बौद्धिक साम्राज्यवाद की शिनाख्त

अफलातून

मित्रो, मेरे एक प्रिय चिट्ठाकार को एक अन्य प्रिय चिट्ठेकार (और पत्रकार) ने एक ऐसी जगह बोलने के लिए न्यौता दिया था कि मुझे एक बुनियादी बहस को शुरू करने की गुंजाइश दिखी। मैंने यह घोषित कर दिया था कि मैं 7 दिसम्बर, 2005 को 'जनसत्ता' में सम्पादकीय पृष्ट पर छपे मुख्य लेख 'बौद्धिक साम्राज्यवाद की शिनाख्त' को चिट्ठे पर दूँगा। मित्र अविनाश से पूछा कि क्या यह 'मोहल्ले' पर दिया जा सकता है,तो उन्होंने खुशी से सहमती जतायी और यह भी बता दिया कि इस बाबत उन्हें जानकारी का अभाव है। मैंने इस चर्चा को शुरु करते वक्त दो प्रिय व्यक्तियों डॉ. सुनील दीपक और आदरणीय मैथिलीजी से इस बाबत प्रश्न किया। मैथिलीजी ने पत्र लिख कर अपने विचार बहुत स्पष्ट कर दिए:

आदरणीय अफलातून जी
सादर प्रणाम

आपका मेरे प्रति पश्न ही मुझे यह बताता है कि आप मेरे कार्यों के लिये कितने संवेदनशील हैं.

श्री सुनील दीपक के आगमन की सूचना एक माह पूर्व थी और हम सब उनसे बातचीत के लिये कहीं मिलना चाहते थे.

मैं सराय में श्री अविनाश जी के निमंत्रण पर गया था, लेकिन सिर्फ ब्लागर्स से मिलन हेतु. मैं व्यक्तिगत रूप से किसी भी विदेशी संस्था से धन लेकर बौद्धिक गतिविधि में भाग लेना उचित नहीं समझता. मेरा तो यही विश्वास है. सराय से हमारा कैसा भी संपर्क नहीं है.

मुझे इससे पहले सराय के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी. बस एक दो संदर्भों में नाम भर सुना था. श्री रवि रतलामी के ब्लाग पर जिसमें उन्होंने फैलोशिप के बारे में लिखा था उस पर मैंने टिप्पणी की थी कि हम ये काम करेंगे लेकिन किसी फैलोशिप के लिए नहीं, मुक्त स्रोत के लिए.

मुझ में आप अपना विश्वास कायम रखिए.
सादर आपका,
मैथिली
युवा चिट्ठेकार मसिजीवी ने 'सराय' से नाता रखने वाले कई चिट्ठेकार/साहित्यकार आदि के नाम दिए हैं। मैंने एक बार नीलिमा और सुजाता में भेद नहीं किया था और इसके लिए माफ़ी माँगी थी,उसके बाद से अन्तर स्पष्ट है। प्रगतिशील दिखने वाले विदेशी धन पर चलने काम के बारे में जिन्हें सफाई की आवश्यकता होगी उन्हें इस लेख को पूरा देने के बाद ही नजीर पेश कर सकूँगा।

बौद्धिक साम्राज्यवाद की शिनाख्त

मानव जीवन की तमाम गतिविधियों को अलग-अलग खांचों में बांट कर देखने पर हम अंधों के समूह की भांति अलग - अलग और आंशिक हकीकत को ही जान पाते हैं। यही नहीं , हम उसे संपूर्ण मान बैठते हैं। इसलिए सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक या बौद्धिक-शैक्षिक गतिविधियों को बांट कर नहीं देखा जाना चाहिए। शिक्षा की जहां अपनी एक दुनिया है वहीं उसमें व्यापक विश्व का प्रतिबिम्ब भी दिखाई देता है। अब तक अलग अलग दौर की जो भी समाज व्यवस्थाएं रहीं हैं उनके स्थापित मूल्यों और शक्ति-सन्तुलन को टिकाए रखने का चुनिंदा औजार उस जमाने की शिक्षा व्यवस्था होती है। जमाने के अच्छे-बुरे मूल्यों और मुल्क और इतिहास की दिशा में इस लिहाज से शिक्षा व्यवस्था की भूमिका अहम हो जाती है।

