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सविता भाभी के बहाने स्‍त्री विमर्श! राम ही राखै!!

अरविंद शेष

ब्‍लॉग पर नैतिकता के कुछ अलंबरदार दो दिनों से दुखी थे कि कुछ टॉयलेट कमेंट मोहल्‍ला पर पसरे हुए हैं। उन्‍होंने अपने दुख और गुस्‍से का सार्वजनिक और निजी पाठ किया - तब तक इस ब्‍लॉग मॉडरेटर ने न तो वे कमेंट पढ़े थे और न ही इनके एतराज़। दो दिनों बाद जब इंटरनेट कनेक्‍ट हुआ, तो उन टिप्‍पणियों को डिलीट किया गया और दुखी ब्‍लॉगरों से निजी और सार्वजनिक माफी मांगी गयी। कमेंट मॉडरेशन डाल दिया गया है, लेकिन यह थोड़े दिनों के लिए ही है। इन दिनों में भी, जबकि मॉडरेशन चालू है, अगर आप नाम बदलकर घातक हमले करना चाहें, तो कर सकते हैं - उन्‍हें प्रकाशन की अनु‍मति होगी। मॉडरेशन की वजह से उन्‍हें चंद घंटों का इंतज़ार करना पड़ सकता है - लिहाजा उन तमाम अनामों से अग्रिम क्षमायाचना। अभी परसों अरविंद शेष ने विनीत के आलेख पर यह पोस्‍ट पब्लिश की थी, लेकिन अवांछित कमेंट से डर कर उन्‍होंने पूरी पोस्‍ट ही डिलीट कर दी। अब उसे दोबारा प्रकाशित किया जा रहा है। उम्‍मीद है, बात आगे बढ़ेगी।
बात कहां तक पहुंचेगी, मुझे नहीं मालूम। लेकिन फिलहाल मोहल्ला के पाठकों से निवेदन है कि सविता भाभी डॉट कॉम मार्का स्त्री विमर्श देखिए-सुनिए, गुनिए और अपना ही सिर धुनिए...

दिन में घुसते ही बड़े संघर्ष के बाद इस कथित विमर्श के पार उतरा और रात में दूरदर्शन (शनिवार को) पर एक देखी हुई फिल्म अस्तित्व देखी। उसी समय दिन का विमर्श याद आया और वासुदेव भट्टाचार्य की फिल्म आस्था में एक प्रोफेसर दंपति की कहानी भी याद आयी। अफसोस कि दोनों फिल्मों की नायिकाओं को किसी सीन में सविता भाभी टाईप का कोई डॉट कॉम देखते हुए नहीं दिखाया गया। अव्वल तो शायद उस वक्त सविता भाभी... पैदा नहीं हुई थीं (पता नहीं, तब इस तरह के दूसरे डॉट कॉम थे या नहीं) और दूसरे कि अगर कोई और एक्साइटिंग साइट का सहारा ले लिया जाता, तो इन दोनों फिल्मों की नायिकाओं को अपने अस्तित्व के लिए उतनी जद्दोज़हद करने की ज़रूरत ही कहां पड़ती। फिर कहानी भी नहीं बढ़ती। सॉरी, फिर कहानी तो अइसा बढ़ती कि सविता भाभी... की तरह फिल्मों की धारावाहिक ही चलाना पड़ता।

अब आगे बढ़ते हैं। (बहुत ज्यादा बढ़ने का न तो इस्‍कोप है और न इर्रादा - इसलिए धीरज को पकड़े रहिएगा। नही त बरॉड माइंडेड लोगों में आपका गिनती नहीं होगा। (भाषा में लिंग की भयानक गड़बड़ियां हैं न!) कोई बात नहीं। बात कहने का कोशिश करता हूं)

सविता भाभी... पर एक लड़की के कमेंट के बहाने स्त्री विमर्श के व्याख्याकार फरमा रहे हैं कि तमाम की तरह की मुक्ति और बदलावों की बात कर लेने के बाद कोई स्त्री सेक्स पर बात करती है। लेखक (गलती से ले के बाद एक ठो (बिहारियों को किसी संख्या के बाद "ठो" कहने की आदत होती है) आ का डंडा लग गया है। माफ किजिएगा, अब कोन पीछे जेके डी-लिट करे। (लगता है डिलीट में भी मात्रा गड़बड़ा गया। कोई बात नहीं। बात है तो आगे बढ़ेगी।) महोदय स्त्री विमर्श की बात को तमाम तरह की मुक्ति में शामिल नहीं करते। खैर! करते हैं बदलाव की बात।

