“जिन्हें भारत को माता मानने में एतराज़ हो...
...वे उन्हें अपनी महबूबा भी मान सकते हैं”
अनिल यादव : बहस प्रेमियो, कांग्रेस ने अमरनाथ देवस्थान बोर्ड को ज़मीन ठीक उसी मंशा ने दी, जिस मंशा से जन्मभूमि का ताला खोला था। सोचा था जम्मू के हिंदू थोक के भाव वोट देंगे। पीडीपी, नेकां ने सोचा कि इस के उलट घाटी के कटुवा वोट क्यों नहीं बटोर सकते। भाजपा जिसकी कामन सिविल कोड, 370 चिल्लाते-चिल्लाते चिर गयी थी और नतीजा नही निकला तो इसको लपक लिया। सिर्फ चार महीने बाद वहां विधानसभा चुनाव होने हैं। सबको बहुमत पाना है, इसलिए खेल दिया। अलबत्ता यह साबित हुआ कश्मीर में शांति के पदचाप सुनाते डलझील पर टूरिस्टों के फोटो फर्जी थे। सूचना विभाग के क्लर्कों ने नौकरी बजायी थी। अब पता चला कि उग्रवादी जनता को मोबलाइज कर सड़क पर भी उतार सकते हैं। एक नारा हैं वहां, जियो, जियो। मतलब आप जानते होंगे। कांग्रेस-बीजेपी को छोड़ दें, तो बाकी क्षेत्रीय दल चुप हैं। इसलिए कि कहीं मुसलमान वोटर नाराज न हो जाएं। सेकुलर भी कौमीएकजहती के सड़े गंगा-जमुनी तराने गा रहे हैं, जो अप्रासंगिक हो चुके हैं। ये सभी एक खामोश किस्म की सांप्रदायिकता को पाल रहे हैं, जो कल ज़रूर बम की तरह फटेगी। उनमें पोलिटिकल विल पावर नहीं है और सेकुलरों में साहस कि सच बोल सकें। लंठई आक्रामकता, हरमजदगी ऐसी चीजें हैं, जिनके आगे कोई भी शरीफजादा सेकुलर नहीं टिकता। इसी कारण चुनाव से पहले यह कटुवा-चुटिया पोलराइजेशन का खेल चलता है। बाद में गंगाजमनी तहजीब की निर्गुण नज़्में गाने में सब कलावंत हैं। कितने ब्लागर इस सवाल पर सूने लेकिन दुकानों की ओट से घूरते लाल चौक पर कफन के रंग के लाल कपड़े में बंधे माइक पर अपनी राय जाहिर करने चलेंगे। यह सवाल ईगो पर चोट करता हो और मुझे गाली देने का मन करता हो तो इसके सिनानिम सवाल भी है। शरीफ लोग चुनाव क्यों नहीं लड़ते? युवा राजनीति में क्यों नहीं आना चाहते? सब कैरियर ही बनाना क्यों चाहते हैं? हमारे इंटलेक्चुअल गोष्ठी वगैरा में गंड़ऊगदर काटकर सो क्यों जाते हैं और किसी वास्तविक सवाल से टकराने पर क्यों बताने लगते हैं कि वे निहायत ही मामूली आदमी हैं और फलां हरामी अफसर या हक्कानी नेता को जानते हैं। इस मिडिल क्लास चिरकुट में जब तक सड़क पर छेड़ी जाती लड़की के आगे अपनी कार का शीशा उतार कर छेड़ने वाले लफंगे से, “अबे क्या है”, पूछने का साहस नहीं आएगा, तब तक भारत माता की ऐसी-तेसी होती रहेगी। जिन्हें भारत को माता मानने मे एतराज़ हो, वे उन्हें अपनी महबूबा भी मान सकते हैं।साथी अविनाश से कहना है कि इस बातचीत को ज्यों का त्यों एकालाप और जवाब के रूप में एक पोस्ट के रूप में पेश करें। बस एक जगह से आत्मीय संबोधन “चचा” उड़ा दें, ग़लत जगह लग गया है। यह आग्रह इसलिए कि इस संवाद में तैयारी के नतीजे में घुस आयी बनावट के बजाय एक खास तरह की स्पांटेनिटी है। अमूर्तन नहीं है, विद्वानों के हवाले नहीं हैं। इसे दिमाग से नहीं दिल से सोच कर लिखा गया है।
