भारत में चे गेवारा
यह भारत की अख़बारनवीसी के इतिहास में पहली बार है, जब चे को लेकर संजीदगी से बात की गयी है। जनसत्ता के संपादक ओम थानवी पिछले दिनों हवाना गये और चे की भारत यात्रा से जुड़े कई ऐतिहासिक दस्तावेज अपने झोले में भर कर ले आये। इनमें वो परचा भी है, जो चे ने भारत से लौटकर लिखा था और अपने राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो को सौंपा था। भारत में चे ने कुछ बहुत ही रोमांचक पल गुज़ारे, जिसका थोड़ा वृत्तांत ओम थानवी ने अपने समय की मशहूर रेडियो पत्रकार केपी भानुमती से हासिल किया। हवाना के सफर और भारत के संदर्भ में चे की खोज पर ओम थानवी की पहली किस्त के बाद पेश है ये दूसरी कड़ी।
अर्नेस्तो चे गेवारा सरना 30 जून, 1959 की शाम दिल्ली पहुंचे थे।
वे छह महीने पहले क्यूबा में हुई सशस्त्र क्रांति के बड़े नायक थे। सरकार के गठन के बाद राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो ने उन्हें तीसरी दुनिया के देशों से संबंध कायम करने का जिम्मा सौंपा। क्यूबा की क्रांति के दूत बन कर चे ने कई देशों की यात्रा की। भारत सरकार से उन्हें खास बुलावा था, जिसने फिदेल कास्त्रो की सरकार को फौरन मान्यता दी।
वियतनाम होते हुए चे भारत आये। हवाई अड्डे पर विदेश मंत्रालय के प्रोटोकॉल अधिकारी डीएस खोसला ने उनकी अगवानी की। क्यूबा के उस प्रतिनिधिमंडल में पांच लोग थे। चे की सुनहरे तारे वाली बगैर छज्जे की टोपी, लंबा सिगार और ऊंचे फीतों वाले जूते उन्हें बाकी लोगों से अलग करते थे। प्रतिनिधिमंडल को चाणक्यपुरी में नये बने अशोक होटल में ठहराया गया।
अगले ही रोज़ चे और उनके सहयोगी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिले। उनके साथ भोजन किया। उसके बाद ओखला औद्योगिक क्षेत्र में लकड़ी को आकार देने वाली मशीनों का कारखाना देखा। शाम को वाणिज्य मंत्री नित्यानंद कानूनगो से मिले। भारत और क्यूबा के भावी व्यापारिक रिश्तों के लिहाज से यह महत्वपूर्ण बैठक थी, जिसमें दोनों देशों के बीच आयात-निर्यात पर चर्चा हुई। अगले रोज़ प्रतिनिधिमंडल योजना आयोग गया। उस बैठक में आयोग के तीन सदस्य श्रीमन्नारायण, टीएन सिंह और सीएम त्रिवेदी शामिल हुए। वे लोग कृषि अनुसंधान परिषद भी गये, जहां उन्होंने गेहूं की एक उन्नत किस्म का जायज़ा लिया।
तीन जुलाई को चे ने दिल्ली के पास पिलाना गांव में सामुदायिक (सहकारी) परियोजना के कुछ कार्यक्रम देखे। खेत और एक स्कूल देखा। लौट कर दल सामुदायिक विकास और सहकारिता मंत्री एसके डे से मिला। चार जुलाई को खाद्य व कृषि मंत्री एपी जैन से उनकी भेंट हुई। फिर वाणिज्य और उद्योग मंत्रालयों के अधिकारियों से, जिन्होंने उन्हें भारतीय चाय और कॉफी भेंट दी। यह सब जानकारी फोटो प्रभाग के निदेशक देवतोष सेनगुप्त से तस्वीरों के साथ मिली। लेकिन खोजबीन के बाद। हम लोग चे गेवारा का नाम ढूंढ़ते थे। वहां चे चे नहीं थे। फाइलों में उनका नाम अर्नेस्ट गेवारा दर्ज था!इस दौरान चे- जैसा कि उन्होंने खुद लिखा है- रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन और सैन्य अधिकारियों से भी मिले। पांच या छह जुलाई को दल कोलकाता (तब कलकत्ता) के लिए रवाना हो गया। हवाना के दस्तावेजों में आठ जुलाई को लखनऊ का कोई चीनी अनुसंधान केंद्र देखने का भी ज़िक्र है। इसकी पुष्ट जानकारी नहीं मिल सकी। भारत से चे शायद बर्मा गये और फिर आगे वियतनाम। उनके पत्रों में बीत्रिज नामक किसी रिश्तेदार को रंगून से लिखा एक पत्र है, जिस पर 13 जुलाई, 1959 की तारीख पड़ी है।
फिर भी चे की भारत यात्रा का विस्तृत ब्योरा हमारे यहां उपलब्ध नहीं है। भारत से लौटने के बाद वे क्यूबा के राष्ट्रीय बैंक के अध्यक्ष और फिर उद्योग मंत्री- व्यवहार में वित्त मंत्री- बने। इसके बावजूद भारत में वे क्यूबा के राष्ट्रीय नेता के रूप में मौजूद थे। भारत का उनका दौरा लंबा था। छह-सात दिन वे दिल्ली में रहे। बाद में दूसरे शहरों में गये। पर देश में छपी सामग्री में कहीं उस दौरे का ब्योरा नहीं मिलता। थोड़ी ही जानकारी मुझे मिली। पर चे के विचार-दर्शन में विश्वास करने वालों को यह काम गंभीरता से करना चाहिए।