बदलाव के किन-किन चरणों को पार कर एक स्त्री सविता भाभी... पर पहुंचती है? बदलाव और मुक्ति की आपकी अवधारणा क्या है? एक स्त्री और पुरुष के दिमागी ढांचे का हमारे इस सामाजिक ढांचे से क्या कोई ताल्लुक है? इस सामाजिक ढांचे का सत्ता-सूत्र किनकी उंगलियों से जुड़ा और संचालित होता है? और दूसरे बहुत सारे सवालों को छोड़ कर एक आखिरी सवाल कि इस पूरे ढांचे में वे कौन-कौन से बदलाव हैं, जिन्हें पार कर एक स्त्री खुल कर सेक्स के स्तर पर बात करना चाहती है?

माफ करिएगा दोस्तो! इस आखिरी सवाल के बाद मैं कई और सवालों से जूझने लगता हूं। मसलन, सबसे आधुनिक दिखते हुए (और जाहिर है, यह आधुनिकता कपड़ों और फैशन के स्तर पर ही होगी) जब हम सड़क पर अपना गुरूर बिखेर रहे होते हैं। क्या हम उस वक्त अपने भीतर की हिंदू-मुस्लिम या किसी और मजहब या फिर ब्राह्मण या चमार की चेतना से मुक्त हो चुके होते हैं? लो-वेस्ट जींस या फंकी टाईप आधुनिकता ओढ़े हम अपने अस्तित्व को बाजार के गटर में गिरवी रख चुके होते हैं और गुमान में फूले नहीं समाते कि हम आधुनिक हो गए! डॉक्टरी, इंजीनियरी, पीएचडी, कलक्टरी या ऐसी तमाम पढ़ाइयों के बाद बाप के बहाने ब्याह के रास्ते दहेज के रूप में कीमत तय करते वक्त अपनी ही दलाली कर रहे होते हैं और आधुनिकता का ठेका भी उठाते हैं! मॉडर्न आउटलुक का इनरलुक कितना जातिवादी होता है और जातिवाद के किन महीन औजारों के साथ हैसियत का खेल खेलता है, क्या उसी सॉफिस्टिकेटेड ऐयारी को आधुनिकता कहना चाहते हैं हम?

देह के दम पर सबकी नजर अपनी ओर खींचने की कोशिश को मुक्ति का मार्ग समझने वाली या सविता भाभी... में अपनी पसंद जाहिर करने वाली लड़की का यह हक है कि अपने वजूद के एक सबसे जरूरी हिस्से के तौर पर यौन आकांक्षाओं को अपनी कसौटी पर कसे। लेकिन जब हम इन्हीं में कइयों को सोलह-श्रृंगार कर सफेद घोड़े पर सवार राजकुमार पति का ख्वाब देखते या चांद को देख कर पति के इंतजार में भूख से ऐंठती अंतड़ियों के तनाव के साथ करवा चौथ निबाहते दिखते हैं, तब भी ये क्या उतनी ही आधुनिक होती हैं? ऐसी बहुत-सी आधुनिक लड़कियां तब पति-परमेश्वर की सारी मर्दानगी को अपने भीतर जज्ब करना अपनी खुशनसीबी समझने लगती हैं। फिर सविता भाभी... के जरिए पैदा हुई देह की उत्तेजनाओं की सारी ऊर्जा एक अच्छी बहू और फिर एक सख्त सास बनने की कल्पना में स्खलित होने लगती है। अपनी व्याख्या और जानकारी के दायरे में खुल कर सेक्स बतियाने वाली बहुत-सी औरतें अपने पति की तमाम दैहिक-मानसिक बर्बरताओं को उनका हक मानती हैं। वे औरतें सविता भाभी... के बारे में नहीं जानती होंगी, लेकिन जब वे इसे देखने-जानने भी लगेंगी, तब क्या सविता भाभी... छाप स्त्री विमर्श उनके दिमागों के ये जाले साफ कर सकेगा?

