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सविता भाभी डॉट कॉम पर आपका स्‍वागत है!

विनीत कुमार

अभी एक दिन दीवान पर कुछ खिचड़ी पकती हुई देखी, तो समझ में नहीं आया - लेकिन विनीत ने फोन पर बताया कि सविता भाभी के बहाने स्‍त्री विमर्श की कोशिश पर कुछ स्‍वनामधन्‍य फिकरे कस रहे हैं। वैसे ही, जैसे कभी इस्‍मत की कहानी पर लोगों ने बवाल काटा था और राजकमल चौधरी के एक उपन्‍यास को बाज़ार में आने से रोकने के लिए छापेखाने को सील कर दिया गया था। फिर मैंने विनीत के ब्‍लॉग को खंगाला, तो बड़ी निराशा हुई कि लोगों ने इस मसले पर बात ही नहीं की। मैं मोहल्‍ले पर उस पोस्‍ट को दोबारे चढ़ा रहा हूं। मक़सद और हसरत ये है कि लोग इस विषय की गंभीरता को समझें और बात करें।
विनीत,
संभव है लड़की ने जो नाम फैन क्लब में दिये हों वो गलत हो और अपनी पहचान छुपाने की कोशिश की गयी हो, लेकिन एक बात तो समझ में आती ही है कि सेक्स को लेकर लड़कियों ने भी अपनी पसंद औऱ नापसंद जाहिर करनी शुरू कर दी है।

यदि पहचान गलत की संभावना पर विचार कर रहे हैं, तो कतई समझ नहीं आता कि लड़कियों ने यौन अभिव्‍यक्तियां शुरू कर दी हैं। और अधिक संभवना है कि ऐसा ही है। पोर्न कंटेंट की दुनिया में लेस्बियन संबंधों के चित्रण के ग्राहक (पाठक/व्‍यूअर) पुरुष समझे जाते हैं। यानि जिन सामग्री में समलैंगिग स्‍त्री संबंधों का चित्रण होता है, उनके ‘रसास्‍वादन’ में पुरुष रुचि मानी जाती है।

‘तो ऐसी लड़कियों का क्या कर लेगें आप। सिवाय दिन-रात ये मनाने के कि हे भगवान ऐसी लड़कियों की संख्या न बढ़े।’

हमारे मनाने से क्‍या होता है? हम तो ये भी मनाते हैं कि नया नया लैपटाप लिए पीएचडी के शोधार्थी सविताभाभी के द्वारे जाने के स्‍थान पर शोध पर ध्‍यान दें। कुछ होता है हमारे मनाने से :)पर विजेन्द्र जी,
देखिए कि नया लैपटॉप लेने के बाद ये पीएचडी का शोधार्थी कितना ज़्यादा प्रोडक्टिव हो गया है। और सविता भाभी भी उसके शोध का हिस्सा माना जाए। क्या ख़याल है?विजेन्द्र सर
मेरे ही विभाग में अभी दस दिन पहले ही एक लड़की लेस्बियन संबधों पर एम.फिल जमा करके फ्री हुई है। इन दिनों कैंपस के आसपास चाय पीती हुई मिल जाएगी। उसके लिए सविताभाभी जैसे मसले पर बात करने से उसकी रिसर्च को एक ज़मीन मिल रही थी। कहीं से इस बात को नहीं इस तरह से नहीं लिया कि मैं बाकी के सारे रिसर्च के काम को छोड़ कर इधर-उधर (साइट पर ही) भटकता हूं। आपके द्वार शब्द के प्रयोग में एक अलग किस्म की बारीकी पाता हूं। इसलिए मेरे प्रति आप चिंतित हो उठे। दरअसल, मैं सविताभाभी की बात को सिर्फ पसंद-नापसंद तक शामिल करके नहीं देखना चाहता। मैं तो इस बात पर बहस करना चाह रहा था कि आख़‍िर लड़कियों को सेक्स के मामले में खुल कर क्यों बात नहीं करनी चाहिए। मैंने शायद अंतिम पैरा में आप शब्द का इस्तेमाल कर दिया, जिसे आपने अपने चपेटे में ले लिया। इसे डिलीट न करते हुए भी आप सबों से माफी चाहता हूं।

