वर्षो याद आयेगे प्रभाष
"पत्रकारिता के लिए सिर कटवाने की जरूरत पड़ी तो पहला सिर मेरा होगा" इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के छात्रों द्वारा पत्रकारिता के लिये चलाए जा रहे आंदोलन को गति प्रदान करने आये उस योद्धा पत्रकार के शब्द हैं, जिन्होने अपने जन-सरोकारी लेखन द्वारा हिंदी पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया . जीवन पर्यंत पत्रकारिता मूल्यों के लिये संघर्षरत, समर्पित ’प्रभाष जोशी’ ५ नवंबर की रात हमेशा के लिये दुनियां से बिदा ले ली. ७० के दशक में "नईदुनियां" से पत्रकारिता की शुरूआत करने वाले प्रभाष जी ने पत्रकारिता के कई उतार-चढा़व को नजदीक से देखा. प्रभाष जोशी हिंदी के विरले पत्रकारों में से एक रहे, जिन्होने आपातकाल की प्रेस बिरोधी विभीषिका को झेला. आपातकाल की पत्रकारिता दो वर्गों मे बट गयी थी. एक वह अखबारी वर्ग था जो, अपनी पत्रकारिता के माध्यम से सत्ता पक्ष की पैरोकारी में मशगूल था. दूसरा अखबारों और पत्रकारों का वह वर्ग था जो, नादिरशाही फ़रमानों से बेपरवाह हो पत्रकारिता की वस्तुनिष्टता, निष्पक्षता और जनपक्षधरता के पक्ष में खडा़ था. गौर करने वाली बात है कि सत्ता के विरोध में खडे़ अधिकांश पत्र समूहों के संबंध राजनीति में सक्रिय बिरोधी दलों से थे. अधिकांश पत्रकार इन दलों के सक्रिय कार्यकर्त्ता थे. तब प्रभाष जोशी के संपादन में "प्रजानीति" अखबार ने इमरजेंसी के बिरोध में ताबड़तोड़ खबरे छापी और आंदोलन को व्यापकता देने का प्रयास किया. अप्रसन्न निरंकुश सरकार के रवैये के कारण प्रजानीति को बंद कर दिया गया.
प्रभाष जी ने अपने पत्रकारिता जीवन में साम्प्रदायिकता और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ ढे़रों आलेख छापे. १९८४ में व्यक्ति पूजावादी द्वेष के कारण सिख बिरोधी साम्प्रदायिक दंगो की कटु आलोचना की. सरकारी मदद से चलाए जा रहे दंगों के जिम्मेदार लोगों की पहचान को जनता के सामने उजागर किया. साम्प्रदायिकता के खिलाफ़ प्रभाष जोशी के अखबारी मुहिम को ९२ के बाबरी विध्वंस के समय देखा जा सकता है, ’जनसत्ता’ के साप्ताहिक काँलम ’कारेकागद’ मे संघ परिवार और उसके अनुषंगिक संगठनों की कटु आलोचना की. विध्वंस के इस कृत्य को ’गंगा-जमुनी’ तहजीब और सामाजिक ताने-बाने को नष्ट करने के प्रयास की संग्या दी.
प्रभाष जोशी के लेखन पर गाँधी दर्शन का विशेष प्रभाव था. वे पत्रकारिता को निम्नतम व्यक्तियों के हितो के रक्षक के रूप में मानते थे. लोगों के जीवन मूल्यों से जुडी़ खबरों को प्रमुखता देते थे. दबाई जाने वाली खबरों को राष्ट्रीय मुद्दों में परवर्तित करने का माद्दा प्रभाष जोशी के संपादन मे नीहित थी. १९८३ में ’एक्सप्रेस’ समूह के हिंदी अखबार ’जनसत्ता’
के संपादकीय से जुडे़ प्रभाष जोशी ने हिंदी पत्रकारिता के नये अध्यायों की शुरूआत की, उन्होने हिंदी अखबारों द्वारा अनुशरण किये जा रहे परंपरागत स्वरूप को बदल दिया. सर्वप्रथम प्रभाष जी के नेतृत्व में हिंदी दैनिक ’जनसत्ता’ ने खेल समाचारों के महत्व को समझते हुए ’खेल परिशिष्ट’ को प्रारंभ किया. अंतर्राष्ट्रिय मुद्दों को प्रमुखता प्रदान की, जिनको लेकर अधिकांश हिंदी अखबारों का रूख उदासीन रहा. प्रभाष जोशी ने अपने व्यक्तिगत प्रयासों के द्वारा हिंदी मे विषय-विशेषग्यों द्वारा आलेख लिखवाने की परंपरा की शुरूआत की.
भाषाई दृष्टिकोड़ से प्रभाष जोशी ने हिंदी पत्रकारिता को बहुमूल्य योगदान दिया. अंग्रेजी अनुवाद पर टिकी हिंदी पत्रकारिता को, हिंदी के पूर्णकालिक पत्रकारों की नियुक्ति के द्वारा, भाषाई मौलिकता की रक्षा की. प्रभाष जी के संपादन में अखबार ने हिंदी के अपने शब्द संसार को गढा़ और अखबारों से लुप्त हो रही देशज-शब्द संपदा को बढा़या. हिंदी के अनेको शब्दों का सृजन किया, जो आज हिंदी पत्रकारिता के प्रयोग में लाये जा रहे हैं. प्रभाष जोशी को हिंदी पत्रकारिता में बहुमूल्य योगदान के लिये वर्षों याद किया जाएगा.
अनुज
छात्र, जनसंचार, म.गां.अं.हिं.वि.वि., वर्धा








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