एक उदासीन संप्रदाय
ओम थानवी की हवाना यात्रा महज एक यात्रा नहीं थी। ये चे की नयी खोज से भरी हुई यात्रा थी। ये खोज हमारे मुल्क में जिनकी ज़िम्मेदारी है, उन्हें इसकी ज़रूरत कभी महसूस नहीं हुई। दस्तावेजों, स्मृतियों और परंपराओं के प्रति ऐसी उदासीनता के कई अर्थ हो सकते हैं- और वे अर्थ किसी के सामने साफ नहीं हैं। गांधी से राजनीति की पारदर्शिता हमने सीखी नहीं। इसलिए हमारे सामने ढेर सारे छुपे हुए संदर्भ हैं, जिनके सामने आने से कइयों की राजनीतिक दुकान बंद हो सकती है। ओम थानवी अनंतर की इस तीसरी किस्त में बता रहे हैं कि कैसे चे की भारत यात्रा हमारे देश की कम्युनिस्ट पार्टी के लिए महत्वहीन थी।
पहली जुलाई, 1959 की सुबह केपी भानुमती दिल्ली के अशोक होटल में चे गेवारा से मिलीं। शाम को उन्हें ऑल इंडिया रेडियो के “न्यूज़रील” कार्यक्रम में चे का इंटरव्यू प्रसारित करना था। उन्होंने सबसे पहले भारत आने का सबब पूछा।चे ने कहा: “क्यूबा में बातीस्ता राज से आज़ादी के बाद मैं विएतनाम और दूसरे देशों की प्रत्यक्ष जानकारी हासिल करने के लिए निकला हूं, जिनका औपनिवेशिक शासन में दमन हुआ। भारत आपके प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बुलावे पर आया हूं। मैं खुद चाहता था कि भारत में आज़ादी के बाद शुरू हुए विकास-कार्यों को नज़दीक से देखूं। लातिनी अमेरिका में हमने भी साम्राज्यवाद को बहुत झेला है और हमें बहुत नीचे से ऊपर उठना है।”
भानुमती ने पूछा- आप समाजवादी अर्थव्यवस्था और समाजवादी मनुष्य की बात करते हैं। इसे कुछ स्पष्ट करेंगे? इस पर गेवारा बोले: “हम अल्प-विकसित देशों को साम्राज्यवादी पराधीनता, कठपुतली हुकूमतों और शोषण के कुचक्र से बरी होना है। हम उपनिवेश या पर-निर्भर मुल्क रहे हैं, जहां कम विकास हुआ है या बेतरतीब विकास। भूख स्वाधीनता के संघर्ष के लिए श्रेष्ठ परिस्थितियां पैदा करती हैं। बाहरी ताक़त के गुलाम हुए बगैर भी आप समाजवादी मानस और समाजवादी अर्थव्यवस्था अर्जित कर सकते हैं। ऐसा न हो सका तो कोई अल्पविकसित देश कभी भ्रष्टाचार से मुक्त व्यवस्था नहीं देख पाएगा।”
चे ने इस बातचीत में भारत का ख़ास ज़िक्र किया: “भारत ने लंबे संघर्ष के बाद आज़ादी हासिल की है। नेहरू के प्रति मेरे मन में बहुत आदर है। वे देश में आर्थिक आत्मनिर्भरता लाएंगे और भारत एक ताक़तवर मुल्क साबित होगा।” उन्होंने आगे कहा, “हमें ऐसा समाज तैयार करना होगा जिसमें सभी लोग वैयक्तिक मानवीय आकांक्षाओं की सामूहिक चेतना का साझा करें। नव-उपनिवेशवाद दक्षिणी अमेरिका से शुरू हुआ और फिर अफ्रीका व एशिया में उसने जड़ें जमायीं। ज़रा देखिए, विएतनाम और कोरिया में क्या हो रहा है। एशिया के कुछ मुल्कों में नृशंसता भयावह रूप में है। साम्राज्यवादियों की साज़िश पर काबू पाने के लिए हम अल्पविकसित यानी तीसरी दुनिया के देशों को एकजुट होना पड़ेगा।”
विचारधारा की बात करते हुए भानुमती ने एक सवाल यह भी पूछा कि आप कम्युनिस्ट माने जाते हैं, कम्युनिस्ट (साम्यवादी) मताग्रह एक बहु-धर्मी समाज में कैसे स्वीकार किये जा सकते हैं?
