अभी एक-दो दिन पहले ही अपने गांव से लौटा हूं, इस बार मेरा गांव प्रवास करीब-करीब बीस दिनों का था सो मेरे पास कुछ ज्यादा टाइम था, अपने उस गांव को देखने-समझने का जहां मैं पैदा हुआ, जवान हुआ. पहले अपना गांव अच्छा लगता था, वहां के लोग और उनकी बातें सुहाती थी. वो जैसे भी थे, अच्छे थे.
वो सारे लोग मुझे अबकी बार अच्छे नहीं लगे, वो इसलिए कि आज भी मेरे गांव का भूमिहार चाहता है कि चमार, डोम, मुसहर उसे नीचे तक झुक कर सलाम ठोके, गाली सुनकर भी उन्हें (भूमिहारों को) मालिक कहे......
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