प्रमोद सिंह का फ्री-थिंकर प्रलाप

और ब्लॉग मठाधीशी के अंत की शुरुआत

हम बहस चलायेंगे!
आइए न, बड़ा मज़ा आएगा!


अज़दक से साभार

कितना अच्‍छा लगता है बहस करना. जिन्‍हें नहीं लगता अराजनीतिक हैं भगवारी हैं ब्‍लॉग की दुनिया के पटवारी हैं. हमारी तरह नवल नवरत्‍न सफेद घोड़े नहीं हैं, इंटर कालेज का चुनाव जीते नये इतराये लौंडों की तरह चौड़े नहीं हैं. हमें देखिये न, हमारी बहसों में एक अदा है. चारों ओर के राजनीतिक सूनेपन- बहस ब्‍लूज़ में, ओह, हम ट्रूली बहस बीज़ हैं! ऑर बहस वीनी हैं? सो डिफरेंट फ्रॉम एवरीवन एल्‍ज़, सो क्‍यूट ना? वेरी ब्रूट ना? ओह, वी आर सो अमेजिंग, फ्लाइंग सो हाई, डिड यू नोटिस? कितनी जगह लोग हम पर चर्चा कर रहे हैं, अपने एक क्राईम रिपोर्ट में मनोहर कहानियां तक ने हमको मेंशन किया है- डिड यू नोटिस? डिड यू, डिड यू? ओह, कितना अच्‍छा लगता है बहस करना! गरदन तक हम इस पंक में जंक में धंसे हैं! बहस बहस बहस स्‍ट्रेट मार्च लेफ्ट राईट देन लेफ्ट अगेन ओ वंडरस बहस, ओ माई लव, व्‍यूटि बहस वाइरस ओ ओ ओ!

बहस का हमने एक तरीका और अंदाज़ ईजाद किया है. धौंस व धमाके का, बात रखने, रखाने का. भैया व दादा को बुलाने, उलझाने फिर सात कदम आगे ले जाके उनकी पैंट उतरवाने, चप्‍पलों पिटवाने का. यही हमारी तमीज़ व तहजीब है. गो तमीज़ और तहजीब जैसे लफ़्जों को सजाना और मेहमान को अचक्‍के में चप्‍पलों ठुकवाना हमें बड़ा मनभावन लगता है. और सोचिये तो बुरा क्‍या है? आदमी बड़ा नहीं बहस बड़ी है. और फलाना अख़बार हमें बोल रहा है, ढिमाकी मैगज़ीन तोल रही है तो इसीलिए तो कि बहस खड़ी है? और हमने नहीं ‘जनता’ ने खड़ी की है (जनता शब्‍द हमें कितना तो प्‍यारा है!). हम तो सिर्फ़ मॉडरेट करते हैं. बस कुछ ऐसे हूनर से मैनिपुलेट करते हैं कि हर डेढ़ महीने चार लोग कुछ छूटे हुए बछड़ों की तरह आंगन में दौड़ने लगें. पटपटायें, गिर पड़ें, नाक से धुआं छोड़ने लगें. यह उससे भिड़ जाये, वह उसको पटक दे, ग़दर मच जाये, हम आज की, कल और परसों सबकी पसंद पर छा जायें. फिर किसी को लात लगे, कोई जोकर बन जाये घंटा हमारा क्‍या जाता है? बहस में रंग ऐसे ही थोड़ी आता है? फिर हम कुछ करते कहां हैं? जो करती है जनता करती है- दूध का दूध और पानी का पानी कर देती है. गो अलग बात है कि हमारा कोई पानी पानी नहीं करता. हम यहां इनको उनसे फंसाकर, लड़वाकर अपनी लड़ि‍याहटों की जगहों की खोज में निकल लेते हैं. जहां संवरना हो उसको सेट और जहां स्‍वार्थ न सधे उसे लंगी और बम पलेट कर आते हैं. आप बताइए, न न आप बक ही डालिए, ऐसी कौन सी जगह है जिसे सेटियाया जाना हो और हमने सेट न किया हो? एक नाम सूझता है कोई मथुरा से नरबाना तक? प्रगतिशील नीच से बाल चंदामामा तक? नहीं सूझेगा क्‍योंकि हम सुलझे हुए हैं! इतनी सारी जगहों पे हम छप रहे हैं आप देख रहे हैं? नहीं देख रहे हैं तो फिर आपने क़ायदे से ‘असली’ जनज्‍वार नहीं देखा. असली बहस भगंदर देखने से भी आप रह जा रहे हो. प्‍लीज़, अगली दफा आइए न? शान से आपकी स्‍वागत में हम क़सीदे पढ़ेंगे, खूब-खूब आपसे बुलवायेंगे; ज़रा वक़्त निकल जायेगा तब आपकी चूतड़ पर लात लगायेंगे. हो-हो बड़ा मज़ा आयेगा, आइए न, हम बहस चलायेंगे.
खेल के मैदान में युवा खिलाड़ियों को सहन न कर पाने वाले बुढ़ाते-पुराने खिलाड़ियों के मुंह से कैसे झाग निकलता है, देखना हो तो प्रमोद सिंह की बगल में पड़ी पोस्ट को देखिए। प्रमोद सिंह की व्यथा सुनिए, उनकी पीड़ा को पढ़िए। जो वो कह रहे हैं, वो तो सामने है, लेकिन उनकी इस पोस्ट का एक सबटेक्स्ट है। इस पोस्ट को डिकंस्ट्रक्ट करके देखिए। कोई आदमी अचानक उठता है (एक राजनीतिक जीवन जी चुका आदमी उठता है) और राजनीतिक-वैचारिक चर्चा को गाली बकने लगता है, ये कोई सहज बात तो नहीं है।