यथास्थिति को बरकरार रखने की प्रक्रिया में हर जमाने की शिक्षा व्यवस्था में मौजूद एक बुनियादी गुण की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह गुण 'अभिजात्यीकरण' के रूप में देखा जा सकता है। अभिजात्यीकरण एक क्रमिक 'मलाई' निकालने की एक प्रक्रिया होती है।इस क्रम की शुरुआत प्राथमिक स्कूल से ही हो जाती है। अभिजात्य वर्ग द्वारा परिभाषित उत्कृष्टता के मानकों पर भविष्य के अभिजात्य वर्ग के लिए मुट्ठी भर लोग बाकी समाज से अलग छांट लिए जाते हैं। यह सर्वथा मुमकिन है कि वंचित तबकों के कुछ बच्चे भी अलग न किए जाएं। अभिजात्यीकरण की छलनी शैक्षिक आरोहण की इस प्रक्रिया में क्रमश: महीन होती जाती है। चूंकि शिक्षा समाज की एक उपव्यवस्था है इसलिए उस समाज की सभी विशिष्टताओं का प्रतिबिम्ब उसमें देखा जा सकता है।

इस दौर में मौजूदा 'विश्व आभिजात्य वर्ग' नवऔपनिवेशिक षडयन्त्रों और अपसंस्कृति से परे हटता नहीं दिखाई देता। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सबसे बड़ी ताकत के रूप में अमेरिका स्थापित हुआ और तब से ही गवेषणा की अंतर्राष्ट्रीय दानदाता संस्थाओं से सत्ता-प्रतिष्ठान के नुमाइंदों का सम्बन्ध 'मौसेरे भाइयों' का रहा है। छठे दशक के मध्य में शोध सहायक इन दानदात्री संस्थाओं और अमेरिकी गुप्तचर एजेंसियों के गठजोड़ का पर्दा हुआ जिसके फलस्वरूप उनकी कूटनीति बदनाम हुई,उसे धक्का पहुँचा। इस खुलासे में कई भारतीय विभूतियों और शोध संस्थाओं के नाम भी चर्चा में आए थे। विदेशी धन का मूल स्रोत स्वयं इन लोगों के लिए अचरज का विषय था और कुछ ने उक्त अनुदानों को लेना बन्द कर दिया। लेकिन इस खुलासे से ऐसे अनुदान देने वाली अजेंसियों का हृदय परिवर्तन हो गया हो यह मानना शेर के शाकाहारी बन जाने की कल्पना करना होगा।

फोर्ड, रॉकफेलर,और कार्नगी फाउन्डेशन जैसे दानदाता प्रतिष्ठानों और अमेरिकी शासन तंत्र के बीच का सेतु उनकी 'परराष्ट्र संबंध परिषद' है जो अंतर्राष्ट्रीय मामलों में सर्वाधिक प्रभावशाली नीति निर्धारक समूह के तौर पर प्रतिष्ठित है। इस संस्था के अभिजात्यवादी स्वरूप के अनुरूप इसकी नियमवाली में उन्नीस सौ व्यक्तियों की अधिकतम सदस्यता निर्धारित है। नई सदस्यता मौजूदा सदस्यों की सिफारिश पर ही होती है। परिषद के सदस्यों की फेहरिस्त में अमेरिकी विदेश नीति को प्रभावित करने की योग्यता वाले तमाम नाम मिल जाएंगे।