नेट पर ये भी संभव है कि लड़की की फोटो और नाम से कोई लड़का ही स्क्रैप लिख गया हो जैसा कि आपका अध्ययन से निकलकर आता है। मैंने भी देखा है कि कई लड़कियां और कुच लड़के ऑरकुट पर उन तस्वीरों को लगा जाते हैं जो कि वो होते ही नहीं।

सरजी, आप मेरे रिसर्च को लेकर इतना गंभीर हैं, जानकर अच्छा लगता है। नहीं तो जैसे आज आप सविताभाभी को भटकने और बिगड़ने की चीज़ मान बैठे, उसी तरह कुछ महीने पहले कुछ लोग टेलीविज़न को भी लेकर ऐसे ही मान लिया था। आज मामला स्वाभाविक है। संभव है, आनेवाले समय में आज आप जिस बात से असहमति जता रहे हैं, वो भी स्वाभाविक मान लें।

और अंत में, सरजी अपने नये लैपटॉप को लेकर इतना सतर्क और डरा रहता हूं कि बाहरी सुरक्षा के लिहाज से गोदरेज में ताला लगाकर रखता हूं, जबकि आंतरिक सुरक्षा के तौर पर हर साइट खोलने के पहले बहुत डरता हूं। इसलिए यदि मेरी इस पोस्ट को नये लैपटॉप की उपज मानते हैं, तो उचित नहीं है। इतना ज़रूर है कि लिखना इस पर बहुत पहले से चाहता था, लेकिन कहीं दूसरी जगह से लिखना संभव नहीं हो सका। हां, कोई मज़बूत एंटी-वायरस दिलाने का भरोसा दे दे कि कुछ भी देखने से सेव की हुई चीज़ों का कुछ नहीं होगा तो एक शोधपरक लेख इस विषय पर बाकी की साइटों को देखकर जरुर लिखना चाहूंगा। और सिर्फ वेब गर्ल की आजादी को लेकर ही नहीं, बाजार, देसी पोर्न की बढ़ती साइटें और क्यों इसे सोशल एक्सेपटेंस न मिलते हुए भी प्रैक्टिस के तौर पर जमकर पॉपुलरिटी मिल रही है।

उम्मीद है कि आगे इस तरह की बहसों को व्यक्तिगत स्तर पर जोड़कर देखने के बजाय एक विमर्श के तौर पर लिया जाएगा। शुक्रिया सहित
विनीत
सविताभाभी.कॉम से मिलते-जुलते ऑफलाइन सामग्रियों पर एक शोध अभय कुमार दुबे जी ने किया था, जो बाद में ‘दीवान-ए-सराय’ में भी छपा था। रविकान्त जी वाली सलाह को ही और आगे बढ़ाते हुए मेरी ये गुजारिश है कि ऑनलाइन पॉर्न सामग्रियों पर किया जाने वाला कोई भी काम सेक्‍सुअल्टी के सवाल पर संभवत: कोई नया नज़रिया दे सकेगा। मेरे ख़याल से ऐसे अध्ययनों की सख़्त दरकार है।
सविताभाभी.कॉम के फैन क्लब में एक लड़की ने स्क्रैप लिखा कि ‘मैं सविताभाभी को रेगुलर पढ़ती हूं। मैं लेस्बियन हूं और चाहती हूं कि सविताभाभी के लेस्बियन के साथ संबंध दिखाये जाएं।’ संभव है, लड़की ने जो नाम फैन क्लब में दिये हों, वो गलत हो और अपनी पहचान छुपाने की कोशिश की गयी हो, लेकिन एक बात तो समझ में आती ही है कि सेक्स को लेकर लड़कियों ने भी अपनी पसंद औऱ नापसंद जाहिर करनी शुरू कर दी है।

