यह मीडिया क्या वही चाहता है, जो पुलिस चाहती है?
इस मुल्क के एक बड़े हिस्से के लिए जो भी अमरीकी है, वह श्रेष्ठ है। बोलना-चालना, उठना-बैठना, पहनना-ओढ़ना कहां तक गिनती गिनी जाए। यहां सिलसिला अब पत्रकारिता तक पहुंच गया है। ऐसा नहीं है कि पहले नहीं था, पहले भी था लेकिन वही मुख्य स्वर नहीं था। आज अमरीकी पत्रकारिता की शैली आदर्श है। आज वही श्रेष्ठ है। आज वही लीड है।नासिर भाई आज गूगल टॉक पर अचानक उगे। वे तब उगते हैं, जब कोई कौंध उन्हें सुबह से परेशान करती है और दोपहर आते-आते वे उसे स्क्रीन पर उतार देते हैं। अपने नये लिखे की जानकारी बहुत से लोग देते हैं, लेकिन ऐसे कम लोग हैं, जिनकी ऐसी जानकारियों के बाद सक्रिय होकर उन्हें पढ़ लेने का जी करे। नासिर भाई के लिखे में ऐसा कभी नहीं रहा, जिसमें वे खुद केंद्र में रहे हों - हम जैसे आत्मप्रशस्तिवाचकों की तरह। ये नया आलेख भी मीडिया में जो मर्मांतक हालात मौजूद हैं - उसकी वैचारिकी को पकड़ने की कोशिश है। जैसा कि आलेख से जाहिर होता है, मीडिया का विवेक मर चुका है और वह व्यवस्था के हाथों की कठपुतली हो चुका है।
जब अमरीका ने अफगानिस्तान और फिर इराक पर हमले किये तो एक शब्द बड़े जोरशोर से सुनने को मिला। इस शब्द के बारे में मैंने मॉस कॉम में कुछ ऐसा नहीं पढ़ा था, जो प्रोफेशन में उतारने लायक हो। खैर, यह शब्द है - इम्बेडेड जर्नलिस्ट। वैसे इस शब्द का रिश्ता युद्ध क्षेत्र से जुड़ी पत्रकारिता से है और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भी यह शब्द मिलता है। लेकिन इस शब्द को इक्कीसवीं सदी में जो शोहरत मिली, वैसी पहले कभी नहीं थी। इस शब्द को नया आयाम मिला। पत्रकारिता को एक नया अर्थ।
अफगानिस्तान और इराक 'आतंक के खिलाफ जंग' (यह शब्द मेरे नहीं हैं) में ये वे पत्रकार थे, जो अमरीकी सेना की छांव में चल रहे थे। उनकी बतायी स्टोरी पर ही काम कर रहे थे। उनके विश्वसनीय... उच्चपदस्थ... खुफिया... सूत्र... नाम न छापने की शर्त लगाने वाले सूत्र सब अमरीकी राज्य के खबरची थे। वे वही जानकारी देते थे, जो उन्हें छपवाना या प्रसारित करवाना होता था। कहां तक कितनी दूर तक कोई पत्रकार खोज खबर लेगा, यह भी अमरीका ही तय करता। इसमें इस मुल्क के कुछ नामचीन पत्रकार भी थे।
यह सिर्फ 'युद्ध' क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रहा। इस पत्रकारिता ने खास तरह के पत्रकारों की ब्रीड ही तैयार कर दी। यानी 'आतंकवाद के खिलाफ युद्ध' में वही नजरिया, वहीं बातें ज्यादातर छपीं/छप रही हैं, जो अमरीकी सरकार चाहती थी/है। यह सिलसिला भी अमरीका तक सीमित नहीं था बल्कि उसके हिमायती जितने भी मुल्क हैं, वहां यही होने लगा। आज भी यही हाल है। इसमें राबर्ट फिस्क जैसे इक्का-दुक्का पत्रकार ही थे, जिन्होंने इम्बेडेड का तमगा स्वीकार नहीं किया।
अपने मुल्क में भी यही हो रहा है। आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में सच वही है, जो खुफिया अफसर/पुलिस फीड कर रही है। विश्वसनीय... उच्चपदस्थ... खुफिया... सूत्र... नाम न छापने की शर्त लगाने वाले सूत्र सब पुलिस के खबरची हैं। कहां, तो पुलिस से सामान्य जानकारी निकालने में लोगों और पत्रकारों के तलवे घिस जाते हैं, और कहां आतंकियों से जुड़ी हर छोटी बड़ी जानकारी बड़ी आसानी से हर छोटे-बड़े पत्रकार को सूत्रों के जरिए मुहैया है। हर की खबर ऐसी जैसे सब कुछ उसी पत्रकार के सामने हो रहा है। हर अखबार और टीवी चैनल के पास हर रोज अलग-अलग एंगिल से खास खबर है। पुलिस के 'सेलेक्टिव लीक' को ब्रेकिंग न्यूज बनाने से भी कोई नहीं हिचक रहा। यहां भी इक्का-दुक्का को छोड़ दें तो कोई अपनी तफ्तीश करता नजर नहीं आता। ऐसे अखबार और पत्रकार उंगली पर गिने जा सकते हैं।
(अब पत्रकारों की एक नयी और स्थाई कैटेगरी ही हो गयी यानी इम्बेडेड। इन्हें देखकर यह अर्थ भी निकाला जा सकता है कि पत्रकारों की ऐसी टोली जो राज्य की हर कार्रवाई के साथ शीश नवाये खड़ी हो। हमारे मुल्क के संदर्भ में एक और अर्थ भी हो सकता है - ऐसे पत्रकारों की टोली जो पार्टियों के साथ गुंथे हों। उनके लिए खबर वही, जो पार्टी बताये और पार्टी लाइन के मुताबिक हो।)और सूचना के ऐसे हमलों के जरिये एक कंडिशनड दिमाग बनाया जा रहा है। जहां ज्यादातर लोग हर बात पर आंख बंद करके यकीन कर रहे हैं। सवाल कोई नहीं खड़े कर रहा। हमें बताया गया था/जाता है, पत्रकारिता का मूल मंत्र है - किसी बात को आंख बंद करके मत मानो। सवाल उठाने की सलाहियत पैदा करो - लेकिन आतंक के खिलाफ जंग में हममें से ज्यादातर लोगों ने इस मंत्र को ताक पर रख दिया है। पिछले कुछ दिनों के शीर्षक देखिए, शब्दों के इस्तेमाल देखिए - इस बात का अंदाजा खुद लग जाएगा। और विडम्बना यह है कि जो लोग इस ओर, इशारा करने की कोशिश कर रहे हैं, वे ही शक के दायरे में हैं।








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