टीवी की दुनिया सिर्फ़ एक दिलक़श चेहरा ही नहीं मांगती

वर्तिका नंदा

वर्तिका हाल-हाल तक लोकसभा चैनल में एग्‍ज़क्‍यूटिव प्रोड्यूसर थीं। ज़ाहिर है, टीवी की समर्थ पत्रकार हैं। उदारीकरण के बाद भारत में चमकते टीवी उद्योग को लेकर अभी तक जितने भी विमर्श हमारे सामने हैं, उनके केंद्र में कंटेंट है। क्राफ्ट लगभग नदारद है। हालांकि किसी भी किस्‍म के विमर्श में टीवी की पहली कतार के पत्रकार शामिल नहीं होते। वर्तिका अपवाद हैं। उन्‍होंने वक्‍त-वक्‍त पर अपनी ज़बान खोली है। ये जो आलेख आप पढ़ने जा रहे हैं, उसमें उन्‍होंने टीवी मीडिया में रंगों के इस्‍तेमाल की व्‍याख्‍या की है। इस आलेख को महज छात्रोपयोगी संदर्भों में नहीं पढ़ा जा सकता, बल्कि इनका एक सामाजिक संदर्भ भी है - जब वर्तिका कहती हैं कि वाकई दर्द होता है जब दंगे की कवरेज को और सुर्ख कर दिया जाता है ताकि वो और बिके।
मनोरंजन परोसते तमाम न्‍यूज चैनलों में ख़बर सबसे पहले और सबसे तेज देने का दबाव रहता है, यह सभी जानते हैं लेकिन इस दबाव से परे एक और दबाव जोरों से काम करता है और वह है उसका दमदार मेकओवर। टीवी चैनलों की दुनिया दरअसल जिस तरह ख़बरों को चुनने-बीनने, सबसे पहले, सबसे आगे दिखने और विज्ञापन बटोरने के संघर्ष में लीन रहती है, वहीं रंग और प्रस्तुतीकरण भी बाजार में टिकाये रखने की एक बड़ी शर्त तो हैं ही।

जरा गौर कीजिए। आज की तारीख़ में ऐसा कोई भी चैनल नहीं है, जिसमें रंगों का चयन सावधानी से न किया गया हो- दोनों ही तरह के रंग- वे चाहे भावनाओं के हों या फिर बिखरे हुए प्राकृतिक या रचे हुए रंग। चाहा शायद सबने था लेकिन सोचा किसी ने नहीं था कि 10 साल के अंदर ही इतने अद्-भुत प्रयोग होंगे कि रंग मीडिया और खास तौर से न्‍यूज मीडिया पर अपनी पकड़ और मौजूदगी को इस जबरदस्त तरीके से मजबूत बना लेंगे। मीडिया रंगों के लिए अब किसी होली का मोहताज नहीं। वह समझ गया है कि बाजार में टिके रहना है तो रंगों को बांहें फैला कर अपनाना होगा, क्‍योंकि होली भी यहां है और दीवाली भी। बस, ज़रूरत है उन्‍हें हकीकत का अमली जामा पहनाने की।

दरअसल टीवी की दुनिया सिर्फ़ एक दिलक़श चेहरा ही नहीं मांगती, वह मांगती है तल्लीनता, तस्वीरें, तकनीक और बहुत से रंग। लाइट, कैमरा, एक्‍शन की दुनिया के साथ जैसे-जैसे क़रीबी बढ़ी, रंगों की समझ भी कई करवटें लेती गयी। न्‍यूज की भागमभाग के बीच हर मंजा हुआ पत्रकार/कैमरामैन रंगों के तालमेल के घोल को पी कर रखता है। रंग क‍हीं न छूटें, कोशिश रहती है। इंटरव्यू रिकॉर्ड हो तो बैकग्राउंड भरा-भरा लगे। लाइटें इस तरह से लगायी जाएं कि लगे कि स्टूडियो अभी-अभी रोशनी और रंगों से नहाया है। आउटडोर हो तो पेड़-पौधे, रंगीन छवियां दिखें, इनडोर हो तो भी स्टूडियो या फिर कमरा जीवंत दिखे, उसमें रंग छिटके हों, चाहे कुर्सी हो या टेबल या फिर टेबल पर पड़े गिलास-सब में कुछ अलग रंगीनियत हो, रिपोर्टर टीवी पर दिखे तो जरा सा चमके। एंकर परदे पर आये, तो उसकी झुर्रियां खुद उसे भी न दिखें। पत्रकारिता की समझ और सीरत के अलावा अब दर्शक को कोई चीज खास तौर से भा सकती है, तो वह भी होता है रंग और ताज़गी ही। यह उत्‍सवी महक टेलीविजन की नयी ज़रूरत बन गयी है।

