखिया नक़्क़ाद या आलोचक उठता है और इनका गला पकड़ लेता है। इनकी कहानियों में हिंदी के शब्दों, जातक कथाओं, हिंदू मिथकों की भरमार होती है। भाई लोगों के गले नहीं उतरता। बीसियों बार अदबी फ़तवे जारी हो गये, ज़ातबाहर करने के। ऐसे ही एक और कथाकार हैं
असद मोहम्मद ख़ां। ‘बसोड़े की मरियम’ और ‘मई दादा’ इनकी बेहतरीन कहानियां हैं। उनमें भी हिंदी, यहां के मिथ, ईदो-दीवाली साथ मनाने के दृश्य हैं, तो ऐसी ही फ़तवेबाज़ी उनके साथ भी। इंतज़ार हुसैन तो हिंदी-अंग्रेज़ी में अनूदित होकर दुनिया-भर में पहुंच गये, असद भाई रह गये। तमाम ‘क्लास’ के बाद भी।
फ़ैसलाबाद से दोस्त
नक़्क़ाद ज़ुबैर हसन बताते हैं कि पचीस साल पहले ऐसे ढेरों अफ़सानानिगार, शायर थे, जिनके यहां हिंदी भरपूर थी। पर कट्टरपंथी नक़्क़ादों की धमकियों ने सबको किनारे लगा दिया। हमारे यहां
गुलशेर ख़ां ‘शानी’ को ऐसी दिक़्क़तों से दो-चार होना पड़ा।
फ़िराक़ की स्वीकृति को लेकर अक्सर दो-मन रहे।
रावलपिंडी से एक प्रोफ़ेसर साहब आये पिछले दिनों, यहां हमारे दफ़्तर में। घंटों बातें हुईं। बताया,
लाहौर कॉलेज की लाइब्रेरी में एक सेक्शन ऐसा है, जिसमें कोई नहीं जाता। दरअसल, जाने ही नहीं दिया जाता। उस सेक्शन में
संस्कृत की ढेरों पांडुलिपियां धूल खा रही हैं। मूल लिखतें हैं वे। उनमें पूर्वोत्तर का
सांस्कृतिक इतिहास क़ैद है। कॉलेज प्रशासन, सरकार, तथाकथित बुद्धिजीवी उसे हिंदुओं का इतिहास मानते हैं, क्योंकि संस्कृत बभ्भनों की भाषा है। कोई छात्र उस पर रिसर्च करना भी चाहे, तो उसे हतोत्साहित किया जाता है।
पश्चिमी पंजाब में कितने ही लोग गुरुमुखी में लिखे उर्दू साहित्य पर शोध करना चाहते हैं, पर उन्हें वीज़ा नहीं दिया जाता। यह भाषा की ही राजनीति है, भाषा के ज़रिये ही हो रही है।
हिंदी, हिंदू की भाषा है, उर्दू मुसलमान की। जोसेफ़ डेविड झाबुआ में रहता है, पर हम मान लेते हैं कि अंग्रेज़ी उसी की है। तमिल आयंगर की है, और बांग्ला घोष बाबू की। ऐसी ही कुत्सित जातीय पहचान के कारण
हिब्रू का हश्र क्या हुआ? सिमटकर रह गयी। वरना योरप में वह भी ख़ासा बोली जाती थी।
दिल्ली,
आगरा के बाज़ारों में उड़द की दाल बेचने वालों ने जैसे उड़दू (आगे चल कर उर्दू) बनायी थी, वैसे ही
इंडोनेशिया में मंत्र पढ़ने वालों ने बहासा। पर सारी भाषाओं में राजनीति चलती रही और ये मारकाट का ज़रिया बन गयीं। पंजाबी के मित्र कथाकार
देसराज काली बताते हैं, पंजाबी के विकास का श्रेय
सिख लेते हैं, जबकि सिखों का धार्मिक साहित्य
ब्रज, संस्कृत व संतभाखा का मिश्रण है। आम लोगों की पंजाबी
सूफ़ी व
नाथ कवियों ने प्रचलित की, इसीलिए
वारिस,
बुल्ले आज भी ज़बान पर बैठते हैं। लेकिन उन्हें बाक़ायदा, योजना बनाकर, पंजाबी से बाहर किया गया और मुसलमान शायर कहा गया।
आने वाला समय भाषा के नाम पर और लड़ाइयां करवाएगा। ये तय करना मुश्किल हो जाएगा कि
इंडियन इंग्लिश सही है या
अमेरिकन।
साइको-लिंग्विस्टिक में काम करने वाले
नोआम चोम्स्की सरीख़े लोग ऐसे ही चेतावनियां नहीं देते फिर रहे। भाषाओं को जातीय पहचान बनाने का विरोध इसीलिए किया जा रहा है।
शिकागो में आपके मुंह से
स्पैनिश निकलेगी और आपको हिकारत से देखा जाएगा।
मुंबई में
भोजपुरी निकली कि आपको धक्का दे दिया जाएगा।
गुवाहाटी में
मैथिली बोली, तो गला रेता जा सकता है। जो हालात आज हैं, कल को यही होने की आशंका है न?
क्या करेंगे सारे बुद्धिजीवी, जब
मजाज़ को मुसलमान शायर कहा जाता है। कल को
मुक्तिबोध किसी मंदिर के प्रांगण में, धोती पहनने वाले
धूमिल किसी शाखा में लट्ठ थामे छप सकते हैं।
संघ के दफ़्तर में
भगत सिंह की तस्वीर तो कई लोगों ने देखी होगी। भाजपाइयों को उनका गुणगान करते देखा होगा। मूंछ पर ताव देते
चंद्रशेखर आज़ाद को जनेऊ वाले बाभन के अलावा और किस रूप में देख पाये हैं हम आज तक? क्यों नहीं हम कहते, कि अपने समय के युवाओं का हाथ मोमबत्ती से तपाकर प्रगतिशील क्रांतिकारिता की शपथ दिलाने वाले इस नायक को बंदूक़ छाप डकैत, जनेऊ टाइप बाभन, मूंछ टाइप मर्द और नंगे बदन टाइप सामंत के रूप में न दिखाया जाए। एक कम्युनिस्ट संग्रामी में से
कम्युनिज़्म को डिलीट करो और हाईजैक कर लो। नये नायक गढ़ने का न तो समय है उनके पास, न उतना श्रम करने की नैतिकता। सो लूट लो, खींच लो, नहीं जमता, तो धकेल दो। हिंदू का नायक हिंदू ही होगा, मुसलमान का मुसलमान।
आखि़र
द ग्रेट डिक्टेटर बनाकर मखौल के ज़रिए
हिटलर का मज़ाक़ उड़ाने वाले
चार्ली चैपलिन को नब्बे के दशक में, बाक़ायदा ‘रिसर्च’ करके,
फ़ासीवादी समर्थक साबित करने की कोशिश नहीं की गयी थी?
भाषा की यह चलती हुई-सी राजनीति तभी क़ाबू में की जा सकेगी, जब ज़्यादा से ज़्यादा ‘रघुपति सहाय’ उर्दू जानें, और ज़्यादा से ज़्यादा ‘इंतज़ार हुसैन’, ‘असद ख़ां’ हिंदी को अपनाएं। ‘ग़ालिबओ-फ़ैज़’ का रट्टा लगाने वालों को उर्दू सीख लेने में कोई गुरेज़ है क्या?
Read More