अपने यहां देखें, तो स्त्री और पुरुषों को लेकर सेक्स और शारीरिक संबंधों के मामले में अलग-अलग मानदंड रहे हैं। स्त्रियों के लिए सेक्स या सहवास वंशवृद्धि के लिए है, खानदान के चिराग को जलाये रखने के लिए है, बुढ़ापे के लिए लाठी की टेक के रूप में औलाद पैदा करने के लिए है। इसके आगे सहवास का उसके जीवन में कोई अर्थ नहीं है। इसमें न तो उसकी इच्छा, न खुशी और न ही संतुष्टि शामिल है। स्त्रियों के लिए सहवास धर्म की तरह है और जिस तरह धर्म का पालन इच्छापूर्ति के बजाय साधना के लिए की जाती है, उसी तरह स्त्रियों के लिए सहवास साधना के तौर पर पारिभाषित होकर रह जाती है, जिसकी अंतिम परिणति है, मातृत्व को प्राप्त करना, बस।

पुरुषों के लिए भी सहवास एक धर्म की तरह है, जिसमें सिर्फ संतान पैदा करना और वंशवृद्धि करना तो होता ही है, लेकिन उसके जरिये आनंद प्राप्त करने की छूट मिलती नज़र आती है। नहीं तो तथाकथित महान ग्रंथों में, एक पुरुष के लिए कई स्त्रियों के विधान को धार्मिक कलेवर न दिया जाता। खैर...

सेक्स को लेकर किसी गंभीर अवधारणा में न भी जाएं और फिलहाल इस बात को शामिल कर लें कि सेक्स शुरू से ही सिर्फ और सिर्फ संतान पैदा करने के लिए ज़रूरी विधान नहीं रहा है। पुरुषों के मामले में तो बिल्कुल भी नहीं। दबे-छुपे ही सही, लेकिन इसे आनंद के साथ स्वीकृति मिलती रही है। अब तो ये कॉन्सेप्ट के तौर पर है - कि सेक्स इज फॉर प्लेजर। सेक्स आनंद के लिए है। इस कॉन्‍सेप्ट का सबसे मज़बूत उदाहरण आपको देशभर के पुरुष टॉयलेटों में चिपके सफेद-काले इश्तेहारों में मिल जाएगें, जहां किसी क्रीम, तेल या कैप्शूल के बाकी गुणों को बताने के साथ-साथ मस्ती का पूरा एहसास जैसे पेट वर्ड शामिल किये होते हैं। देशभर में प्रकाशित होनेवाले दैनिक समाचार पत्रों में छपे विज्ञापनों में मिल जाएंगे। इस तरह की चीजों के विज्ञापन जहां कहीं भी आपको दिखेंगे, उससे कभी भी आप एहसास कर पाएंगे कि तेल, कैप्सूल और क्रीम की ज़रूरत संतान पैदा करने के लिए सहवास के दौरान आएंगे। खोई हुई दुर्बलता, पौरुष हासिल करने का नुस्खा, आनंद और मस्ती का एहसास ऐसे शब्दों से भरे विज्ञापन ये आसानी से स्थापित कर देते हैं कि सेक्स सिर्फ संतान के लिए ही नहीं, प्‍लेज़र के लिए भी किये जाते हैं। इस संदर्भ में कंडोम को सेक्स एज ए प्लेजर की संस्कृति को बढ़ाने का सबसे मज़बूत माध्यम मान सकते हैं। इन सबके बावजूद भी अगर कोई अभी भी इसे धार्मिक कार्य औऱ साधना जैसे शब्दों से जोड़ कर देखता है, तो वो इसके बहाने दर्शन और अध्यात्म पर बहस करना चाहता है या फिर पाखंड फैलाने का काम करना चाहता है। और मैं इन दोनों से बचना चाहता हूं।