इतना ही नहीं, आम इंसान टेलीविजन स्टूडियो में लगे सेट से लेकर चैनल से माइके के रंग तक से चैनल के स्‍वभाव का अंदाजा लगाता है। चैनलों पर चल रही सूचनाओं की रंगीन पट्टी हो या फिर बड़ा सेट- रंगों का चयन इस बारीकी से किया जाता है कि सबका दर्शक पर कुछ अलग ही प्रभाव दिखे। न्‍यूज मीडिया में रंगों और रोशनी से लबालब स्टूडियो इससे पहले कभी नहीं देखे गये। सनसनीनुमा कार्यक्रमों में अगर आमतौर पर लाल रंग हावी दिखता है तो युवा मन को खींचते खबरी कार्यक्रमों में कई बार कुछ नीला या नारंगी-सा।

लेकिन मजे की बात यह भी कि टीवी की दुनिया में हर रंग मान्‍य नहीं है। कुछ रंग ऐसे हैं जिनके इस्तेमाल से परहेज किया जाता है। जैसे कि एकदम सफ़ेद या एकदम काला। दोनों ही रंग कैमरे की आंख से आकर्षण पैदा नहीं करते। यही वजह है कि टीवी में रंगों का चुनाव अक्‍सर बहुत सोच-विचार कर किया जाता है। यहां तक कि एकता कपूर ब्रिगेड भी अपने तमाम नाटकों में रंगों के तालमेल का ध्‍यान रखती है। यहां पर्दे से लेकर तकिए के गिलाफ़ के रंग का चुनाव तक बड़ी तल्लीनता से किया जाता है। यही वजह है कि कई बार एक सेट की क़ीमत ही लाखों का आंकड़ा कर जाती है। यही हाल विज्ञापनों का है। महज 10-15 सेकेंड में अपने सामान की गुहार लगाने वाले विज्ञापनदाता कोशिश करते हैं कि कम शब्‍दों में स्क्रीन पर ऐसा जादू दिखा दिया जाए कि दर्शक उसे ख़रीदने को उतावला हो उठे। यही वजह है कि एक-एक शॉट पर महीन सोच का निवेश होता है और फिर स्टोरी बोर्ड पर अमल किया जाता है।

मीडिया ने रंगों को आत्‍मसात कर लिया है। टीवी चैनलों में जाने वाले भी इस शोध को करके जाते हैं। वे जानते हैं कि एनडीटीवी में होने वाली स्टूडियो रिकॉर्डिंग के लिए कौन-सा रंग नहीं पहनना चाहिए और स्टार न्‍यूज के लिए कौन सा। यहां तक कि कई सितारों के सहायक भी सितारे को वहां ले जाने से पहले गेस्ट डेस्‍क से रंग के बारे में पड़ताल कर लेते हैं ताकि टीवी पर सब कुछ पूरे तालमेल में दिखे। कई सितारे ऐसे भी हैं, जो अपनी कार में अतिरिक्‍त कपड़े लटकाए रहते हैं ताकि चैनल की ज़रूरत के मुताबिक कपड़े तुरंत बदले जा सकें। चुनावी दिनों या फिर कुछ और ख़ास अवसरों पर जो नेता हर पल एक-दूसरे चैनलों में फुदकते रहते हैं, वे भी ऐसी तैयारी बखूबी किये रहते हैं, लेकिन यह तस्वीर का एक पहलू है।