परिषद की बैठकें गुप्त होती हैं।इसकी बहुराष्ट्रीय शाखा - त्रिपक्षीय आयोग (ट्राइलैटरल कमीशन) - का संदर्भ परिषद की बैठकों में चर्चा का विषय बना रहता है। परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष डेविड रॉकफेलर द्वारा १९७२ में त्रिपक्षीय आयोग की स्थापना की गई। रॉकफेलर फाउन्डेशन का सहयोग भी इस पहल को प्रप्प्त था। यह परिषद सीधी सरकारी सहायता से मुक्त है, पर प्रमुख दानदाता प्रतिष्ठान इसे भरपूर आर्थिक सहायता प्रदान करते हैं। राजनैतिक, सैन्य, व्यापारिक और शैक्षणिक हलकों की चोटी विभूतियाँ परिषद को सुशोभित करती हैं। अमेरिकी जनताअ के बीच गुप्तचर एजेंसी सीआईए की प्रमुख पहल के रूप में इसकी पहचान है।

(जारी)

8 कमेंट्स:

Debashish said...

जिस तत्परता से मैथिली जी और मसिजीवी ने पल्ला झाड़ा है सराय से उस पर थोड़े मंदहास की अनुमती दीजिये। आपकी राजनैतिक विचारधारा से असहमत लोग पापी, अधर्मी, देशद्रोही वगैरह हैं कृपया इस लहजे से इस सीरीज़ को न बढ़ाईयेगा। बहस हो हम सब चाहते हैं, पर यह मान कर चलें कि पाले के दोनों तरफ के लोग अपनी अपनी तौर पर सही हैं और उनका हक हैं कि वे अपनी राय के मुताबिक पाला चुनें। इसमें किसी को हीरो और किसी को विलन न बनायें तो बेहतर हो। सराय से जुड़े लोगों या उनके वित्त के पोषित कार्य ने देश का अहित किया हो यह मानने को मैं तैयार नहीं हूं। अमरीका को गाली भर देने के लिये सराय और उसके अच्छे काम पर आलंकारिक रूप से थूकना ज़रूरी तो नहीं।

अफ़लातून said...

@ देबाशीष ,
'मन्दहास' के हक़दार देबाशीष तब ज्यादा होते ,जब उनके इन्डेब्लॉगीज़ पुरस्कार के लिए पुरस्कार का एक प्रायोजक 'सराय' रहा है यह बताते हुए वे मैथिलीजी या मसिजीवी को चिकोटी काटने की यह चेष्टा करते ।
मूल निबन्ध पर प्रश्न ,असहमति ,सहमती या विरोध प्रकट किए जाँएं तब बहस ढंग से चलेगी ।

Debashish said...

अफलातून जी,

मैथिली जी या मसिजीवी या अन्य लोगों ने सराय के लिये कैसे कहाँ से पैसा पाया ये कहीं सार्वजनिक रूप से अब तक कहीं लिखा नहीं था। इंडीब्लॉगीज़ पर यह पृष्ठ साफ बताता है प्रायोजकों और दिये जा रहे ईनाम के बारे में (और ऐसा पृष्ठ हर साल बनाया जाता है)। कहने के पहले एक बार आप साईट पर टहल आते तो बढ़िया होता :)

और बता दूं कि इंडीब्लॉगीज़ पर अब तक कभी "नकद" ईनाम नहीं दिये गये और मुझे कोई "कट" नहीं मिलता। पर अगर नकद ईनामात बटें और कट मिले तो भी मैं सहर्ष स्वीकार करता और भविष्य में मौका मिलने पर करुंगा भी क्योंकि मैं कार्य के निमित्त को सर्वोपरि रखता हूं। सारय की पुस्तकें बाँट कर मैंने कोई देशद्रोह नहीं किया, कयास लगाते रहने के लिये आप स्वतंत्र हैं। सराय कोई अलकायदा नहीं जिसके पैसे से मैं परहेज़ रखने की सोचूं।

