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अलाउद्दिन खिलजी और मलिक काफूर का "दोस्ताना"




मित्रों आपने इतिहास में दिल्ली सलतनत के सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी के बारे में पढ़ा होगा ही , यह पहला विदेशी सल्तनत का नुमाइंदा था जिसने दक्षिण भारत पर अपनी पकड़ अपने सेना नायक मलिक काफूर के द्वारा जमाई .

मलिक काफूर सुल्तान अल्लाउद्दीन खिलजी का विश्वासपात्र सेनापति था जिसे खिलजी ने खंबात की लड़ाई के बाद 1000 दिनार में खरीदा था . मलिक काफूर मूल रूप से हिंदू परिवार में पैदा हुआ एक किन्नर था , जिसको लोक लाज के डर से उसके परिवार वालों ने उसे बेसहारा छोड़ दिया . यही उनकी सबसे बड़ी ग़लती साबित हुई क्योकि आगे जा कर यही मलिक काफूर खिलजी की पाक फौज में शामिल हुआ और हिंदुओं पर तमाम ज़्यादतियाँ कीं .

अलाउद्दिन खिलजी बेशक एक महान योद्धा था लेकिन वह व्याभिचारी सुल्तान था , यह कहना उचित होगा की वह भारतीय इतिहास का पहला समलिंगी था . जी हाँ यदि यूनिवर्सिटी ऑफ मोंटनना की प्रोफेसर वनिता रुथ की माने तो यह बात शत प्रतिशत सही है , जिसका उल्लेख उन्होने अपनी पुस्तक Same-sex Love In India: A Literary History [ISBN Number: 0143102060, 9780143102069, 978-0143102069] में किया है . किताब में यह भी लिखा है की सुल्तान खिलजी मलिक काफूर के सौंदर्य पर फिदा हो गया था और उसे खंबात की लड़ाई के पश्चात बतौर गुलाम खरीदा था . यह पता चलता है की अलाउद्दिन खिलजी के मलिक काफूर के साथ समलिंगी रिश्ते थे.

अलाउद्दिन खिलजी , मलिक काफूर पर इतना भरोसा करता था क़ि एक काफ़िर खानदान में पैदा होने के बावजूद एक किन्नर व्यक्ति को तमाम मज़हबी खिलाफत के बावजूद उसने उसे अपनी सेना का प्रधान सेनानायक बना दिया था . कालांतर में मलिक काफूर ने इस्लाम क़ुबूल किया और दिल्ली सल्तनत के प्रति वफ़ादारी की कसमें खाईं .

इसी मलिक काफूर ने बाद में दक्षिण भारत के हिंदू राज्यों पर चढ़ाई करी और हज़ारों लाखों गैर मुस्लिमों को मौत के घाट उतारा . वारंगल , देवगिरी और पांड्या राज्यों को देखते ही देखते मलिक काफूर और उसकी मज़हबी सेना ने धूल चटा दी ,

मलिक काफूर ने बाद में रामेश्वरम में मस्जिद बनवाई . वारंगल के काकतिया राजा को काफूर के साथ संधि करनी पड़ी और इसी के तहत अकूत धन संपदा से अलग मलिक काफूर को कोहिनूर हीरा बतौर उपहार प्राप्त हुआ जिसे उसने अपने मलिक और समलिंगी साथी सुल्तान अलाउद्दिन खिलजी को भिजवाया . खिलजी उसकी कामयाबी पर फूला न समाया और उसको सेना में और अधिक अधिकार बहाल किए.

मलिक काफूर के कामयाबी का राज़ यही था की जो भी अमूल्य वास्तु उसे युद्धों , चढ़ाई और संधियों में प्राप्त होतीं वह तुरंत अपने सुल्तान के कदमों में उसे पेश करता , इसलिए वह खिलजी का विश्वासपात्र था. लेकिन इसी खिलजी का जब मलिक काफूर से मोह भंग हुआ तो उसने उसे जान से मरवा दिया , यह कहानी भी बड़ी रोचक है आइए देखें.

सन 1294 के करीब देवगीरि राज्य अलाउद्दिन खिलजी के सीधे नियंत्रण में आ गया संधि के तहत देवगीरि के यादव शासक हर साल दिल्ली सल्तनत को एक तयशुदा रकम भिजवाते थे , किन्ही कारणों से यह रकम बकाया होती रही , और 1307 में अलाउद्दिन खिलजी ने अपने विश्वास पात्र मलिक काफूर को इसे वसूलने देवगिरी भेजा , मलिक काफूर ने देवगीरि पर चढ़ाई की और धन दौलत लूट कर दिल्ली भिजवाई साथ ही साथ , देवगीरि के शासक रामदेव की दो सुंदर बेटियों को

उठवा कर दिल्ली में अलाउद्दिन खिलजी के हरम में भिजवा दिया. जब खिलजी ने इन राजकुमारियों के साथ सोने की इच्छा जताई , तो बड़ी राजकुमारी ने युक्ति लड़ते हुए मलिक काफूर का नाम यह कहते हुए फँसा दिया की हमे बादशाह की खिदमत में पेश करने से पहले ही मलिक काफूर हमारे साथ सब कुछ कर चुका है. अलाउद्दिन खिलजी एक वासनायुक्त भेड़िया था जिसने अपनी गंदी नज़र चित्तोड़ की रानी पद्‍मिनी पर भी डाली थी. राजकुमारियों की बात सुनकर अलाउद्दिन खिलजी गुस्से से पागल हो गया , उसने उसी वक्त मलिक काफूर की गिरफ्तारी का हुक्म जारी कराया . मान्यता है की उसने काफूर को गाय की चमड़ी में बाँध कर दिल्ली लाने का आदेश दिया , जब मलिक काफूर को दिल्ली लाया गया उसकी घुटन से मौत हो चुकी थी. यह देख कर राजकुमारी खिलजी से बोली की ऐसा आदेश देने के पहले उसे पूरी जाँचपड़ताल करनी चाहिए थी. गुस्से में मूर्ख खिलजी यह भी भूल गया की मलिक काफूर एक किन्नर है . अपनी बेवकूफी से आगबबूला खिलजी ने दोनो राजकुमारियों के हाथ पैर बाँध कर उन्हे ऊँची पहाड़ी से फिंकवा दिया.
सन 1316 में मलिक काफूर की मौत से दुखी और निराश अलाउद्दिन खिलजी ड्रोपसी [एडीमा] से चल बसा , हालाँकि यह माना जाता है की उसकी हत्या उसके एक सेनापति मलिक नायाब ने करवाई।