टीवी मीडिया 20 प्रतिशत की वार्षिक दर से हिलोरें भर रहा है। हिंदुस्तान में इस समय जितने चैनलों की भरमार है, उतनी पूरी दुनिया में कहीं नहीं। इस लिहाज से टेलीविजन कुछ नया करने की प्रयोगशाला बन चला है। लेकिन परेशानी तब होती है, जब किसी एक रंग में बेवजह दूसरे रंग घोल दिये जाते हैं। वाकई दर्द होता है जब दंगे की कवरेज को और सुर्ख कर दिया जाता है ताकि वो और बिके, आंसुओं को और मटमैला कर दिया जाता है ताकि दर्शक बस किसी एक चैनल को बंध कर देखता रहे। जब शरीर के गेहुंए रंग को कपड़ों की परत से हटाकर जरा और पारदर्शी कर दिया जाता है ताकि टीवी मसाला आइटम भी बने। तब लगता है कि रंगों के चयन में हम जरा चूक गये। अच्‍छा हो कि जिंदगी के कैनवास को मदहोशी से भरने की कूव्वत रखने वाले रंगों के साथ व्यापारी राजनीति न हो। वैसे भी रंग और बेरंग के बीच का फ़ासला पार होने में ज़्यादा देर नहीं लगती।

(यह आलेख लोकायत के ताज़ा अंक में छपा है। मोहल्‍ले में इसकी पुनर्प्रस्‍तुति हम पत्रिका संपादक और वर्तिका की इजाज़त से कर रहे हैं)

13 कमेंट्स:

आशीष said...

अविनाश जी और वर्तिका जी, आप दोनों को इस आलेख के लिए धन्‍यवाद, टीवी की दुनिया में रंगों का महत्‍व आज समझ में आया है

Srijan Shilpi said...

टीवी की दुनिया में रंगों के तालमेल के बारे में जितनी सूक्ष्म सावधानी रखी जाती है, काश सच और जनसरोकारों के बारे में भी उतनी ही सावधानी बरती जाती!

अविनाश, यदि आपने इस लेख के सिलसिले में वर्तिका से आजकल में बात की हो तो इतना तो आपको पता चल ही गया होगा कि अब वह लोकसभा टेलीविजन में नहीं हैं। वह वहां से इस्तीफा देकर किसी अन्य चैनल (शायद सहारा समय) का रुख कर चुकी हैं।

Anonymous said...

WOTS NEW IN IT????????

बिक्रम प्रताप सिंह said...

जहाँ तक मैंने गौर किया है अब तक यही समझ पाया हूँ कि कंटेंट ही सबसे प्राथमिक है. पिछले कुछ महीनों मे बहुत से चैनलों ने अपने रंग बदले (लाल, हरा, पीला वाला रंग) लेकिन लोगो की पसंद मे खास अन्तर नही आया है.इन सब बातो पर पत्रकारों का ज्यादा ध्यान जाता है आम दर्शको का नही. हालांकि मेरा यह कहना नही है कि इस पर ध्यान न दिया जाए.

अविनाश्‍ा said...

सृजन जी, वर्तिका से बात तो हुई थी, पर आजकल क्‍या हो रहा है, ये बात हुई ही नहीं। मैं भी टेलीविज़न में कहां से कहां लोगों की आवाजाही हो रही है, इस बारे में अ‍नभिज्ञ रहता हूं। आपने जानकारी दी, आपका धन्‍यवाद। और भी बहुत से दोस्‍तों ने आपकी जानकारी की तस्‍दीक की है। एक बार फिर शुक्रिया।

Anonymous said...

vartika ji loksabha chnl kyon chhod diya. ab kahan jaane ka iraada hai??? suna hai sahara me ja rahi hain.

Anonymous said...

आप इस बदनाम बस्ती में क्यों आ गईं। चेहरे मोहरे से आप ख़ूबसूरत हैं। ये अविनाश अपने ब्लॉग की टीआरपी के लिए आपका इस्तेमाल करने लगेगा। अभी एक लेख आपने लिखा है, फइर आपके जरिये विवाद खड़ा करेगा। फिर लोग कमेंट्स में आपको गालियां देंगे। फायदा अविनाश का होगा, उसको ज्यादा हिट्स मिलेंगे। क्योंकि ये ससुरा आपको दी जाने वाली गालियों को भी ब्लॉग पर प्रकाशित करेगा। उम्मीद है आप मेरी बात समझ गई होंगी।

Anonymous said...

dear
wel wisher

right now she is in right way

सुभाष नीरव said...