इस पर चे का जवाब यह था: “मैं अपने को कम्युनिस्ट नहीं कहूंगा। मैं एक कैथलिक होकर जन्मा, एक सोशलिस्ट (समाजवादी) हूं और बराबरी में और शोषक देशों से मुक्ति में भरोसा रखता हूं। मैंने लड़कपन के दिनों से भूख को देखा है, कष्ट, भयंकर ग़रीबी, बीमारी और बेरोज़गारी को भी। क्यूबा, विएतनाम और अफ्रीका में ये हालात रहे हैं, आज़ादी की लड़ाई लोगों की भूख से जन्म लेती है। मार्क्स-लेनिन के सिद्धांतों में उपयोगी पाठ (संदेश) हैं। ज़मीनी क्रांतिकारी मार्क्स के दिशा-निर्देशों को मानते हुए अपने संघर्षों का रास्ता खुद बनाते हैं। भारत में गांधी जी के सिद्धांतों की अपनी वकत है, जिन (सिद्धांतों) की बदौलत आज़ादी हासिल हुई।”
क्या गांधी-नेहरू के प्रति चे की प्रशंसा और आदर का भाव शिष्टाचार के नाते था? या यह कूटनीति थी?
मुझे लगता है, भारत में चे ने खुले नज़रिये से एक अजनबी- मगर जानदार और आकर्षक- विचार को समझने की कोशिश की। गांधी जी का ज़िक्र वे छोड़ सकते थे, जिनके बारे में उनसे पूछा नहीं गया था। वे सत्याग्रह और शांतिपूर्ण तौर-तरीक़ों पर टीका कर सकते थे। लेकिन उन्होंने हवाना लौट कर जो रिपोर्ट पेश की, उसमें भी साफ़ लिखा कि महात्मा गांधी के सत्याग्रह से भारत ने आज़ादी हासिल की और जन-असंतोष के शांतिपूर्ण प्रदर्शनों ने अंग्रेज़ों को मुल्क छोड़ने के लिए बाध्य किया।
चे के उस नज़रिये का संकेत उनके कलकत्ता के प्रवास में भी देखा जा सकता है। वे किन्हीं कृष्ण का ज़िक्र करते हैं, जिन्होंने महाविनाश के शस्त्रों के मामले में उनकी आंखें खोलीं। अपनी रिपोर्ट में चे लिखते हैं: “वहीं (कलकत्ते में) कृष्ण नाम के एक विद्वान से मुलाक़ात का मौक़ा मिला। वह एक ऐसा चेहरा था, जो हमारी आज की दुनिया से दूर लगता था। उस निष्कपटता और विनयशीलता के साथ उन्होंने हमसे लंबी बात की, जिसके लिए यह मुल्क जाना जाता है। उन्होंने दुनिया की समूची तकनीकी शक्ति और सामर्थ्य को आणविक ऊर्जा के शांतिप्रिय उपयोग में लगाने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए अंतरराष्ट्रीय बहसों की उस राजनीति की भरपूर निंदा की, जो आणविक हथियारों की ज़खीरेबाज़ी को समर्पित है।”
इस संवाद के प्रभाव के वशीभूत चे ने आगे लिखा, “भारत में युद्ध नामक शब्द वहां के जन-मानस की आत्मा से इतना दूर है कि वह स्वतंत्रता आंदोलन के तनावपूर्ण दौर में भी उसके मन पर नहीं छाया।”
कलकत्ता के उस मनीषी का ज़िक्र चे गेवारा ने दो महीने बाद हवाना में फिर किया। 8 सितंबर को सफ़र से लौटने के ठीक एक घंटे बाद, पत्रकारों से बातचीत करते हुए।
अमेरिका में एक बेहतर कायदा यह है कि तीस साल बाद गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक कर दिये जाते हैं। नाम-स्रोत काली स्याही से ढक कर। पुराने हवाना में एक कबाड़-से बाज़ार में मुझे ऐसा पुलिंदा पुस्तिका की शक्ल में मिला, जिसमें चे गेवारा को लेकर अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की क्यूबा से भेजी गयी सूचनाएं मूल (अमेरिकी फाइल की फोटोप्रति) रूप में संकलित थीं। पुस्तिका दस वर्ष पहले ऑस्ट्रेलिया में छपी। देख कर आश्चर्य होता है कि उसमें पहला दस्तावेज 1952 का है, जब चे की फिदेल कास्त्रो से मुलाक़ात तक नहीं हुई थी! उसके बाद उन पर लगातार नज़र रखी गयी। उस अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट से ही पता चला कि भारत के बाद चे पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) भी गये थे, जहां विशेषज्ञों के आने-जाने पर एक करार हुआ।