इसी संवाद से
परेश टोकेकर कबीरा : अनिल भाई आपकी मति मारी गयी लगती है। अरे भाई ये सब कांग्रेस का किया धरा है, तो जाएं गुलाम नबी को मारें जाके काश्मीर में। इंदौर या देश के मुसलमानों ने क्या बिगाडा है? ज़रा अपनी भाषा भी सुधारें, नहीं तो आपकी जात को गाली देना हमें भी आता है! अन्य धर्म वालो के प्रति क्या उच्च विचार हैं आपके? ये आपका नही आपकी परवरिश का दोष है। तरस आता है आपके पालको पर! क्या इतना ध्यान भी न दिया बचपन में अपनी औलाद पर। ये आप जैसे देश के गद्दार ही हैं जो इंसान को इंसान से लडा, बीवी के पल्ले में घुस मौत का तमाशा देखते बैठते हैं। हां, कल दोपहर तक व्यस्त हूं, अगर मुझ कटुवे को निपटाना हो, तो मेंरे ब्लाग से घर का पता ले लो।
अनिल यादव : गुलाम नबी तो सदा का दरबारी है। जो कहा जाएगा वही करेगा। लेकिन कबीरा तुम अलग से ठंडे दिमाग से एक मुसलमान की तरह पोस्ट लिखो। बात हो सकती है। की-बोर्ड पर इतना क्या बांकपन? और नहीं तो बच्चो, वृंदा करात के साथ खड़े होकर “क मू नि स्त इं त र ने शि यो ना ल” गाने का विकल्प सदा से खुला है, खुला ही रहेगा। किसके लिए? अंत में तीन बिंदु : कश्मीर का हर कट्टरपंथी जानता है कि अमरनाथ का शिवलिंग 1950 में बूटा मलिक नाम के मुसलमान गड़रिये ने पहली बार पाया था और बहुत दिनों तक चढावा का हिस्सा उसके बाल बच्चों के पास जाता रहा था। डैंड्रफ की समस्या से परेशान फारूख चचा का लौंडा, जिसने राजेश पायलेट के लौंडे से अपनी बहन की शादी का स्वागत किया था - एक तरफ बयान देता है कि न्यूक्लियर डील दो देशों के बीच का मामला है - इसमें मुसलमान कहां से आ गये, दूसरी तरफ काफिरों को ज़मीन देने के सवाल पर वहां कट्टरपंथियों के साथ है। इंदौर से महाराष्ट्र जाकर बाल ठाकरे ने वहां की अस्मिता को आजीवन लीज पर ले लिया है। यह लचक और ढीठ दुस्साहस तुममें अगर नहीं है, तो तुम इनसे क्या अपनी प्यारी-प्यारी गंगाजमनी फर्जी पोएट्री से लड़ोगे मेरे भाई। साथी अविनाश से कहना है कि इस बातचीत को ज्यों का त्यों एकालाप और जवाब के रूप में एक पोस्ट के रूप में पेश करें। बस एक जगह से आत्मीय संबोधन “चचा” उड़ा दें, ग़लत जगह लग गया है। यह आग्रह इसलिए कि इस संवाद में तैयारी के नतीजे में घुस आयी बनावट के बजाय एक खास तरह की स्पांटेनिटी है। अमूर्तन नहीं है, विद्वानों के हवाले नहीं हैं। और इसे दिमाग से नहीं दिल से सोच कर लिखा गया है।







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