अविनाश जी, ये बेनामी आपके पीछे ही हाथ धोकर क्यों पडें हैं? टिप्पणी भी छोडना चाहते हैं और गुमनाम भी रहना चाहते हैं। क्या सचमुच अब ब्लाग धंधागिरी पर उतर आया है कि जैसे भी हो अपनी टी आर पी बढ़ाई जाए। भले ही अनर्गल टिप्पणियों को प्रकाशित कर/करवा कर। ब्लाग को प्रासंगिक और सार्थक बहस का एक मंच बनना चाहिए, न कि व्यर्थ की बातों में अपनी शक्ति, ऊर्जा और समय का अपब्यय का साधन। देखने को मिलता है कि ब्लाग्स पर प्रकाशित होने वाली बहुत सी टिप्पणियों की भाषा बड़ी बेहूदा होती है। पढ़े- लिखे लोगों से ऐसी भाषा की उम्मींद नहीं की जानी चाहिए। मेरा तो मानना है कि ब्लाग-स्वामी को ऐसी बेहूदा भाषा वाली टिप्पणियों को प्रकाशित ही नहीं करना चाहिए।

Anonymous said...

लगता है बात चुभ गई। सुभाष बाबू. मैं तो बस वर्तिका जी को समय रहते सचेत कर रहा था। वरना कौन नहीं जानता कि अविनाश अब उनको भी विवादों में डालकर क्या करने वाला है। रही बात मेरी तो मैंने तो अपने मैसेज में कोई अससंदीय बात तो नहीं लिखी, जो आप इतना आहत हो गए।

Anonymous said...

haan koi baadi baat nahi hai...avinash aisa to nahi tha. Lekin pata nahi kyon aisa kiya unhone...Manisha ji ki toh mattipaleed ki...Bechari iss dhokebaaj dogaale avinash par vishwas kar bathi...Bhai sahaab ne puri ki puri G chat chaap mar di....Hits ke liye. Pata nahi raat ko neend kaise aati hogi...vishwasghaat karne ke baad. Vertika ji bach ke rahiyega isse kaamal ki chees hai....baton baton me kab ko dank marega pata hi nahi chalega...:)

Tab tak ke liye Vertika ji...

Happy blogging.

One and only Anon1

राधेश्याम दीक्षित said...

अविनाश जी के माध्यम से वर्तिका जी को....
रंगों और तकनिक की महती जरूरत के बीच खोती जा रही टी.वी पत्रकारिता के अवशेषों में भी उम्मीदों का सागर लहरा रहा है। लेकिन इस विधा के पत्रकारों को जीवन के रंगों की अपनी समझ में इज़ाफा करने की जरूरत है। रंगों की ये समझ केवल टी.वी के लिए ही जरूरी हो ऐसा भी नहीं है, अख़बारों में भी रंगों का आर्कषण उसकी सर्कुलेशन पर असर ड़ालता है। इसलिए रंगों की ताशीर में सच्ची पत्रकारिता को घोलने के अपने हुनर में हर सच्चे पत्रकार को इज़ाफा करना ही समय की माँग है।
बात छेड़ने के लिए साधूवाद.....

राधेश्याम दीक्षित said...

अविनाश जी के माध्यम से वर्तिका जी को....
रंगों और तकनिक की महती जरूरत के बीच खोती जा रही टी.वी पत्रकारिता के अवशेषों में भी उम्मीदों का सागर लहरा रहा है। लेकिन इस विधा के पत्रकारों को जीवन के रंगों की अपनी समझ में इज़ाफा करने की जरूरत है। रंगों की ये समझ केवल टी.वी के लिए ही जरूरी हो ऐसा भी नहीं है, अख़बारों में भी रंगों का आर्कषण उसकी सर्कुलेशन पर असर ड़ालता है। इसलिए रंगों की ताशीर में सच्ची पत्रकारिता को घोलने के अपने हुनर में हर सच्चे पत्रकार को इज़ाफा करना ही समय की माँग है।
बात छेड़ने के लिए साधूवाद.....

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