एक लड़की (?) इस डॉट कॉम पर कमेंट करती है और हम इसके स्त्री विमर्श का एक नया अध्याय होने की मुनादी कर देते हैं। करें भी क्यों नहीं। अब तक एक स्त्री का हंसना-रोना, मरते हुए जीना भी तो हम ही तय करते आए हैं। मित्रो मरजानी की उस स्त्री से सविता भाभी... की तुलना करते हुए हमारे सामने से यह मामूली-सी बात भी क्यों गुजर जाती है कि मित्रो मरजानी की उस स्त्री के फैसले का सामाजिक परिप्रेक्ष्य क्या है। कहीं यह हमारी सेक्स पर खुल कर बात करने की मर्दानी ताकत की सीमा तो नहीं है! हमारा पूरा नजरिया किस कदर खंडित है, इसका अंदाजा इससे लगाइए कि सविता भाभी... तक अपनी या किसी की पहुंच को हम सशक्तीकरण की कसौटी मानते हैं और मस्तराम मार्का लोग हमारी नजर में पिछड़े और असभ्य होते हैं। क्या फर्क है मस्तराम की किताबों और सविता भाभी... में?

समझना है तो ऐसे समझिए कि यह आभिजात्य और गैर-आभिजात्य का फर्क है। वर्गों की पहुंच और चुनाव का फर्क है। देखेंगे-सुनेंगे-गुनेंगे हम वही, लेकिन हमारा लैपटॉप या कंप्यूटर हमें आधुनिक बना देता है, खासतौर पर उनके सामने जो चाह कर भी मस्तराम के दायरे से ऊपर नहीं आ सके हैं।

आस्था फिल्म में प्रोफेसर पति दो मिनट में सब कुछ निपटा कर घोलट जाता है, जैसे कोई घंटो पान मुंह में चबा कर सेंकेडों में थूक दे। हालात का सिरा थामे पत्नी आखिरकार कहीं और ही मुक्त होती है और सब कुछ का विस्तार जान पाती है। क्या हमने अपने गांव-देहातों में ऊपरी असर या भूतों के चंगुल में फंसी जवान औरतों को ओझाओं के सामने बाल खोल कर झूमते देखा है? क्या हम अब भी यह अंदाजा लगा पाने में नाकाम हैं कि वे ओझा उन औरतों को किस तरह उनके भूतों से मुक्त करते होंगे? हम एक ऐसे अप्रशिक्षित मर्द समाज में जी रहे हैं दोस्तों कि उन्माद के दौरे तक पहुंची स्नावयिक उत्तेजनाओं के शमन के बिना हजारों औरतें हीस्टीरिया का शिकार हो जाती हैं और पंडितों-ओझाओं के अलावा उनका मुक्तिदाता कोई नहीं होता। स्त्री की देह को उसकी मुक्ति का एकमात्र रास्ता बताने वाले कई मर्द मित्रों की मस्तराम-छाप यौन जानकारियां और यौनांगों के बारे में मूढ़ धारणाएं मेरे सामने कुछ अजीब से सवाल खड़े करते रहे हैं।

सविता भाभी... तक जिनकी पहुंच है, वे देह के स्तर पर खुद को रिलीज करने के रास्ते निकाल लेंगी, लेकिन दिमागी जड़ताओं से निपटने का उनका रास्ता क्या होगा? बेशक सेक्स इज फॉर प्लेजर, लेकिन क्या यह स्त्री को एक व्यक्ति के रूप में स्वीकार किए बिना और यौन-कर्म को दो मिनट में फारिग होने की चीज समझने वाले मर्दों का उत्तेजना-केंद्रों का आविष्कारक हुए बिना मुमकिन है? ऑरगेज्म अगर पुरुषों की नियति है तो स्त्री का भी हक है। लेकिन जहां अपनी ही शारिरिक संरचना और उसकी बारिकियों को जानना-समझना एक शर्म का मामला हो और अपराध-बोध जगाता हो, वहां सविता भाभी... क्या सचमुच स्त्री विमर्श का एक नया पाठ तैयार कर रहा है?

