Mohalla Live
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- कुछ अख़बारों ने जगह नहीं दी, इंदौर ने मान नहीं दिया
- प्रभाष जी के लिए इतनी कटुता, इतनी घृणा?
- पत्रकारिता की खातिर पुत्र धर्म नहीं निभाया
- हाथ का लिखा, दिल के बोल
- कवि की अभद्रता के ख़िलाफ़ एक हस्ताक्षर अभियान
| कुछ अख़बारों ने जगह नहीं दी, इंदौर ने मान नहीं दिया Posted: 07 Nov 2009 08:44 PM PST दिल के बोल रवीश कुमार ♦ शुक्रवार का 'जनसत्ता' देख लीजिए। उसमें प्रभाष जी का नाम तक नहीं है। जिस अखबार को बनाया वह भी उनकी मौत की खबर आने से पहले छप गया। Read the full story »समझौतों के पार सुरेंद्र किशोर ♦ जोशीजी ने हर कदम पर लेखन की मेरी स्वतंत्रता की रक्षा की। क्योंकि वह जानते थे कि मेरा सुरेंद्र किशोर गलती कर सकता है, पर बेईमानी नहीं कर सकता। Read the full story »अरविंद तिवारी ♦ प्रभाष जी का शव जब विमान से शुक्रवार शाम इंदौर पहुंचा, तब वहां गिने हुए चार पत्रकार, एक फोटोग्राफर व एक लोकल चैनल के कैमरामैन के अलावा कोई पत्रकार मौजूद नहीं था। |
| प्रभाष जी के लिए इतनी कटुता, इतनी घृणा? Posted: 07 Nov 2009 06:24 PM PST गिरीश पंकज ♦ इसमें दो राय नहीं कि प्रभाष जी के जाने के बाद रचनात्मक पत्रकारिता का एक पुरोधा चला गया। यह एक युगांत भी है। ऐसे युगांत जो दुबारा नहीं आने वाला। बस उनका लेखन ही हमारे सामने रहेगा। आने वाली पीढ़ी अगर पत्रकारिता के चरित्र को उज्ज्वल बनाए रखना चाहती है, सचमुच पत्रकारिता करना चाहती है, तो वह प्रभाष जोशी के रास्ते पर चले। पत्रकार केवल सामाजिक विषयों पर ही न लिखे, वह खेल, विज्ञान आदि अन्य विषयों पर भी पढ़े और लिखे। प्रभाषजी यही करते थे। जितना अच्छा वे किसी राजनीतिक-सामाजिक विषय पर लिखते थे, उससे बेहतर भाषा में वे क्रिकेट पर भी लिखते थे। हिंदी के सुधी पाठक उनके इस शीर्षक को आज तक याद करते हैं, कि "जब तक सूरज-चांद रहेगा, अजहर तेरा नाम रहेगा"। |
| पत्रकारिता की खातिर पुत्र धर्म नहीं निभाया Posted: 07 Nov 2009 05:55 PM PST सुरेंद्र किशोर ♦ कीर्ति आजाद ने राजनीति के लिए पिता धर्म निभाया। पर प्रभाष जोशी ने पत्रकारिता की खातिर पुत्र धर्म नहीं निभाया। क्या किसी अन्य संपादक पिता ने अपने पुत्र के कैरियर को अपने ही हाथों अपने पत्रकारिता धर्म के पालन के लिए नुकसान पहुंचाया होगा? मुझे तो कोई दूसरा उदाहरण नहीं मालूम। शायद आम लोग नहीं जानते कि एक संपादक के लिए अपने अच्छे-बुरे कामों के लिए अपने किसी संवाददाता को अनुशासित कर लेना कितना आसान है? कोई संवाददाता अपने संपादक की इच्छा के विपरीत एक रपट भी नहीं लिख सकता है। पर जोशीजी ने मुझे हर कदम पर लेखन की मेरी स्वतंत्रता की रक्षा की। क्योंकि वह जानते थे कि मेरा सुरेंद्र किशोर गलती कर सकता है, पर बेईमानी नहीं कर सकता। |
| Posted: 07 Nov 2009 05:27 PM PST रवीश कुमार ♦ हम सब एनडीटीवी इंडिया के न्यूजरूम में बात कर रहे थे कि अगली सुबह प्रभाष जी सचिन के सत्रह हजार पूरे होने पर क्या लिखेंगे। कुछ आंसू होंगे, कुछ हंसी होगी और कुछ पागलपन। नये-नये शब्द निकलेंगे और इस बार लिखेंगे तो उनकी कलम दो हजार शब्दों की सीमा को तोड़ चार हजार शब्दों तक जाएगी। शुक्रवार का 'जनसत्ता' देख लीजिए। उसमें प्रभाष जी का नाम तक नहीं है। जिस अखबार को बनाया वह भी उनकी मौत की खबर आने से पहले छप गया। तेंदुलकर की एक तस्वीर के साथ छह नवंबर का 'जनसत्ता' घर आ गया। उसने भी प्रभाष जी का इंतजार नहीं किया। इस बार प्रभाष जोशी ने अपने अखबार की डेडलाइन की कम और अपनी डेडलाइन की परवाह ज्यादा की! |
| कवि की अभद्रता के ख़िलाफ़ एक हस्ताक्षर अभियान Posted: 07 Nov 2009 04:21 PM PST जलेसं, मुंबई ♦ विजयशंकर चतुर्वेदी पिछले डेढ़ दशक से अभद्र आचरण और घटिया हरकतों में लिप्त रहे हैं। शराब पीकर रात-बेरात फोन करना, स्त्रियों को गाली देना और बकवास करना, लोगों से झगड़ा मार-पीट करना, इनके लिए आम बात है। कई बार ऐसा लगता है कि इस तरह के व्यवहार के लिए श्री विजयशंकर चतुर्वेदी स्वयं को गर्वित महसूस करते हैं। ये बातें नज़रअंदाज़ की जा सकती थीं, बल्कि इतने वर्षों तक प्राय: की जाती रही हैं, लेकिन विजयशंकर खुद को लेखक समाज का हिस्सा मानते हैं। विडंबना यह है कि वे लेखकीय गरिमा और दायित्व का रत्तीभर भी ख्याल नहीं रखते। नशे में तो प्राय: उद्दंड हो जाते हैं। इसी आचरण के चलते एक दशक पहले वे अपने पारिवारिक जीवन को धू-धू जलता देख चुके हैं। |
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