नोट : लेख में दी गयी हैरतअंगेज़ जानकारी से कुछ लोगों को सदमा लगने की गुंजाइश हैं, अतः अनुरोध है की कोई भी टिप्पणी करने के पूर्व टिप्पणीकार वनिता रुत और सलीम किदवई की किताब "Same-sex Love In India: A Literary History [ISBN Number: 0143102060, 9780143102069, 978-0143102069] " पढ़ें और फिर अपनी टिप्पणी दें। यह लेख किताब में दी गयी जानकारी और IndiaNest.com में दी गयी जानकारी पर आधारित हैं.

4 comments:

सतीश पंचम said...

हरिश्चंद्र वर्मा की मध्यकालीन भारत( भाग- 2) में भी यह उल्लिखित है । शायद NCERT की किताब में भी कहीं हल्का सा इस बात उल्लेख है।
रही बात सदमें की जो आप ने पोस्ट के अंत में लिखा है तो स्पष्ट कर दूँ कि इतिहास पढने का एक कारण यह भी है कि इतिहास हमें चौंकने से बचाता है। सदमा उन्हें लगता है जो सदमा लगने का दिखावा करने में अव्वल रहते हैं। आम जन को सदमा फदमा लगने की कौन कहे, उन्हें तो यह भी पता नहीं होता कि ये अलाउद्दीन खिलजी कौन था।

यहाँ विडंबना यह है कि ज्यादातर लोगों को इतिहास पढना ही नहीं आता। यदि कुछ अलग सा इतिहास पढने मिले तो लोग तोड फोड मचाने लगते हैं । सही सही इतिहास लिखने के लिये अब पहले के मुकाबले ज्यादा हिम्मत की जरूरत पडती है।

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

खोजने पर नये तथ्य प्रकट हुए हैं कि भारत का इतिहास अंग्रेजों ने कम और हिन्दू लेखकों ने अधिक झूठे तथ्य घुसेड़ कर साम्प्रदायिक बनाया है और मुसलमानों के प्रति विषवमन किया है। विशम्भर नाथ पांडे पूर्व राज्यपाल उड़ीसा ने लिखा कि वे जब टीपू सुल्तान पर शोध कर रहे थे तो एक छात्रा के पास पुस्तक देखी, जिसमें लिखा था कि टीपू सुल्तान ने तीन हजार ब्राह्मणों को बलात इस्लाम धर्म कुबूल करने को विवश किया था और तीन हजार ब्राह्मणों ने आत्महत्या कर ली थी। यह लेख एक हिन्दू लेखक पंडित हरप्रसाद शास्त्री का लिखा हुआ था। विशम्भर दयाल पांडे ने पं. हर प्रसाद से लिख कर पूछा कि यह कहां पर लिखा है तो हर प्रसाद ने कहा कि यह मैसूर के गजट में लिखा है पर गजट देखा गया, तो गजट में यह तथ्य कहीं नहीं पाया गया। इस प्रकार हिन्दू लेखकों ने मुसलमान बादशाहों के बारे में वैमनश्यतावश बहुत कुछ झूठ लिखा है। यही औरंगजेब के बारे में भी है। टीपू के बारे में तो यह प्रसिद्ध है कि उसका सेनापति ब्राह्मण था, वह 150 मंदिरों को प्रतिवर्ष अनुदान देता था, और श्रृंगेरी के जगतगुरु को बहुत मान्यता देता था। इससे साबित होता है कि इतिहास जानबूझ कर अंग्रेज लेखकों ने नहीं हिन्दू लेखकों ने ही झूठ लिखा है।

Chinmay said...

सलीम [स्वच्छ] साहब , इसीलिए मैने कहा था की पहले किताब पढ़ लें और फिर अपनी राय दें, मुझे पूरा यकीन है की आपने पुस्तक पढ़ने की जहमत भी नही उठाई होगी , खैर आपकी जानकारी के लिए बता दूं इस पुस्तक के सह लेखक किदवई साहब हैं , जो की एक मुसलमान हैं. टीपू सुल्तान और औरंगजेब की बर्बरता के क़िस्से मशहूर हैं औरंगजेब ने दक्षिण भारतीय ब्राम्‍हणों का जीना हराम कर रखा था , औरंगजेब तो इतना फ़िरकापरस्त था की उसने शीया लोगों को बेदर्दी से मरवाया , इसी तरह सिक्खों के गुरुओं को भी इसी औरंगजेब और उसके बाप ने कत्ल किया. ज़्यादा नही कहूँगा लेकिन विदेशी इतिहासकारों की किताबें उठा कर देख लीजिए जिन्होने औरंगजेब और तमाम मुघलिया सलतनत के झंडाबार्दारों की काली कर्तूते जाहिर कर दीं हैं .

javed shah said...

जनाब नमस्कार...इतिहास को सही तरीके से लिखा गाया है या ग़लत ?बहस का विषय हो सकता है लेकिन आप अपने हिसाब से क्यों सोच रहे है?