इससे इनकार नहीं कि आज की लड़कियां अपने शरीर के बारे में इतनी अनजान नहीं हैं। मगर क्या इस सवाल के भी खत्म होने के आसार नजर आ रहे हैं कि हमारी औरतों के बरक्स जो मर्द खड़ा है, उसकी निगाह में सेक्स की मांग करने वाली औरत की जगह कहां है? अस्तित्व फिल्म का हीरो अपनी बीवी को पच्चीस साल पहले के एक बार के संबंध की खोज करने के बाद खारिज कर देता है और अपने कई स्त्रियों के साथ संबंध होने के एक मित्र के सवाल का जवाब यह देता है कि मैं तो एक मर्द हूं। यह वही आम मर्द है जो अपने प्लेजर के लिए ज्यादा से ज्यादा भोग करने लिए अपनी पहुंच में आई सभी स्त्रियों के सामने जाल फेंकता है और अपनी स्त्री के दिमाग में किसी और मर्द की बात की कल्पना से भी दहल जाता है। स्त्री की रोजमर्रा की चर्चा में सेक्स के खुलेआम होने के डर के पीछे भी यही एकाधिकार के बर्बर संस्कार है और डरा हुआ मर्द अहं है।

जहां तक सामंती और गुलामी की संस्कृति का सवाल है, हमें याद करना चाहिए एम-फिल या पीएचडी करती उन कनकलताओं के किस्से, जो पानी का नल छू देती हैं और इस देश का पानी अपवित्र हो जाता है। फिर जाति का हवाला और जलील करने के दौर। क्या इस संस्कृति में भी सविता भाभी... - छाप स्त्री विमर्श कोई दखल देने का रास्ता तैयार कर रहा है?

यह वहम पालने की जरूरत नहीं है कि औरतें अपनी लड़ाई या खुल कर सेक्स पर बात करने या इस मामले में सामने आने को वैधता दिये जाने के लिए इस समाज की मर्दानी ताकत के भरोसे बैठी हैं। वे अपने बूते हमारी मर्दानगी को आईना दिखा रही है, जिसमें हम बार-बार नंगे नजर आते हैं।

कभी फुर्सत मिले तो बालिका भ्रूण-हत्या की असली वजहों का पता लगाने की कोशिश कीजिएगा कि कितनी भ्रूण-हत्याओं के लिए दहेज जिम्मेदार है और कितने के लिए यह कुंठा कि हमारे भीतर दूसरी औरतों के लिए जो जगह होती है, वहां पहुंचने से पहले अपनी औरतों को हम बचा लेते हैं। जिस समाज में औरत के शरीर को ही उसकी हैसियत तय कर दिया गया है, उसे बनाए रखने में सविता भाभी डॉट कॉम छाप प्रगतिशीलता कितनी मदद करती है - यह भी खोजने की कोशिश की जानी चाहिए।

क्रांति-क्रांति चिल्लाने और क्रांति जीने में फर्क है। मुझे नहीं लगता कि दिल-दिमाग या बुद्धि की बदौलत अपनी शख्सियत दर्ज करने वाली लड़की के लिए सेक्स कोई वर्जित चीज है और वह कहीं से सेक्स को कम जीती है। हां, वह सविता भाभी जैसे डॉट कॉमों पर जाकर अपनी पसंद दिखाने को अपनी बहादुरी नहीं मानती। इसमें मुझे कोई शक नहीं कि यह लड़की उससे ज्यादा खतरनाक जरूर है, जिसका सविता भाभी डॉट कॉम पर एक कमेंट करना हमारे लिए एक आकर्षण की चीज बना हुआ है। और हममें से ज्यादातर सविता भाभी... पर जाकर उसका कमेंट देखने के बाद उसके आकार-प्रकार की कल्पना कर रहे होंगे। हम उस कमेंट करने वाली लड़की का पीठ जरूर थपथपाएंगे, ताकि वह हर अगले पोस्टों में नजर आए और उस खतरनाक लड़की से बचना चाहेंगे...!

