वंदेमातरम् को देशभक्ति से जोड़ कर देखने वाले अहमक हैं
सलीम अख्तर सिद्दीकी
जमीयत उलेमा हिन्द के तीसवें अधिवेशन में वंदेमातरम् के गाने के खिलाफ फतवा क्या आया, भूचाल आ गया। सबसे पहले तो यह कि जब पहले से ही जमीयत का वंदेमातरम् पर रुख साफ है तो इस मुद््दे को क्यों बार-बार हवा देकर भावनाएं भड़काने का काम किया जाता है ? वंदेमातरम् गाना न गाना किसी की इच्छा पर निर्भर करता है। न तो इस पर किसी को न गाने का दबाव दिया जा सकता है और न ही जबरदस्ती गाने के लिए मजबूर किया जा सकता है। जमीयत और संघ परिवार बुनियादी इंसानी जरुरतों को नजरअंदाज करके ऐसे मुद्दों को हवा दे रहे हैं, जिनसे समाज में केवल नफरत ही फैल सकती है। वंदेमातरम् गाने से न तो कोई देशभक्त बन सकता है और न ही ना गाने से देशद्रोही हो जाता है। वंदेमातरम् गाने वाले देश में बम धमाके करके देशद्रोही होने का सबूत दे चुके हैं तो न गाने वाले देश के सम्मान के लिए जान भी न्योछावर करते रहे हैं। इसलिए वंदेमातरम् को देशभक्ति से जोड़ कर देखने वाले अहमक हैं। क्या यह हैरत की बात नहीं है कि जमीयत उलेमा हिन्द के इजलास में इंसानी बुनियादी जरुरतों को नजरअंदाज किया गया। आज देश की गरीब ही नहीं निम्न मध्यम और मध्यम वर्ग कही जानी वाली जनता के सामने रोटी की गम्भीर समस्या पैदा हो गयी है। आटा, दाल, चीनी और दूध जैसी बुनियादी चीजों पर मंहगाई की मार है। आम आदमी त्राहि-त्राहि कर रहा है। जमीयत ने मंहगाई के खिलाफ अपना मुंह क्यों नहीं खोला ? संघ परिवार कभी भी अपने अधिवेशनों में रोटी की बात नहीं करता। उसे केवल हिन्दुत्व की चिंता रहती है। हिन्दुत्व भी वह, जिससे सिर्फ घ्णा ही फैलती है।
कहते हैं कि भूखे पेट तो भजन भी नहीं होता। क्या वंदेमातरम् गाकर आदमी का पेट भर सकता है ? या न गाने से मुसलमानों की समस्याएं खत्म हो जाती हैं ? देश की प्रति वफादारी अपनी जगह है। लेकिन देश पर हूकुमत करने वाले लोगों की भी जिम्मेदारी है कि वह जनता को दो जून की रोटी मुहैया कराएं। अक्सर देखा गया है कि जब भी मंहगाई होती है तो कुछ राज्य सरकारें अपनी तरफ से सस्ती चीजें बेचने के लिए कुछ दुकानें लगाती हैं। क्या इतने मात्र से ही मंहगाई पर काबू पाया जा सकता है ? सवाल यह है कि देश की जनता को सरकार यह क्यों नहीं बताती कि चीनी 20 से 40 रुपए क्यों हो गयी है ? आटा क्यों 20 रुपए किलो बिकने लगता है और घी -तेल में क्यों रातों-रात आग लग जाती है ? आखिर कीमते बढ़ने की कुछ तो वजह होती है ? क्या सरकार जमाखोरों के आगे घुटने टेकने के लिए अलावा कुछ नहीं कर सकती ? क्या कानून का डंडा जमाखोरों और मुनाफाखोरों के लिए नहीं है ? क्या सरकार उस वक्त का इंतजार कर रही है, जब भूखी जनता दुकानों में लूटपाट शुरु कर देगी ? क्या आगरा की घटना इसकी शुरुआत मानी जाए ? खुदा न करे यदि ऐसा हुआ तो भी सरकार का चाबुक उन्हीं गरीबों की पीठ पर पड़ेगा, जो भूख से मजबूर होकर अपना आपा खो बैठेंगे और सुरक्षा होगी उन जमाखोरों की जो, अनाज को मनमाने दामों पर बेचकर अपनी तिजोरियां भरते हैं।