राजनैतिक दलों की दानवी नीति यही है कि वे लोगों के आचरण पर उंगली उठाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। आप का दल क्यों नहीं राष्ट्रीय आंदोलन छेड़ता कि सराय जैसी संस्थाओं को कथीत कलुषित अनुदान की राहें बंद हो जायें? नहीं, नेता यह थोड़े करेंगे। वे उन लोगों पर तंज कसेंगे जिन्हें यह पता भी न था कि फेलोशिप या प्रायोजन की राशि का मूल स्रोत क्या है, और जिससे उन्हें सरोकार होना भी न चाहिये। नेता दो जून का निवाला न जुटा पाने वाले आदिवासी को कोसेंगे कि उसने ईसाई धर्म क्यों अपना लिया, क्यों कथित नर्क का द्वार चुन लिया। इन्हीं बेपेंदी के नेताओं की सरकारें इन आदिवासियों के लिये रोजगार नहीं जुटा पाईं, इन्हें सदियों से दबा कुचला रख कर वोट और कास्ट कार्ड की राजनीति खेली, अपनी कोठियाँ बनवाईं और सात पुश्तों का सामान जमा किया, खुद शहरों को फूट लिये, मानवधर्म का परित्याग कर और अब उन लोगों को धर्मपालन का प्रवचन देना अच्छा लगता है जिनके लिये पेट पालना ही मुश्किल है। भूखे पेट भजन करवाईयेगा? अगर हिंदुत्व से मेरा पेट भरता हो, मेरा परिवार तिल तिल मरता हो, तन ढांकने का पैसा न मिलता हो तो मैं जीने के लिये कोई और धर्म क्या शैतान के पाले में भी जाने का पक्षधर हूं। क्योंकि पेट नीतियों, लफ्फाज़ियों और छद्म प्रवचनों से नहीं भरता। और फकत लफ्फाज़ी के अलावा नेताओं में और कोई काबलियत होती नहीं।

masijeevi said...

प्रिय देबाशीष ये आश्‍चर्यजनक है कि आपको मेरा कृत्‍य पल्‍ला झाड़ना दिखाई दे रहा है जबकि यदि आप इस श्रंखला को पूरा देख जाएं तो ऐसा कहीं नहीं है कि मैंने खुद को अपने कृत्‍यों को डिस्‍ओन किया है। उलटे हमने बार बार कहा कि बात शायद अहम है पर हमें अभी स्‍पष्‍ट नहीं है। मैंने अपने स्‍वतंत्र शोधकार्य के लिए जिसका ब्लॉगिंग से कोई लेना देना नहीं था, शोधवृत्ति ली थी और उस पैसे के एवज में एक लघु फिल्‍म बनाई थी जो दिल्‍ली के सिटी स्‍केप पर मेरे नजरिए को दिखाती है।
इस पैसे ने मुझे मनसिक गुलाम बनाया या नहीं यह मैं विनीत, अविनाश, रविकांत की तरह बहुत आत्‍मविश्‍वास से नहीं कह सकता।

बाकी आपकी इस बात से पूरा इत्‍तेफाक रखता हूँ कि जो मुझसे असहमत है वह मेरा शत्रु है, उसका बाप, पड़ोसी और कुत्‍ता भी मेरा शत्रु है ...ये रवैया अस्‍वीकार्य है। ब्‍लॉगजगत में और बाहर भी अपने सबसे प्रिय मित्र वे हैं जिनसे मेरी वैचारिक सहमति नहीं है कतई नहीं।

आपने सराए रीडर की प्रति इंडीब्‍लॉगीज के पुरस्‍कार में दी इसलिए आप उनकी पैरवी कर रहे हैं- इस विचार पर मंदहास में मैं आपके साथ हूँ।

Debashish said...