दिमागी जड़ताओं से जब तक मुक्ति नहीं मिलती, केवल देह के रास्ते मुक्ति मुमकिन नहीं है।

16 comments:

ashok dubey said...

mujhe ek bhjpuri holi gaana yaad aa gaya...
ae devar,...rang da na cholia hamar darwaja band kar ke

ae bhauji,...rang debe cholia tohar darwaja band kar ke
..............................

is gaane me bhauji apne devar se darwaja band kar ke rang lagane ki baat kah rahi hai kyonki holi me uska pati ghar nahi aaya hai pardes se...fagun ka mad mast mausam me apne devar se rang lagawa kar sharirik sukh prapt karna chahti hai...is gaane me ek aurat ke andar ke sex ki kamna ko
bakhubi darshaya gaya hai..aurat bhi ek insaan hai uske andar bhi yaun ikshaye hoti hain..holi me pati ke pardesh se na aane ki virah usey tadpati hai...
bhojpuri me aise virah geet bhare -pade hain...
JALDI SE GAADI PAKAD LA HO RAJA AAG LAGAL BAA CHOLI ME...up-bihar me behad popular is geet ke madhyam se nayika apne pati ko chhithi likhkar jaldi ghar anne ko kehti hai ...nayika ke andar sex ki bhawna jagrit ho rahi hai isliyewo keh rahi hai AAG LAGAL BAA CHOLI ME9(AAG LAGI HAI CHOLI ME MERE)
lekin humare sanskriti me devar-bhabhi ka ek pavitra rishta bhi hai

SAACHI KAHE TOHRE AAWAN SE BHAUJI ANGANA ME AAI BAHAR BHAUJI
is geet me bhabhi ko lakshmi ka awtar mana gaya hai

ashok dubey said...

mujhe ek bhojpur holi geet ki aad aa gayee...

AE DEVAR...RANG DA NA CHOLIA HAMAR DARWAJA BAND KAR KE

AE BHAUJI..RANG DEBE CHOLIA TOHAR DARWAJA BAND KAR KE
...................................
yah holi geet bihar aur purbi UP me khoob popular folk geet hai
pati pardes me naukri karta hai..holi me bhi ghar nahi aa raha hai..fagun ke mad mast mahine me pati ke na aane se gori ka man virah viyog me hai..gori ke andar yaun utkantha prabal hilore mar rahi hai ...apne jawan dewar ko dekh fagun ka rang aur bhi jawa ho jata hai..pati ke virah aur fagun ki basanti bayar ko wo rok nahi paati aur devar ko rang lagane ko kehti hai darwaja band ke....
yeh lok geet darshata hai ki nari ke andar bhi kaam iksha hoti hai
.................................
JALDI SE GAADI PAKAD LA HO RAJA AAG LAGAL BAA CHOLI ME

bhojpuri ke is geet me gori apne sajan ko chhithi likh ke kehti hai ki jaldi se pardes se aa jao ..virah bedna ki aag me jal rahi hai gori aur wo kehti hai aag lagi hai mere tan badan me

aurat ke birah bedna ke aise gget hamari lok bhashaon me bhari padi hain...
UP-bihar ki ek log vidha purbi ko kabhi aap sune ...apne gaon se purabdesh(kolkata)ko gaye sajan ki gori kis tarah tadapti hai virah me
bakhubi dekhno ko milega
TOHE JAYE NAHI DEBE BIDESHWA HO AE HAMAR BALAMA
nari ke andar bhi sex ikshaye prabal hoti hain..in ggeto ke madhyam se pata chalta hai

Anonymous said...

tum log
saale manoge
nahin....


aur kitni gandgi udelte rahoge....

samajh me ye nahin aa raha avinash
tum aisa kar kyon raho...?

विनीत कुमार said...

अरविंद सर,तमाम तरह की असहमतियों के वाबजूद भी आपका शुक्रिया अदा करना चाहता हूं कि आपने मेरी बुझती हुई उम्मीद को पोस्ट लिखकर फिर जिंदा कर दिया। अब तक की दोनों पोस्टों पर जिस तरह के कमेंट आए और लोगों की ओर से जो प्रतिक्रिआएं हम तक पहुंची, उससे एकबारगी तो ऐसा लगा कि माध्यम के स्तर पर बदलाव आने के बाद भी हिन्दी समाज इस तरह के मसलों पर बात करने के लिए तैयार नहीं है। अधिकांश पोस्ट में मानसिक कुंठा ही उभरकर सामने आयी। आपने नए सिरे से विषय शुरु किया है। उम्मीद है कि इसके जरिए एक सार्थक बहस होगी।
विनीत

Anonymous said...

koi comment nahi hai

Suresh Chiplunkar said...