पहले भी कहता रहा हूं आज भी कहता हूं आजकल की सरकारें गरीबों को केवल वोट देने वाली भेड़ों के अलावा कुछ नहीं समझतीं। सरकार गरीब लोग ही बनाते हैं। अमीर लोगों को तो वोट देना भी बेकार का काम लगता है। इसलिए वंदेमातरम् गाने या न गाने की बहस में न उलझकर रोटी की चिंता कीजिए। याद रखिए वंदेमातरम् पर बहस चलाने वालों को रोटी की चिंता नहीं है। इनके पेट भरे हुए हैं। ये लोग ऐशोआराम की जिंदगी जीते हैं। इन्हें नहीं पता कि आटे का क्या भाव हो गया है। इसलिए ये लोग कभी भी रोटी की बात नहीं करते। भूख कभी इनके एजेंडे में नहीं रही। देश के गरीबों को एक बात समझ लेनी चाहिए के राजनैतिक दलों ने हमें धार्मिक जाति और क्षेत्रीयता में इसलिए बांट दिया है ताकि गरीब लोग एक साथ इकट्ठा होकर इनके गिरेबां पर हाथ न डाल सकें। सही बात तो यह है कि गरीब न हिन्दू होता न मुसलमान। भूख की आग हिन्दू के पेट को भी उतना ही जलाती है जितना मुसलमान के पेट को।








6 comments:
याद रखिए वंदेमातरम् पर बहस चलाने वालों को रोटी की चिंता नहीं है। इनके पेट भरे हुए हैं। ये लोग ऐशोआराम की जिंदगी जीते हैं।
...और फतवे जारी कर तनाव फैलाते है.
@ सिद्दकी जी
आपने बड़ी आसानी से कह दिया कि लोग वन्देमातरम की नहीं बल्कि रोटी की बात करें |
लेकिन आप इस बात से नावाकिफ तो न होंगे ये वही लोग हैं जो बात - बात पर इस्लाम खतरे में होने का नारा लगाते हैं | परमाणु करार पर देश भर में विरोधी रैलियाँ निकालते हैं | इस्राइल और फिलिस्तीन की जंग में भारत सरकार को घसीटते हैं |
मदरसों में बवाली तालीम लेते हैं और बटला हाउस पर दिल्ली पहुँच जाते हैं | इस्लाम के खिलाफ जाकर बड़े बेगैरत अंदाज़ में हज सब्सिडी मांगते हैं | मुंबई अटैक को भारतीय साजिश करार देते हैं |
जब ये लोग उपरोक्त हरकतें करते हैं तब आप जैसे कथित बुद्धिजीवी ? इनको रोटी की बात करने के लिए नहीं कहते बल्कि दुम दबाकर कहीं कोने में बैठ जाते हैं और अपना मौन समर्थन दे देते हैं |
चलिए अब जबकि आप मुखर हुए हैं तो फिर लगे हाथ जमियत को पत्र लिख कर नसीहत भेज दें कि आगे से कोई भी मुद्दा सिर्फ और सिर्फ रोटी के लिए उठाएं | मदरसों में रोज़ी - रोटी की ही तालीम हो न की धर्म की |
कुरान पढने और मुसलमान बनने का अधिकार भी उसी को हो जो रोटी का जुगाड़ कर चुका है |
आखिर आपके लेख का उद्देश्य यही कहना हैं न कि भूखे नंगे - लोगों की कोई राष्ट्रीय भावना नहीं होती | तो फिर उसकी धार्मिक भावना भी तो नहीं होनी चाहिए |
|| " वन्दे मातरम् " ||
|| " सत्यमेव जयते " ||
सिद्दकी जी, मैं आपको एक बुद्धिजीवी समझता था किन्तु आज वह भ्रम टूट गया। आपकी नजर में सिर्फ आप और आप जैसे विचार रखने वाले बुद्धिमान हैं और बाकी सब अहमक। "वंदेमातरम् को देशभक्ति से जोड़ कर देखने वाले अहमक हैं" कह कर आपने कितनी बड़ी अहमकाना हरकत की है यह आप नहीं जानते क्योंकि आप अहमक होते हुए भी खुद को बुद्धिमान समझते हैं। देशभक्ति क्या होती है ये आप क्या जानों। कितने ही देशभक्त क्रान्तिकारियों ने भूखे पेट रहकर देश की स्वतन्त्रता के लिये क्या क्या किया है ये तो आप सोच भी नहीं सकते क्योंकि आप को तो सिर्फ रोटी दिखाई देती है। आप रोटी को देशभक्ति से अधिक महत्वपूर्ण मानते हो। आपके लिये रोटी पहले है बाद में देश। रोटी को प्रधानता देने वाला भला क्या जानेगा कि देशभक्ति का जज्बा क्या होता है?