मसिजीवी शायद आप सही कह रहे हैं कि आपने कम से कम पल्ला नहीं झाड़ा। अच्छी बात है। मेरे कहने का आशय यह था कि अफलातून जी की आपत्ति होते ही सराय से जुड़े या उनके काम के बल पर उनके प्रशंसक बने लोगों को सहसा बगलें झांकने या माफी की मुद्रा नहीं अपना लेनी चाहिये। सराय ने लोकलाईज़ेशन का जो काम किया है उसका मैं मुरीद हूं और ये कोई सरकार या दल नहीं कर सका इसका भि बान है। विदेशी फंडिंग किन संस्थानों को होती है, क्यों होती है से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि वे काम क्या कर रहे हैं। और अगर आपत्ति है तो सरकार से कहे बैन करने को, सड़क के किनारे चाट बेच रहा दुकानदार अगर नाले का पानी इस्तेमाल कर रहा है तो यह स्वास्थ्य विभाह और नगरपालिका का दोष है चाट खाने वाले लोगों का नहीं। मुझे सत्य साई बाबा जैसे पाखंडियों से सख्त नफरत है पर मैं उनके द्वारा बनाये कॉलेज, हस्पताल और स्कूलों के काम को नकार नहीं सकता। ये समाज को दिया उनका तोहफा है और लोग लाभान्वित हो रहे हैं, भले ही उन्हें प्रातः उनकी आराधना का गीत गाना पड़े मुझे नहीं लगता इस एक गीत से वहां के छात्र सत्यसाईं के मानसिक गुलाम बन जाते हों। मुझे आपत्ति तब होती है जब ये बाबा लोग भस्म से ताबीज़ निकालकार दिखाते हैं या पेट सहलाकर पथरी निकाल लेने का दावा करते हैं। यह करना फ्रॉड है। स्कूल कॉलेजों के बहाने समाज को दिया सामान भले फ्रॉड के पैसे से बना हो मुझे व्यथित नहीं करेगा। वजह यह कि अव्वल ये काम तो सरकार का था जिन के तोंदियल नेता, ब्यूरोक्रैट और कार्पोरेटर शिक्षा और स्वास्थ्य का सारा पैसा डकार गये, तो समाज में ये काम करेगा कौन? यही निजी क्षेत्र के दल और स्वयंसेवी संस्थायें ही तो करेंगी। अब हम सरकार का कालर पकड़ने का दम न रखें और राजनेता समाज को ही कोसने लगे कि तुम सत्य साईं के स्कूल में जाकर धर्म का अपमान कर रहे हो तो कितना जायज बात है आप बतायें।

Aflatoon said...

देबाशीष , इन्डीब्लॉगीज़ कमीशन खाता है यह मैंने नहीं कहा।राजनैतिक दलों ने, खास कर वाम दलों ने इस मसले पर काफ़ी सोचा है। समता संगठन नामक जिस समूह से मैं जुड़ा रहा उसने १९८२ में इस मसले पर स्पष्ट सोच पेश की और फैसला लिया कि उसके सदस्य विदेशी धन लेने वाली स्वयंसेवी संस्था से मिले धन से अपना गुजारा नहीं चलाएंगे तथा ऐसे धन से चलने वाली संस्था का संचालन नहीं करेंगे। इस फैसले के बाद संगठन से अलग हुआ एक व्यक्ति 'सराय' की मातृ-संस्था CSDS से प्रोफेसर का वेतन पाता रहा है।उस CSDS से अलग किसी डिग्री कॉलेज में उसे नौकरी मिलने की योग्यता उसमें नहीं रही।
प्रकाश कारत ने भी स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा विदेशी धन लेने पर अच्छे लेख लिखे थे लेकिन बाद में यह देखा गया कि सीटू ने आईएललो तथा ज्ञान विज्ञान समितियों के माध्यम से अपने लोगों को इस क्षेत्र में जाने दिया।संघ के लोगों ने जयप्रकाश आन्दोलन के दिनों में मठी गाँधीवादियों से ऐसी परियोजना चलाना सीखा। द्विध्रुवीय दिनो में रूस को गरियाने वाले वामपंथियों को अमेरिका विशेष महत्व देता था। 'लिबरेशन' के कई अच्छे कार्यकर्ता जब ऐसे समूहों से जुड़े तो उन्हें तत्काल दल से मुक्त किया गया।
बहरहाल , यह राजनैतिक बहस बनी रहे, अराजनैतिक खाम ख्याली और विचारहीन मुद्दों पर जवाब नहीं दिया जएगा।
यह भी मुझे स्पष्ट है कि मसिजीवी या अविनाश जैसे मित्र जिन्होंने रोजी-रोटी के लिए यदि ऐसी दुकान से साबका रखा अनजाने में मशीन के पुर्जे भले रहे हों , मशीन कत्तई नहीं हैं।
मेरे भाई , नचिकेता देसाई अहमदाबाद UNI में कार्यरत थे और एक ब्रिटिश स्वयंसेवी संस्था में अंशकालिक काम के नाम पर उन्हें गुजरात के कस्बों के गुजराती अखबारों में छप रही आरक्षण विरोधी (मण्डल से पहले गुजरात के 'बक्षी पंच'की संस्तुतियों के विरोध में) खबरों का अनुवाद कराना चाहती थी।राष्ट्रीय नीतियाँ तो अपने मुल्क में बैठे बैठे पता चल जाती हैं लेकिन सामाजिक बल जमीनी स्तर पर कैसे काम कर रहे हैं -यह ऐसी संस्थाओं की रपट से आसानी से मिलता है।
इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग मे जब भारत प्रगति कर रहा था तब 'भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में महिला कर्मचारियों की स्थिति' पर प्रोजेक्ट में महिला कर्मियों की स्थिति के अलावा इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग की बाबत तथ्य प्राप्त करना उद्देश्य होता है।