लेकिन प्लेजर का यही कॉन्सेप्ट ज़रा स्त्रियों के मामले में लागू करके देखिए। लागू तो दूर, समाज का एक बड़ा तबका कैसे आपको काट खाने के लिए दौड़ता है। कृष्णा सोबती ने अपने उपन्यास मित्रो मरजानी में एक स्त्री को अपने पति से शारीरिक तौर पर असंतुष्‍ट होने और उसे इसी आधार पर अस्वीकार कर देने की बात की, तो पूरा हिंदी समाज पिल पड़ा। स्त्री-विमर्श का एक सिरा जब ये कहता है कि देह के जरिये भी मुक्ति संभव है, तो पितृसत्तात्मक समाज आग-बबूला हो उठता है। तमाम तरह की मुक्ति और बदलावों की बात कर लेने के बाद स्त्री-मुक्ति और सेक्स के स्तर पर बात करने की कोशिश की जाए, तो समाज उसे पचा ही नहीं पाता। वो इतना घबरा जाता है कि उसे लगता है कि स्त्रियों को आड़े हाथों लेने के लिए, उसे, यौन-शुचिता जैसे सवालों से घेरकर ही तो बेड़‍ियों को मज़बूत बांधे रखा जा सकता है। अब जब वो सेक्स को भी रोजमर्रा की चर्चा में शामिल करने लग गयीं, उसमें भी अपनी पसंद और नापसंद बताने लग गयीं, तो फिर ऐसा क्या बच जाएगा, जिससे कि सामंती और गुलामी की संस्कृति को जिंदा रखा जा सकेगा।

अब आप ही बताइए, ऐसे में, कोई लड़की नियमित अपडेट होनेवाले सविताभाभी.कॉम के पन्ने पढ़ती है, और तो और, अपनी पसंद भी फैन क्लब में ठोंक जाती है, तो ऐसी लड़कियों का क्या कर लेंगे आप। सिवाय दिन-रात ये मनाने के कि हे भगवान ऐसी लड़कियों की संख्या न बढ़े।

31 comments:

विवेक सिंह said...

बल्कि हम तो चाहते हैं ऐसी लडकियाँ खूब बढें . भई उन्हें भी आजादी होनी चाहिए !

jayram said...

manyawar shodharti bandhuon !
sex ko lekar aap itne sajag hain uska andaja lagana jyada mushkil nahi ......lagatar kabhi outlook ke sex adharit ank par charcha to kabhi sawita bhabhi.com ka wishleshan... aapki sakriyta aur sex ko lekar jagrukta ko darshata hai......
wah bhai...kya baat hai! kitni aasani se ek porn-site ko stri-wimarsh ka jariya bata dala ....
kya wichar -wimarsh aur research ke liye is desh main muddon ki koi kami .....khair aapki marji bharat aajad hai..... waise aap bhi bazar se alag nahi hain ho sakta hai aapko bhi sawita bhabhi .com se promotional pacage mila ho!!!!!!!!!!!!!!!!

RANJEET said...

वैसे भी ज्यादातर लड़कियां (जहाँ तक मैंने देखी हैं) सेक्स के मामले में उतनी खुली नहीं हैं. अच्छा बदलाव है लड़कियां सेक्स के बारे में खुलें, मुझे भी उन्हें बेड तक लाने में उतनी मेहनत नहीं करनी पड़ेगी, क्या पता ख़ुद मुझपर ही डोरे डालें, मौजा ही मौजा. तो फ़िर लड़कियों को खुलना ही चाहिए, मैं तो इंतजार ही कर रहा हूँ. और सभी लड़कियां सविता भाभी बन जायें तो सभी मर्दों के मजे. बिन शादी मौज-मौजा ही मौजा.

वैसे मुझे लेस्बियन भी काफी पसंद हैं. पर साले 'मीठों' को काट के फिंकवा देना चाहता हूँ.