पुस्तिका में चे की हवाना वाली पत्रकार वार्ता का विवरण है। मोर्स पद्धति से अगले रोज़ अमेरिका भेजी गयी दो पेज की रिपोर्ट- जो भाषा और शैली में किसी पत्रकार की ख़बर जैसी लगती है- में बताया गया है कि कैसे चे ने यूरोप, मध्यपूर्व, एशिया और अफ्रीका की अपनी तीन महीने की यात्रा के अनुभवों का खुलासा किया। भारत के दौरे पर उनका कथन इस तरह उद्धृत है:
“क्यूबा के लोगों के प्रति भारत के लोग सहृदय थे। हमने पाया कि वे खेती लायक छोटी-छोटी ज़मीनों और बड़ी ज़मींदारियों से पैदा हुई समस्याओं को हल करने का प्रयास कर रहे हैं। ...एक भारतीय विद्वान कृष्ण से बातचीत करते हुए हमें महाविनाश के साधनों की बुराइयों का बोध हुआ। हिरोशिमा पहुंचने पर उस भयानक सच्चाई को जब हमने अपनी आंख से देखा तो बड़ी ग्लानि का एहसास हुआ कि कैसे उस वक्त हम लोगों ने खुशी का इजहार किया था, जब लोकतांत्रिक ताक़तों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान वहां अणु बम गिराया।”
कोई बता सकता है कृष्ण नामक वे मनीषी कौन थे, जिनसे कलकत्ता में चे गेवारा को ज्ञान मिला? मुझे इस बाबत कहीं से पुख्ता जानकारी नहीं मिली। बहुत-से लोगों का खयाल था कि आज की दुनिया से दूर के चेहरे वाले विद्वान शायद जिद्दू कृष्णमूर्ति रहे हों। पर इसकी संभावना नहीं लगती। मैंने बंगलूर कृष्णमूर्ति न्यास में बात की। वरिष्ठ लेखक और यायावर कृष्णनाथ इन दिनों वहीं हैं। वहां इसकी पुष्टि नहीं हुई। पुपुल जयकर की लिखी जीवनी के मुताबिक मई 1959 में कृष्णमूर्ति दिल्ली में थे और गर्मी से परेशान होकर तीन महीने के लिए कश्मीर चले गये थे।
हवाना में जब चे के भारत दौरे की रिपोर्ट हासिल की, स्पानी भाषा में थी। थोड़ा भावन पता चल जाता तो वहां कुछ और दरयाफ्त करने का यत्न करता!
बस एक शाम एक घंटे के लिए चे के कॉटेज एम्पोरियम जाने का ज़िक्र एक ख़बर के बीच में कहीं है।
कलकत्ता के अख़बारों में सिर्फ हिंदुस्तान स्टैंडर्ड में एक रोज़ (12 जुलाई) ख़बर नहीं, पर चे की तस्वीर छपी: कलकत्ता के अगरपाड़ा के पटसन कारखाने में 'सदाशय दौरे' (गुडविल मिशन) पर क्यूबा से आये अर्नेस्तो गेवाने (अख़बार में प्रूफ की भूल)। पांचवें पृष्ठ पर, कारखाने के दौरे के दो दिन बाद।
उन दिनों भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (तब पार्टी एक थी) का बांग्ला दैनिक स्वाधीनता वहां से निकलता था। लगा उसमें चे के कलकत्ता दौरे का भरपूर ब्योरा होगा। मेरे आग्रह पर एक वरिष्ठ प्रतिबद्ध लेखक ने जुलाई 1959 के अंकों के साथ स्वाधीनता के आगे-पीछे के अंक देख डाले। पार्टी के अख़बार ने क्यूबा क्रांति की ख़बरें भले बढ़-चढ़ कर छापी हों, गेवारा की यात्रा उसने पूरी तरह गोल कर दी। जबकि चे की यात्रा को पार्टी का अख़बार तो बढ़-चढ़ कर प्रचारित कर सकता था। यह बेरुखी क्यों रही, कोई नहीं जानता। वह छुपी यात्रा नहीं थी, दूसरे अख़बार में छपी तस्वीर से यह आप जाहिर है।
