बजाय इसके कि संसद दिखाई देने लगे
बजाय इसके कि संसद दिखाई देने लगेश्रावणी की वजह से मिले पितृत्व अवकाश के बाद जब दफ्तर पहुंचा था, तो मुनव्वर साहब की ओर से हिंदी-उर्दू-अंग्रेज़ी में अलग-अलग छपा दावतनामा हमारे लॉकर में पड़ा था। उनके बेटे की शादी की तारीख़ पुरानी पड़ चुकी थी और फोन करके माफ़ी मांगने की शर्म से बचने के लिए अब तक बेशर्म बना हुआ हूं। मुझे वे जन-शायर लगते हैं और मेरी इच्छा रहती है कि वे बीच-बीच में मोहल्लेवालों को अपनी ग़ज़लें सुनाते रहें। लेकिन वक्त और तकनीक की दीवार बीच में खड़ी हो जाती है। मुनव्वर राना साहब के पास फुर्सत होती, तो वे मोहल्ला के मेंबर होते। कलकत्ता-लखनऊ करते रहने के अलावा उनके पास देश-दुनिया के मुशायरों की व्यस्तता रहती है। इसलिए हमेशा ये ज़िम्मा हमारा रहा है और रहेगा भी, कि उनकी शायरी से हम सामइन की फ़रमाईश पूरी करते रहें। पेश है ये गज़ल...
ख़ुदा करे तुझे गुंबद दिखाई देने लगे
वतन से दूर भी या रब वहां पे दम निकले
जहां से मुल्क की सरहद दिखाई देने लगे
शिकारियों से कहो सर्दियों का मौसम है
परिंदे झील पे बेहद दिखाई देने लगे
मेरे ख़ुदा मेरी आंखों से रोशनी ले ले
कि भीख मांगते सय्यद दिखाई देने लगे
है ख़ानाजंगी के आसार मुल्क में राना
कि हर तरफ़ यहां नारद दिखाई देने लगे










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