वही शख्स 9 फरवरी, 2008 को मीडिया के सोशल प्रोफाइल पर चल रही बहस के दौरान अजित वडनेरकर के ब्लॉग पर आता है और बहस में शामिल होता है। अजित जी की पोस्ट फिर आंच तेज न करनी पड़ जाए पर जब अनिल सिंह प्रतिक्रिया देते हैं कि सारा कुछ दलितों और पिछड़ों से निकले मलाई चाभने वालों की साजिश है, तो वो शख्स उनकी हां में हां मिलाता है। जाति की बहस में ब्राह्मणवाद के पक्ष में थोड़ा सकुचाते हुए खड़ा होता है। (ये सब टिप्पणियां आप पढ़ नहीं पाएंगे क्योंकि वो वेब पेज खुल नहीं रहा है। लेकिन उसके अवशेष, गूगल, ब्लॉगवानी और चिट्ठाजगत में बिखरे पड़े हैं।)



प्रमोद भाई, हमें आपसे सहानुभूति है। पुराना समय कितना अच्छा था। सौ सवा सौ ब्लॉगर थे। एक दूसरे को साधुवाद देते थे। खुश थे। माहौल कैसा खुशनुमा था। हैप्पी-हैप्पी। हर किसी के की-बोर्ड से फूल झड़ते थे। फिर एक नई चीज होने लगी। ब्लॉगर बहस करने लगे। मुद्दे उठाने लगे। चर्चा करने लगे। ये कोई बात हुई? आपकी सोने की लंका में ये उपद्रव। एक के बाद एक ब्लॉग नये नये मुद्दे उठा रहे हैं। चर्चा छेड़ रहे हैं। ये हिम्मत? और चोखेर बाली ने तो हद ही कर दी।

इन सबका तो शंबूक की तरह शिरोच्छेद करना होगा। शिरोच्छेद यानी सिर धड़ से अलग। लेकिन प्रमोद भाई तो नरम दिल के इंसान है। एकलव्य वाला फॉर्मूला कैसा रहेगा? लेकिन ब्लॉग का सिर या अंगूठा कैसे काटेंगे? इसके लिए उनकी विश्वसनीयता पर, ब्लॉग की उपयोगिता पर सवाल उठाना होगा। कहना होगा कि ऐसे ब्लॉग अनर्गल हैं। वैसे तो सभी लोग सज्जन होते हैं और दिल के भी साफ होते हैं, वो प्रमोद जी भी हैं। दिल के साफ और सज्जन।

लेकिन प्रमोद जी, ब्लॉग की समांतर मीडिया वाली भूमिका तो है ही। इसका क्या कर लेंगे? अमेरिका में ब्लॉगिंग का हाल का दौर युद्धविरोधी भावनाओं के प्रचार के लिए ही जाना जाता है। बर्मा के ब्लॉगर भी काफी सक्रिर रहे हैं। पाकिस्तान में भी कोशिशें हो रही हैं। लेकिन भारत में? ये सब नहीं चलेगा। बहस बंद। चाटुकारिता शुरू। प्रमोद जी, आपने आइडिया मोबाइल का वो एड देखा है, जिसमें एक चापलूस कुर्सी पर ऐंठकर बैठे ठाकुर अभिषेक बच्चन से कहता है- व्हाट एन आइडिया सरजी। वो चेहरा याद कीजए। मुझे लगता है कि आप अपने आसपास और ब्लॉग जगत में ऐसे ही लोगों को चाहते हैं। माफ कीजिए, ब्लॉगिंग के सभी रास्ते उधर से नहीं जाते। वैसे आपकी कलाकारी के हम पुराने फैन है। पुराने समकालीन जनमत के समय से।

और आखिर में प्रमोद सिंह की चंद पंक्तियां पढ़ते हैं।
कबाड़खाना, सस्‍ता शेर, भड़ास, मोहल्‍ला, बेटियों का ब्‍लॉग के ऊपर आप अपनी बोटियां सार्वजनिक करने चली आईं और ताबड़-तोड़ दनादन ऐसे पोस्‍ट पर पोस्‍ट ठेलने लगीं कि व्‍यास जी के गणेश जी भी अपनी लिखाई में गड़बड़ा जायें- इतने पर से आपको संतोष नहीं है? आप चाहती हैं सारे लोग सारा काम छोड़कर बस आपकी चोख और आपकी बाली देखें (जो वैसे भी होपलेसली हसीन नहीं है)? मैं इसका प्रोटेस्‍ट करता हूं, और गूदेवाले हर मर्द (व जनाना) से इसकी मांग करता हूं कि वे मेरे साथ एक सुर में गायें- ज़माने में और भी ग़म हैं चोख और बाली के सिवा!

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