Mohalla Live
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| “कृपया प्रभाष जोशी का झूठा महिमामंडन न करें” Posted: 10 Nov 2009 10:17 PM PST अपने अपने पुरुष! चंडीदत्त शुक्ल ♦ नीले बैकग्राउंड वाले चित्र में आवरण-हीन पुरुष की पीठ है। उसमें आंखें हैं और लाल रंग से उकेरी गयीं मछलियां। ये अपनी ज़िम्मेदारियों से भागते पुरुष की चित्त-वृत्ति का पुनर्पाठ ही तो है! Read the full story »जेल अच्छी फिल्म है अब्राहम हिंदीवाला ♦ फिल्म देखते समय हम जेल के अंदर की दुनिया से परिचित होते हैं। कैदी कितने असहाय होते हैं? समस्या यह हो गयी है कि हर फिल्म में हम मनोरंजन चाहते हैं। Read the full story »आलोक श्रीवास्तव ♦ कोई भी शोक इतना बड़ा नहीं होता कि उसकी छाया में सत्य को दबा दिया जाए। (यदि सारा देश उसके शोक में शामिल है, तो उस देश से मेरा नाम खारिज़ कर दो : पाश) |
| Posted: 10 Nov 2009 09:23 PM PST अब्राहम हिंदीवाला ♦ जेल इस साल की एक महत्वपूर्ण फिल्म है। नील नितिन मुकेश, मनोज बाजपेयी और राहुल सिंह ने सपने, उम्मीद, हताशा और सदमे को अच्छी तरह व्यक्त किया है। ख़ास कर मनोज बाजपेयी अपने फॉर्म में लौटते नज़र आते हैं। इस फिल्म को देखते समय हम जेल के अंदर की दुनिया से परिचित होते हैं। कैदी कितने असहाय होते हैं? समस्या यह हो गयी है कि हर फिल्म में हम मनोरंजन चाहते हैं। और मनोरंजन का खास संदर्भ और मतलब हो गया है। इसके अभाव में हमें हर फिल्म नीरस, शुष्क और बेजान लगती है। |
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