यह ज़रूर है कि चे कभी कम्युनिस्ट पार्टी से सीधे नहीं जुड़े। वे रूसी साम्यवाद के आलोचक थे। उसे उन्होंने रूसी उपनिवेशवाद की संज्ञा दी थी। उन्हें इस पर एतराज़ था कि कोई साम्यवादी देश तीसरी दुनिया के अविकसित देशों से हथियारों और बाक़ी सहयोग के लिए मुनाफा कैसे कमा सकता है। बाद में चे ने माओ की नीतियों की बहुत तारीफ़ की। यह कहते हुए कि क्यूबा को अपना साम्यवाद खुद तलाशना होगा। 1965 में अल्जीरिया में एक खुली सभा में चे ने रूसी साम्यवाद की आलोचना की। क्यूबा लौटने पर उन्हें इसकी क़ीमत चुकानी पड़ी।
मगर भारत में पांच लोगों का प्रतिनिधिमंडल चे के नेतृत्व में क्यूबा क्रांति का दूत बन कर आया था। क्या यहां पार्टी का कोई नेता उनसे नहीं मिला? क्यूबा की क्रांति के बाद उसके किसी नायक ने पहली बार भारत आने पर कोई स्वागत या अभिनंदन हुआ? पार्टी के अख़बार में ही नहीं, चे की अपनी रिपोर्ट में भारत के दस दिन के प्रवास के दौरान किसी साम्यवादी नेता से मुलाक़ात का हवाला नहीं है। क्या पार्टी को उनसे दूर रहने का इशारा था? उस बेरुखी का ही नतीजा है कि चे की भारत यात्रा कोई पचास साल जनमानस की स्मृति से पूरी तरह ग़ायब रही। आगे जाकर भारत में उन्हें नवाजने वाले साम्यवादियों में भी।
मुझे आज भी चे गेवारा के मामले में देश के साम्यवादी दलों का रवैया कम पेचीदा नहीं लगता। अगले पखवारे - 9 अक्तूबर को - चे की शहादत के चालीस साल पूरे हो जाएंगे। दुनिया भर से आये दिन तरह-तरह के आयोजनों की ख़बरें आती हैं। इस सच्चाई के बावजूद कि क्रांति के बाद चे की जिम्मेवारी में उन बंदी सैनिकों के साथ नाइंसाफ़ी हुई, जिन पर विद्रोहियों पर जुल्म ढाने के आरोप थे। उन्हें बगैर वाजिब सुनवाई के मौत की सजा दी गयी। कुछ कथित गद्दारों पर चे ने खुद गोली दागी। उनके चरित्र में यह अंधेरा पहलू रहा।
लेकिन चे की शख्सियत में सघर्ष की दास्तान भी बहुत लंबी है। एक मानवीय चेहरे के साथ। सत्ता धारण कर भले कुछ बदल गये। पर सियरा-माएस्त्रा की पहाड़ियों में, फिदेल के विमत के बावजूद, वे घायल दुश्मन को इलाज के लिए उठा लाते थे। एक दफा फिदेल ने कहा, इसे हमने घायल किया था, ठीक होकर यह हमीं पर बंदूक तानेगा। चे का जवाब था- तब देखेंगे। लड़ाई में जो कमज़ोर होगा, मारा जाएगा। सब जानते हैं मकसद के साथ चे ने घर छोड़ा, डॉक्टरी का पेशा छोड़ा, देश छोड़ा, सत्ता छोड़ी और दूसरों के लिए लड़ते हुए अंतत: दुनिया भी। ज्यां पॉल सार्त्र ने चे से मिलने के बाद उन्हें “हमारे दौर का सबसे पूर्ण मनुष्य” कहा था।
उस क्रांतिकारी की याद में देश के साम्यवादी क्या कर रहे हैं?
क्या आपको नहीं लगता, वे अपनी पचास साल पुरानी उदासीनता को दुहरा रहे हैं?
और अंत में
हवाना से लौटते वक्त लंदन में गार्डियन अख़बार के दफ्तर में प्रदर्शनी देखने गया। वहां भारत के सिद्ध कार्टूनिस्ट मरहूम अबू अब्राहम के उन व्यंग्यचित्रों का संग्रह प्रदर्शित था, जो उन्होंने लंदन में 'ऑब्ज़र्वर' के लिए काम करते हुए बनाये। बाद में अबू इंडियन एक्सप्रेस में दिल्ली आ गये थे।
लंदन की प्रदर्शनी में एक रेखाचित्र चे गेवारा का था। अबू 1962 में हवाना गये। चे तब क्यूबा के उद्योग मंत्री थे। उस चित्र पर चे के तीन अक्षरों वाले दस्तखत हैं। यों भी वह एक बहुत उम्दा रेखांकन है।
कैप्शन
- दिल्ली में 2 जुलाई, 1959 को रक्षा मंत्री वीके कृष्ण मेनन के साथ चे गेवारा। अगले रोज़ हिंदुस्तान टाइम्स में छपी तस्वीर।
- दिल्ली में चे की भारत यात्रा की एक ख़बर। उनके कलकत्ता प्रवास की साम्यवादी दैनिक तक ने उपेक्षा की। संभवत: तब पार्टी की ऐसी नीति रही हो।







0 comments:
Post a Comment