MAYUR said...

sir main khama chahta hoon aur shayad galat bhi bol raha hoon,aisi sites ke baare main charcha to karni chahia par link dekar aap inhe kuch aur logon tak pahuncha rahe hain, vaise bhi use kuch kam hits nahi mil rahe . Shodh ki baat to ye hai ke manavi jazbaat to woh hi rehte hain na,jab tak ladkiyon ki pahunch main nahi thi ye website tab tak wo nahi dekh sakti jab pahunch gayi to us website tak pahuchne main sirf ek click lagta hai.

sodh to aaj har dimag kar raha hai ki internet par kya naya mil jaye aur aise main kai baar mail ke dwara ya kisi internet vigyapan ke dwara ya phir chating ke dauran kai baar porn links mil jaati hain,aur phir mahila purush dono hi aaj bahut zyada alag nahi hain,

sex sirf vanshavridhi ke liye hi hai aisa sochna ab shayad mahilaon ne bhi band kar diya hai,jitne aaram se tv par amul macho ka vigyapan aa raha hai uske baad ye sochna to sahi nahi lagta.

main phir bolunga ki main galat hoon par meri samajh se aisi ladkiyon ki sankhya main kami aaye aisa sochne main koi fayda nahi hai kyonki ye to ek attraction hai sex ka ,is main ling se koi fark nahi padta,

anil yadav said...

बहुत अच्छे भाई लोग सविता भाभी को लोकप्रिय बनाने में आप लोगों का प्रयास सराहनीय है....मोहल्ले में इतनी गंभीर चर्चा को बढाने के लिए अविनाश जी भी बधाई के पात्र हैं....और सविता भाभी को हिट्स मिलने में भले ही कुछ कमी रह जाए ....लेकिन अविनाश जी को जरूर पता है कि मोहल्ले पर हिट्स की संख्या कैसे बढाई जाए इसीलिए अक्सर वो नये नये शिगूफों को हवा देते रहते हैं....
बहुत जानदार ....

शाश्‍वत शेखर said...

विवेक जी के कहे का समर्थन करता हूँ|

Debashish said...

अविनाश टैबलायड से जुड़े हैं आजकल, तो विषय का जंचना अस्वावाभिक नहीं। यह सिद्ध करने में क्या देर लगायें कि जिस तरह मुहल्ला के पहले हिन्दी के ब्लॉग नहीं थे उसी तरह सविता भाभी के पहले इंटरनेट पर पॉर्न नहीं था। नारी की स्वाधीनता का ज़िक्र वाया सविता भाभी होगा यह तो खैर यह साईट बनाने वालों ने भी न सोचा होगा। विनीत की समझ का भी जवाब नहीं जो समझ रहे हैं कि टिप्पणियाँ वाकई औरतें ही कर रही हैं। भारत में कितनी सामान्य औरतों के अकेले, एकांत में इंटरनेट सर्फ करते पाया या सुना हो पता नहीं। खैर जमाये रहिये दही!

अवाम said...

जिस तरह पुरुषों को सेक्स संबंधों में अधिकार प्राप्त है उसी तरह से महिलाओं को भी अधिकार मिलाने चाहिए.

Anonymous said...

Savita bhabhi ka figure to shandaar hai! Mohalle men ghoom kar unhone badi kripa ki hai.

Anonymous said...

avinash...NDTV se chale gaye to ab yeh tharak pana shuru kar diya . Kitna desperate ho gaya hai tu . Baap re Baap ...Sharam kar yaar .

sanjay ahirwal

Anonymous said...

sory NDTV se nikalye ...chale nahin gaye ....ha ha ha ha ha ha
sanjay ( naukree bhi to maine lagyee thee)

umashankar said...

maza aa gaya avinash ....pora lekh lund pakad kar padha hai ...wah waah

संजय बेंगाणी said...

अविनाश हम वैचारिक रूप से धूर विरोधी रहे हैं. अगड़ पिछड़ा, हिन्दू-मुस्लिम, औरत-मर्द सब तर्क सही...मगर इस तरह की निम्नकोटी पोस्ट..!!! यह आपका स्तर नहीं. या फिर मेरा ही आपके प्रति आंकलन गलत था. आपकी मति मारी गई है.