लगता है फ़िलीस्तीन और पाकिस्तान से पैसा कम आ रहा है, इसलिये सविता भाभी को बाजार में उतारकर पैसा और प्रसिद्धि कमाना चाहते हो… बढ़िया है लगे रहो… देश के भले के लिये कुछ न लिखना बस ऐसे ही कीचड़ में लोट लगाते रहो… जब मकसद गन्दगी परोसकर पैसा/नाम कमाना हो फ़िर तो सब जायज ही लगता होगा ना…

अशोक कुमार पाण्डेय said...

इस तरह का स्त्री विमर्श साहित्य मे हमारे राजेन्द्र जी लम्बे समय से चला रहे है।
एक सवाल अक्सर दिमाग मे आता है कि चेतना के स्तर पर मुक्त हुए बिना देह से मुक्त ये स्त्रिया किसके लिये ज़्यादा मुफ़ीद है? व्यापक महिला मुक्ति के लिये या फिर राजेन्द्र जी जैसे माहिर शिकारो के लिये।
हम क्या चाहते है? कल जिस तरह की बात चल रही थी मै चुप रहा। आज पूछ लेता हूँ - भाई जो लडको को सिखाया जा रहा है आप उसे जस्टिफ़ाई कर रहे है क्या? अगर नही तो उसे ग़लत बताया जाना चाहिये या फिर लडकियो को भी सिखाने की वक़ालत की जानी चाहिये?
स्त्री मुक्ति का रास्ता सविता भाभियो के डाटकामनाओ से नही उसकी आर्थिक सामाजिक मुक्ति और बराबरी के अधिकारो से होकर जाता है।

Anonymous said...

ये कमेंट पहले मैंने ‘अनाम’ ही पोस्ट किया था.
अब मैं नाम के साथ दोबारा उसे प्रेषित कर रहा हूं. मेरा विनम्र अनुरोध है अविनाश आपसे कि इस चूतियापे को यहां से तुरंत हटा लीजिए. मन बहुत घिनिया गया है. तुम्हारी छवि एक बेहद सतर्क और समझदार की बनी हुई है...क्यों उसके साथ चोट कर रहे हो...
‘न्यूड’ और ‘नेक्ड’ के अंतर को समझो भइया. प्लीज......
सविता भाभी को इस चैपाल से हटा दो यार....

गौरी शंकर




जो बातें बहुत स्वाभिक हैं, उन्हें बड़ा-चढाकर पेश किया जाना ठीक नहीं. सेक्स पर हमारा समाज शुरू से ही कहता और सुनता आ रहा है. कामसूत्र एक उदहारण भर है. सेक्स पर हर तरह की जवाब आना भी स्वाभिक हैं. लेकिन इस पर बहस करके अपने ब्लॉग को चर्चा में लाना आपकी कमजोरी दर्शाता है.

आज के खटिया चैनल जो भाषा और तरीका अपनाकर अपनी TRP बढा रहे हैं, यह उसी तरह का एक प्रयास है. हमारे आसपास गरीबी, बेकारी, पलायन, खूसखोरी और संघर्ष चल रहा है. यह बातें न गंदे चैनल ही बता सकते हैं और न आप. सामाजिक सरोकारों की बातें गायब हो रही हैं और सनसनी फैलाने वाली बातों को हवा मिल रही है.

मैंने इस ब्लॉग पर सामाजिक सरोकार से जुड़े लेख भी पढ़े. कुछ बहुत अच्छे भी हैं लेकिन अधिकतर मामलों में भाषाई हमला पर होता है और असली बात सिरे से छूट जाती है. यह दौर पत्रकारिता का निचला दौर है. जनसत्ता के हिलने के बाद भी कुछ समझदार बचे हैं. लेकिन वह दिखते नहीं. दिखते आप जैसे लोग हैं. यह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से निकले लोगों का काफिला है. जो आतंकवाद से भी खतरनाक है.इस जमात के रहते देश के असली मुद्दों की तह तक जाना मुश्किल हो रहा है.

