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उमेश पंत
दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिले की दौड़ अन्तिम पड़ाव पर पहुंचने वाली है और कई लाख छात्रों में से कुछ हजार ही ऐसे हैं जिन्हें विश्वविद्यालय में पढ़ने का मौका हासिल होने वाला है। दाखिलों की इस पूरी प्रक्रिया को बेहद आसान कर देने का श्रेय विश्वविद्यालय प्रशासन को अवश्य दिया जाना चाहिये क्योंकि इसने छात्रों और उनके अभिभावकों के कई लीटर पसीने को बहने से बचाया है लेकिन मौजूदा वर्ष दाखिले की प्रक्रिया के कई कड़ुवी सच्चाईयों से लोगों को दो चार होना पड़ा है। मुझे अपनी ममेरी बहिन के एडमिशन के चलते इस सच से रुबरु होने का मौका मिला। दाखिले के लिए कटऔफ प्रणाली हांलाकि विश्वविद्यालय प्रशासन की न जाने कितनी मेहनत बचा देती है लेकिन छात्रों के एक बड़े वर्ग के लिए यह एक बेहद निराश कर देने वाली व्यवस्था है। बारहवीं में अच्छे नम्बरों से पास होने की आवश्यकता इस दाखिले की प्रक्रिया पर इस तरह चस्पा कर दी गई है कि छात्र चाहें भी तो बोर्ड के हौव्वे से बाहर नहीं निकल पाते। अच्छे नम्बर यानी टाप कालेज में दाखिला। इस प्रणाली के चलते सरकार के दसवीं में ग्रेड प्रणाली शुरु करके छात्रों के दबाव को कम करने जैसे सारे प्रयास बेमानी हो जाते हैं। सीबीएसई बोर्ड के छात्रों के लिए यदि मान भी लिया जाय की बारहवीं के अंकों को जांचने की प्रणाली लगभग एकसार है लेकिन यह बात अन्य बोर्डस के लिये लागू नहीं होती। उत्तराखंड बोर्ड, राजस्थान बोर्ड, या उत्तर प्रदेश बोर्ड सरीखे राजकीय संस्थानों की अवलोकन प्रणाली सीबीएसई से सर्वथा भिन्न है और यहां नम्बर देना पाप है का अतिश्योक्तिपूर्ण मुहावरा कभी कभी सही मालूम होता है। ऐसे में ऐसे स्थानों से आने वाले छात्रों के दाखिले के सपनों को टूटने में ज्यादा समय नहीं लगता। दूसरा पिछड़े इलाकों की शिक्षा व्यवस्था की चर्मराई हालत किसी से छिपी भी नहीं है।
अगर मान भी लिया जाय कि अब इन वोर्डस के नतीजों में सुधार होने लगा है तो भी कटऔफ का खेल अलग अलग कालेज की मोनोपौली से बड़ा जटिल हो चला है। हर कालेज के अपने अलग मानदन्ड हैं। मसलन इस बार रामजस कालेज में इतिहास मे दाखिले के लिये दूसरी कटआफ में 75 प्रतिशत अंकों का मानदंड तय किया गया। जब छात्र कालेज पहुचे तो पता चला कि कला वर्ग के छात्रों के लिए तो यही मानदंड है लेकिन विज्ञान वर्ग के छात्रों को दाखिले के लिए 85.5 प्रतिशत अंकों की जरुरत होगी। जबकि यह बात कहीं भी कटआफ लिस्ट समाचार पत्रों में जारी होने के दौरान उल्लेखित नहीं की गई। ऐसे में विज्ञान वर्ग का जो छात्र अपनी अंकतालिका के पिचहत्तर प्रतिशत अंको के साथ एडमिशन की आस लेकर गया, उसके सपने वहीं ढ़ेर हो गये। यही हाल आईपी कालेज में भी रहा। दौलत राम कालेज में जुलौजी में एडमिशन के लिए शर्त लगा दी गई की विज्ञान के तीन विषयों के योग को कटआफ में शामिल किया जाएगा जबकि इस बार सामान्य नियम यह था कि बेस्ट चार विशयों के आधार पर दाखिला मिलेगा। पीजीडीएवी में कोर सब्जक्ट जैसे अंग्रेजी कोर या हिन्दी कोर में से किसी एक ही विशय को बेस्ट फोर में शामिल करने का नया नियम बना दिया गया।
ऐसे में एक छात्र चाहे भी तो समाचार पत्रों में छपी कटआफ लिस्ट पर भरोसा नहीं कर सकता। फिर इस कटआफ को प्रकाशित करने का फायदा ही क्या और कटआफ के आधार पर एडमिशन का यह नाटक क्यों। पहले सेंट स्टीफेंस या एलएसआर जैसे कालेजों की मोनोपौली सार्वजनिक रुप से बदनाम थी लेकिन प्रक्रिया के भीतर झांकने पर पता चलता है कि दरअसल यह मोनोपौली का कीड़ा तो हर कालेज को लगा हुआ है ऐसे में मानदंडों की इस भिन्नता का खामियाजा एसे औसत छात्रों को भुगतना पड़ता है जिनमें सम्भावना तो बहुत हैं पर उन्हें अपने भीतर छिपी सम्भावना को न जाने किस कारण से अंकों में बदलना नहीं आया। इस मोनोपौली में कुछ गलती मीडिया की भी है। मीडिया ने कुछ कालेजों को स्टार कालेज बना दिया। नौर्थ कैम्पस जैसे यूनिवर्सिटी कैम्पस ना हुआ छात्रों की नीद हराम कर देने वाला सपना हो गया। किरोड़ीमल, हिन्दू, सेंट स्टीफेंस जैसे कालेज कालेज ना हुए जिन्दगी संवार देने वाले मसीहे हो गये। इतना ग्ल्ैामर का तड़का इनमें मीडिया ने लगा दिया कि छात्र समझने लगे कि यहां एडमिशन मिल जाये तो जन्नत फिर और क्या हो। ऐसे में छात्रों की भीड़ नोर्थ कैम्पस में जुटने लगी और इन कालेजों की मोनोपौली बढ़ने लगी। देखादेखी कैम्पस के बाहर के कालेजों ने भी अपना रसूख दिखाने के लिए नये नियम कानून दाखिले की प्रक्रिया से जोड़ दिये। कायदे से विश्वविद्यालय प्रशासन के नियमों में एकसारता होनी चाहिये जो हर कालेज के लिये लागू होने चाहिये। ताकि छात्रों को अनावश्यक टेंशन और दबाव से बचाया जा सके। जामिया या जेएनयू सरीखे विश्वविद्यालयों की तरह दाखिले के लिए लिखित परीक्षाओं का तरीके को अपनाना भले ही दिल्ली विश्वविद्यालय के लिए मौजूदा हालातों में प्रायोगिक ना हो, परन्तु कालेजों की मनमानी समाप्त करने की मुहिम छेड़नी तो हजारों छात्रों के हित में जरुरी है और किसी कालेज का अपना हित छात्रों के हित से बड़ा नही हो सकता। यह बात कालेजों की समझ में आनी जरुरी है।
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