विनाश said...

सही काम कर रहे हो आखिर तुम्हारी बिटिया भी बडी हो रही है उसे भी खुला समाज चाहियेगा . इसकी एक शाखा अंतर्वासना डाट काम का भी विज्ञापन कर डालो ना जहा बेटी और बाप आपस मे सेक्स कैसे करते है कि कहानिया छपती है

निखिल आनन्द गिरि said...

अविनाश जी,
आप महान बनने के करीब हैं....बधाई...
निखिल

शैलेश भारतवासी said...

राष्ट्रीय बालिक दिवस पर सवित भाभी और मोहल्ला को बहुत-बहुत बधाई!!

Anonymous said...

अरे ये क्या कर दिया भाडवे तुने

सारे मोहल्ले में गटर छोड़ दिया

क्या जरुरत थी इसकी.

तेरे को गाली निकल रही है....

Anonymous said...

बहन बेटियाँ भी तो पढ़ रही थी तेरा ये ब्लॉग ...


मादरचोद तेरी वजह से अब नेट कनेक्शन ही हटवाना पड़ेगा.

छि छि छि

शर्म आनी चाहिए तू तोह एक पत्रकार (तथाकथित ही सही) है न.

Anonymous said...

विनाश ने सही कमेन्ट किया है

आदर्श राठौर said...

अविनाश जी, यौन स्वतंत्रता के नाम पर यौन उच्छृंखलता है ये। जिस तरह के मुद्दे को आपने उठाया है उस पर चर्चा की जानी चाहिए लेकिन आपने जिस तरह से और जहां से उठाया है उस पर घोर आपत्ति है। आपने लिंक दे दिया इस साइट का। मैं कुछ सवाल पूछना चाहता हूं। क्या आप अश्लील साहित्य का समर्थन करते हैं? क्या आप विवाहेत्तर संबंधों का भी समर्थन करते हैं?
आपने जिस तरह की साइट का लिंक दिया है उसे देखकर हैरानी हो रही है। इतनी भौंडी और अश्लील चीज़ की अपेक्षा मैं कम से कम इस ब्लॉग पर नहीं कर सकता था। आपने भी इस साइट का फीचराइज्ड विज्ञापन किया है क्या?

आदर्श राठौर said...

कल को आपके मोहल्ले पर अन्य अश्लील साइट्स के विज्ञापन भी आ जाएं तो कोई हैरानी नहीं होगी।
मैं तो सवाल उठाता हूं आपकी इस पोस्ट का समर्थन करने वालों पर? क्या किसी बड़े नाम के ऊलजुलूल लेख पर वाह! और उम्दा पेशकश आदि टिप्पणियां करना आपकी आदत हो गई है क्या?
मैं विचलित हूं और क्षुब्ध भी।

आदर्श राठौर said...

जिस साइट का आपने प्रचार किया है उसकी दुष्प्रभावों के बारे में ये पढ़ें
http://liveindia.mywebdunia.com/2008/09/13/1221301440000.html

आदर्श राठौर said...

लिंक काम नहीं कर रहा है। ये लीजिए, अग्रणी अखबार इस साइट के बारे में क्या कहते हैं
इंटरनेट पर इन दिनों एक अश्लील कार्टून कैरक्टर ने आईटी मिनिस्ट्री की नाक में दम कर दिया है। अब इसे बैन करने की पूरी तैयारी है। कार्टून कैरक्टर का नाम है 'सविता भाभी'। मार्च में पहली बार यह कैरक्टर बेव पर क्या नजर आया, इसकी साइट पर हिट्स की बाढ़ ही आ गई।

'सविता भाभी' दरअसल अपनी सेक्शुअल लाइफ से हताश एक महिला का कार्टून कैरक्टर है। साइट पर इसे कॉमिक के तौर पर अंग्रेजी और दूसरी भारतीय भाषाओं में परोसा जा रहा है। महज आठ महीनों में इस साइट पर 30 हजार से अधिक लोग रजिस्टर कर चुके हैं।