अब रही बात 'राजकमल चौधरी'के नाम का उपयोग किया जाना. उनमे दो अच्छी बातें थीं. एक गांड में गूदा और दूसरी अक्ल. अक्ल भी दो तरह से. एक लेखनी की और दूसरी समाज की. इसमें से एक चीज़ आप के पास है और वह है आपकी गांड में गूदा होना. बाकी आपमें नहीं हैं. चिंदियों को मिलाकर कपडा सीना आपको आता हैं. मंटो या इस्मत आपा कभी दरजी नहीं बने. उनके पास अपने अनुभव थे. जिसपर चलकर उन्होंने दुनिया का बेजोड़ साहित्य रचा. आप उनके रस्ते पर चले, लेकिन अपनी अक्ल का पुर्जा दुरुस्त करके. उनकी दुहाई तो देश के सबसे तेज़ या सबसे जल्दी चलने वाले चैनल भी दे सकते है. तो क्या उनकी तुलना इन महान साहित्यकारों से करने लगे.

महेश भट्ट और सत्यजीत राय की फिल्मों मे अंतर करना सीखना होगा. इसमें थोडा समय बिताने की जरूरत है. कोई नहीं समय को बीतने दो. हमे 'सावधान जाग जाओ' की तर्ज़ से अलग हटकर मुकाम बनाना होगा.

यह मैं आपके लिए ही नहीं इस ब्लॉग को पढने वालों से भी कहना चाहता हूँ.

jayram said...

ITNI AAPA-DHAPIAUR BHARI UTHAL-PUTHAL WALE RAJNAITK -AARTHIK PARIDRISHYA MEIN SARI CHINTAON SE MUKT BLOG-JAGAT KE AAP JAISE KAI DIGGAJ NARI WIMARSH KI AAD LEKAR 'SEX ' CHARCHA MEIN ULJHA HAI................. ISKE BARAX KUCHH ANNYA BLOGON KE AALEKH EK ADAD TIPANNI KI BAT JOH-JOH KAR SARKARI DAFTARO KE DASTAWAJO KI BHANTI DHUL -DHUSRIT HO RAHE HAIN..................KYA TIPPNIKARO KA UNKE PRATI CHHUACHHUT KI MANSIKTA NAHI ?

arthaath said...

bahut afsos ki baat hai blog per bhi dhyan aakarsit karane ke liye savita bhabhi aur mastram ki tulana ki ja rahi.desh me mahila se jude aneko mudde blog per sthan kis liye nahi pa rahe ye sawal dil me uthal-puthal macha sakata hai.yahi jab rajendra yadav jaise log khulkar stri deh mukti ki baat karate hain to ise baudhik stri vimarsh kaha jata hai.savita bhabhi theek nahi hai lekin mahila vimarsh ko ocha banane ki jarurat nahi hai.kam vahi ho raha hai ki ek kavi ne kaha nari tera chndan sa badan.dusara usase santust nahi hua aur kahane laga ki nahi chandan sa badan nahi .

Abhisar said...

Hi Avinash ,

Kaise ho? Just came to your blog after a long time . All the best .take care

एस. धरम said...

कयी दिनो से मोहल्ला पर महन्तो के प्रवचन सुने. ये वही शुद्धतावदी लोग है जो रात मे बलात्कार करते है और दिन मे पन्चायत. सेक्श पर बहस करना इनके बूते की बात नही. हमारा जारकर्मी समाज इन्तर्नेत पर बदल जयेगा यह मुस्किल है.

anil yadav said...

त्राही माम ,त्राही माम.....

भूत पिशाच निकट नहीं आवैं ....महावीर जब नाम सुनावैं....
जय बजरंग बली की....

भद्रजनों को सदबुद्धि दो प्रभु....

विजय ठाकुर said...

ई का मोहल्ला में एतना घिनमा-घिनमी काहे चल रहा भाई. इस्तीरी बिमर्स, कीजिए खूब कीजिए लेकिन जूतम पैजार नही न कीजिए. ठीक है मोहल्ले में सब कुछ होता है. अविनाश भाई मान लिया आपने सविता भाभी को मोहल्ले में बुला लिया अच्छे मकसद से लेकिन स्त्री विमर्श तो गया चूल्हे में. कौन किसकी ले रहा है पता नहीं लेकिन इसमें कोई इस्तीरी बिमर्स वोगेरा हमको नहीं दिखता भाई लोग।

योगेन्द्र मौदगिल said...

Jai ho.................

मिथिलेश श्रीवास्तव said...

अविनाश जी, 'मोहल्ला' को 'हंस' की तरह क्यों उड़ा रहे हैं !