स्वतन्त्रता के पूर्व क्रान्तिकारी वन्देमातरम् गाकर भारतमाता की वन्दना करते थे और वन्देमातरम् का नारा लगाया करते थे। वन्देमातरम् क्रान्ति का प्रतीक बन गया था। ब्रिटिश शासन वन्देमातरम् से इतना भयभीत हो गई थी कि इस पर बैन लगा दिया और अनेक लोगों को वन्देमातरम् गाने और नारा लगाने के अपराध में सजा देकर जेलों में डाल दिया था।
आपकी नजरों में तो रवीन्द्रानाथ टैगोर अहमक हैं जिन्होंने कहा थाः
"Vande Mataram! These are the magic words which will open the door of his iron safe, break through the walls of his strong room, and confound the hearts of those who are disloyal to its call to say Vande Mataram." (Rabindranath Tagore in Glorious Thoughts of Tagore, p.165)
और भारत के प्रथम राष्ट्रपति भी अहमक थे जिन्होंने कहा थाः
The composition consisting of words and music known as Jana Gana Mana is the National Anthem of India, subject to such alterations as the Government may authorise as occasion arises, and the song Vande Mataram, which has played a historic part in the struggle for Indian freedom, shall be honored equally with Jana Gana Mana and shall have equal status with it. (Applause) I hope this will satisfy members. (Constituent Assembly of India, Vol. XII, 24-1-1950)
आपको क्या पता कि इस गीत को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सन् 1896 के अधिवेशन में पहली बार राजनैतिक रूप से गाया गया था और तभी से इसे कांग्रेस ने राष्ट्रगीत के रूप में मान लिया था। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् यही निश्चय किया गया था कि वन्देमातरम को ही राष्ट्रगीत (National Anthem) बनाया जाये किन्तु उस समय भी कुछ मुसलमानों के विरोधस्वरूप और कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के कारण वन्देमातरम् को अस्वीकार करके जनगणमन को राष्ट्रगीत बना दिया गया।
http://baithak.hindyugm.com/2009/11/kya-vandemataram-rashtra-geet-hai.html
वन्दे मातरम कोई मुद्दा ही नहीं फ़तवा ज़ारी करना है तो मानवीय हिंसा के विरुद्ध हो जो मुसलसल ज़ारी है
सलीम सिद्दीकी जी इससे पहले भी मैंने आपकी बहुत सी पोस्टे पढ़ी, और पढ़ने से लगा था कि शायद आप सलीम और कैरनवी जैसे लोगो में से नहीं है। लेकिन ये भ्रम इस पोस्ट के साथ खत्म हो गयी है। वन्दे मातरम न गाने से कोई देशद्रोही तो न बनता और नही गाने वाले देशभक्त, परन्तु जरा ध्यान दीजियेगा जनाब, वे जो राष्ट्र गांन का विरोध करते है उन्हे हम देश का गद्दार कहते है । आपके नजर में कोई बड़ा मुद्दा नहीं होगा लेकिन हमारे लिए तो है, और क्यों ना रहे भाई। जिस देश के आजादी के लिए न पता कितने वीर जवान शहिद हो गये, जिस धरती माता के लिए न पता कितनी माँ ने अपने बेटो को खो दिया , बहनो ने भाई, और कितनी औरतो के माथे कि बिंदिया मिट गयी इस धरती माँ के आजादी के लिए । और जब उस धरती की स्तुति के लिए दो शब्द कहने की बारी आती है तो न पता आप जैसे बुद्धिजीवियो को क्या हो जाता है और ये कहके गाने से इनकार कर देते है कि ये धर्म विरोधी है, वाह जी क्या धकियानुकेसी बाते है, बहुत खूब। अरे कोई आपको मजबुर नहीं कर रहा न ही कोई ये कह रहा कि आप वन्दे मातरम गाईये, मत गाईये परन्तु उसे धर्म विरोधी बता के देशभक्तो को ठेस ना पहुचायेँ ।
और एक सच्चा भारतीय होने के नाते गर्व से कह रहा हूँ, वन्दे मातरम, वन्दे मातरम, वन्दे मातरम।
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