टीन एजर्स पर इस कैरक्टर का बेहद बुरा असर पड़ रहा है। बेंगलुरु में पांचवीं में पढ़ने वाले एक बच्चे ने तो इस कैरक्टर को देखकर अपनी टीचर को अश्लील MMS तक कर डाला। बच्चे की उम्र महज़ 11 साल होने के कारण पुलिस उसके खिलाफ कोई ऐक्शन नहीं ले सकी। एक साइकोलॉजिस्ट समीर पारिख भी इसे बच्चों के स्वस्थ मानसिक विकास के लिए काफी घातक बताते हैं।

इस साइट को 'देशमुख' के छद्म नाम से चलाया जा रहा है। इस साइट की मालिक इंडियन पॉर्न स्टार एम्पायर नाम की कंपनी है। इस कार्टून को गढ़ने वालों ने ' Dexstar' और ' Madman' जैसे नाम रखे हुए हैं। इससे साइबर सेल को साइट को चलाने वालों को शिकंजे में कसना मुश्किल हो रहा है।

इस साइट को बैन करने के लिए आईटी मिनिस्ट्री काफी गंभीरता से सोच रही है। आई मिनिस्ट्री को कर्नाटक पुलिस की रिपोर्ट का इंतजार है। पुलिस का कहना है कि बच्चों पर इस साइट का काफी गलत असर पड़ रहा है। बेंगलुरु की घटना के बाद दिल्ली पुलिस के कान भी खड़े हो गए हैं। दिल्ली पुलिस की साइबर सेल का कहना है कि उन्हें इस बारे में पता है। इसके लिए कदम उठाए जा रहे हैं।


साभार: नवभारत टाइम्स

Anonymous said...

bhadve aamod-pramod ka vishay ban gaya tu to....

Anonymous said...

इसे समकालीन साहित्य के नये अध्याय के तौर पर देखा जा सकता है।

मृत्युंजय यकरंग said...

आप पुरुषप्रधान सोच को कोस भी रही है और ..आप ये भी चाहते हो की स्त्रिया पुरूषों की तरह हो जाए ..वाह
क्या वैचारिक सामंजस्य है | तुम और उस 'राजू' में में कुछ भी फर्क नही | अच्छा है ! ऐसे ही विषयों पर उंदर की पवित्रता उजागर होती है ...शयन कक्ष की चर्चा चौपालो तक | सादुवाद !
एक और बात यदि सेक्स को अध्यात्म से जुडा नही पाते हो तो तुम्हारा अल्पज्ञान दर्शन को लेकर साफ़ झलकता है |

rohit hindustani said...