Priyankar said...

बात साधन की पवित्रता और साध्य की पवित्रता दोनों की है . जैसा गांधी जी कहते थे . आज यह दृष्टि कितनी व्यवहारिक है,इस पर बहस हो सकती है . पर शायद इस आदर्श का महत्व किसी समय से बंधा हुआ नहीं है .सिद्धांत तो सार्वभौमिक और सार्वकालिक है . अनुपालन आप पर निर्भर करता है .

यह इस पर भी निर्भर करता है कि आप किस स्थिति में हैं,कितना दबाव झेल सकते हैं,आपकी लोलुपता का स्तर क्या है,वह नैतिकता के साथ कितने 'डिग्री' का कोण बनाती है और आप कितना प्रलोभन ठुकरा सकते हैं . भूख से मरते व्यक्ति का रोटी चुराना मुझे कभी अपराध नहीं लगा,पर मक्खन-मलाई के लिए समझौते करना निस्संदेह जुगुप्सा पैदा करता है . बेरोज़गार का समझौते करना आपदधर्म दिखता है पर कार-बंगले के लिए जगतोद्धार 'सेंसर' का हकदार है .

एक दृष्टि मात्र साध्य की पवित्रता की हो सकती है जैसे देवाशीष और रवि रतलामी की है . वे कह सकते हैं कि हमने काम किया -- अपनी समझ से अच्छा काम किया . धन के स्रोत से हमें कोई सरोकार -- कोई लेना-देना -- नहीं है . संस्था विशेष को क्लीन चिट दिए बिना वे अपने काम की महत्ता को 'जस्टीफ़ाई' करने का उद्यम कर सकते हैं .

सबको अपने ढंग से जीने और अपने निर्णय लेने का हक है . पर जो निर्णय सामाजिक महत्व के हैं -- जिनका सामाजिक-सामुदायिक निहितार्थ है उन पर बात तो होनी ही चाहिए .


अन्ततः बात वही है . साध्य और साधन दोनों की पवित्रता की . एक जाना-माना बलात्कारी यदि किसी नारी-निकेतन को पैसा देना चाहे तो क्या वह लिया जाना चाहिए ? और यदि वह पैसा लिया जाता है तो क्या देर-सवेर उस नारी-निकेतन में स्कैंडल्स की आशंका और उसके एक संदिग्ध-स्थान में बदल जाने का खतरा पैदा नहीं होता है ? या समाजसेवक जी पैसा लेने के बावजूद अपनी दृढता से उस दानदाता को या उसके असर को दूर रखने में कामयाब हो सकते हैं ?

तमाम मंदहास के बावजूद ऐसे प्रश्न बचे रहते हैं जिनका उत्तर हमें देर-सवेर देना होता है .

अजित वडनेरकर said...

इसे कहते हैं सार्थक, संयत, समझदारीभरी बहस ।

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