बंधु बहुत शर्म आती है की मैं ऐसे देश मे रहा रहा हूँ जहाँ लोग समाज अभी भी दोहरा जीवन जी रहे है. यह वोही देश है जहाँ खजुराहो जैसा शिल्प विकसित हुआ. कामसूत्र की रचना की. जिसे यहाँ अविनाश जी को गाली देने बाले लगभग हरेक व्यक्ति ने पढ़ा होगा लेकिन हाए रे हमारा समाज की हम इसका रस भी लेते है लेकिन स्वीकार भी नही करते. कितनी बिढ़ंवना है इस भारतीय समाज की जो हमें अच्छा लगता है हम उसे स्वीकार नही कर सकते. अपने मित्रो मे सविता भाभी के किससे की खूब चटकारे ले लेकर चर्चा करेंगे मन मे सोचेंगे की हे हमे भी सविता भाभी जैसी कोई मिल जाए , ऑफीस मे , बाज़ार मे, हॉस्पिटल मे यहाँ तक की मंदिरो मे भी अगर कोई सुंदर सी महिला दिख जाए इन लोगो को तो मन मे सविता भाभी डॉट कॉम से भी ज़्यादा अश्लील विचार आते है इन लोगो (जो सविता भाभी डॉट कॉम का विरोध करते है) की समस्या क्या है आपको मालूम है इन्हे अपने अपने उपर संदेह है इन्हे संदेह है की अगर घर की महिला इसे देख लेगी तो हो सकता है वो भी सविता भाभी का अनुसरण करे . इन्हे संदेह है अपने संस्कारो पर जो ये अपने बच्चो को दे रहे है इन्हे संदेह होता है अपनी बीवी पर की कल वो भी सविता बभी का अनुसरण ना करने लगे क्योंकि इन्हे अपने पुरुषात्व पर संदेह है क्या इन्होने कभी अपनी बीवी से ये पूछने की हिम्मत की कि क्या उसे ऑर्गॅज़म प्राप्त होता है नही कभी नही क्योंकि इनके मन मे चोर है . ये वोही लोग है जो दूसरे की बीवी या दूसरी महिला को तो खूब इस तराह से अपनी एक्स रे युक्त निगाहो से देखेंगे की बिचारी शर्म से धरती मे गड़ जाए, आँखो से ही उसका चिर हरण कर लेंगे लेकिन समाज मे भले बनेंगे. धिक्कार है ऐसे कुंठित लोगो पर जो अपने दिल की बात भी कहने मे डरते हो. खुद खूब मज़ा लिए होंगे नीली फ़िल्मो का ज़रा पूछिए इनसे कभी अपनी बीवी को दिखाई है नीली फिल्म तो कहेंगे नही वो बिगड़ जाएगी. अरे धिक्कार है तुम्हारे पुरुषात्व पर तुम्हे खुद पर और अपनी बीवी पर ही भरोसा नही है जिसके साथ सात फेरे लिए थे. औरत को भी हक़ है अपनी बात कहने का अपनी शारीरिक और मानसिक ज़रूरत को पूरा करने का. सविता भाभी इसका एक माध्यम है जो बात वो कहना चाहती है पहली बार सविता भाभी ने ये बात कही तो सब बुरा मान बैठे. औरत को भी इंसान समझो उसकी भी कोई इच्छाए है .फिर जो लोग यहाँ इसका विरोध कर रहे है कसम खा कर कहे की कभी उन्होने नीली फिल्म नही देखी वो बहुत चरित्रवान् है.सत्य को स्वीकार करो इसी मे भला है. अविनाश जी ने साहस किया सत्य को सामने लाने का उनका साधुवाद. अरे पुरुषो साहसी बनो. सत्य को स्वीकारो यह वो ही देश है जहाँ द्रोप्दि थी जिसके पाच पति थे और कृष्ण उसके भाई थे. क्या वो पाँच पतियो के साथ सोई नही होगी क्या उसने पाँचो के साथ काम सुख नही उठाया होगा फिर जब वो स्वीकार है तो इसे भी स्वीकार करो. जब कृष्ण ने उसे बहन मान उसका साथ दिया .आप लोगो को भी इस सत्य को मान लेना चाहिए.

Prem said...

Hmmmm... Mamala gambhir hai!
Bhai... kunthaon ka faash logon ko tilmila deta hai suna tha.. dekh raha hu!
Waqt ke sach se aankh mila kar dekhne kee himmat paida na karne wale kunthagrast mitron (jinme se kuchh ki kunthaye yaha maa/betiyo ko galiyon ke rup me niklee hai) aapko pata nahi ki ab WO apna hisaab mangne lagee hain! Jinhe aap sadiyo se riwazon aur samajhaishon ke mutallik ghar ki chahardiwaree me vastu ki tarah rakhte rahe hai.
Aankhe kholiye... ya banaate rahiye "Blindman's Map of Hindustan".
Ye khabar nahi hai khabardar karne kee koshish hai warna kawitaon, kahaniyo aur charchao se baat aage nikal chuki hai.

My Spicy Stories said...

Interesting Hot Story Shared by You. Nice प्यार की कहानियाँ Ever. Thank You.

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citra kosmetik said...

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