मुझे अचंभा हुआ, जब पिछला लेख पढ़ कर बुज़ुर्ग पाठकों तक ने आंखें फैला कर कहा- क्या? चे गेवारा भारत आये थे! कवि मित्र लाल्टू कोलकाता में पले और बड़े हुए हैं। उन्होंने बताया कि वहां कभी किसी बहाने यह ज़िक्र नहीं सुना कि चे गेवारा ने कोलकाता अपनी आंखों से देखा था। जबकि पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री विधानचंद्र राय के साथ चे की वहां हुई मुलाक़ात की तस्वीर मौजूद है। हवाना से मैं वे तस्वीरें भी लाया हूं जो चे ने कोलकाता की सड़कों पर खुद खींचीं। सब जानते हैं, पढ़ने के अलावा छायाकारी ही उनका शौक था। मेरे अपने संग्रह की किताबों- जाहिर है, क्यूबा में हासिल- में चे की खींची ढेर तस्वीरें हैं: माचू-पिच्चू के शिखरों से लेकर हनोई के चौराहों तक।
यों चे गेवारा के भारत दौरे का थोड़ा ज़िक्र जॉन ली एंडरसन की लिखी मशहूर जीवनी ए रिवोल्यूशनरी लाइफ और वयोवृद्ध पत्रकार केपी भानुमती की हाल में छपी किताब कैंडिड कनवर्सेशंस में है। एंडरसन की किताब चे पर लिखी गयी किताबों में सबसे मशहूर है। आठ सौ पन्नों में उन्होंने चिकित्सक से क्रांतिकारी होने की दास्तान बड़ी शिद्दत से बयान की है। बल्कि एंडरसन की बदौलत वेलेग्रांदे (बोलीविया) में चालीस साल पहले चे और उनके साथियों के गुपचुप गाड़े गये शव का ठिकाना मिल सका।
लेकिन जीवनी में चे के भारत दौरे का अप्रामाणिक निष्कर्ष है और दौरे के सहयोगी पार्दो लादा के हवाले से बिल्कुल किस्से जैसा ब्योरा। पार्दो के मुताबिक चे के 'नायक' रहे नेहरू के साथ मुलाक़ात दोपहरण शानदार खाने पर हुई। 'सरकारी महल' (तीन-मूर्ति भवन?) में खाने की मेज़ पर इंदिरा गांधी और उनके बच्चे राजीव और संजय भी मौजूद थे। पार्दो कहते हैं, चे नेहरू से चीन और माओ के बारे में सवाल पूछते रहे और नेहरू उन (गंभीर) सवालों को नितांत अनुसना करते हुए मेज़ पर सजे पकवानों-फलों की बात करते रहे।
चे क्यूबा के राष्ट्रनायक थे और उनकी शोभा में कनिष्ठ सहयोगी तथ्यों को थोड़ा रंग कर बताएं, यह सहज संभव है। लेकिन हैरानी तब होती है, जब एंडरसन खुद कहते हैं- चे भारत से इस अनुभव के साथ लौटे कि आधुनिक भारत के प्रवर्तकों से सीखने के लिए कुछ ख़ास नहीं है। नेहरू सरकार कृषि-सुधार का कोई मूलभूत कार्यक्रम लागू करने या धार्मिक और सामंती संस्थाओं की ताक़त शिथिल करने की दिशा में अनिच्छुक दिखाई देती है। इसके पीछे चे ने, एंडरसन के अनुसार, भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परंपराओं को अवरोध के रूप में देखा।
संयोग से हवाना में चे अध्ययन संस्थान में मुझे वह पूरी रिपोर्ट मिल गयी, जो दौरे से लौटने के बाद चे ने फिदेल कास्त्रो के सुपुर्द की थी। साप्ताहिक वेरदे ओलिवो के 12 अक्तूबर, 1959 के अंक में वह रिपोर्ट सार्वजनिक हुई। उसका हू-ब-हू अनुवाद इसी अंक में अन्यत्र प्रकाशित है। उसे पढ़ कर कोई भी जान सकता है कि चे गेवारा ने भारत को हताशा में नहीं, तटस्थ नज़रिये से देखा। यहां की सामाजिक विषमताओं के साथ प्रगति की ललक को समझने की कोशिश की। खयाल रखें, भारत को अंग्रेज़ी राज से बरी हुए तब बमुश्किल बारह साल हुए थे। चे ने इस तथ्य पर गौर किया था।
अपनी तीन पृष्ठ की उस रिपोर्ट में चे विरोधाभसों के देश भारत के औद्योगिक विकास और भयानक दरिद्रता के बीच खाई वाले विचित्र और जटिल परिदृश्य के साथ विकास में आये असाधारण सामाजिक महत्व के अभिनव परिवर्तन लक्ष्य करते हैं। वे कृषि सुधार की तकनीकों पर ध्यान देते हैं। भारत और क्यूबा के सामाजिक-आर्थिक ढांचे को एक-सा करार देते हुए दो उद्योगशील देशों की साथ-साथ उन्नति की संभावना भी व्यक्त करते हैं। तकनीकी विकास में भारतीय वैज्ञानिकों की महारत का लोहा मानते हुए साफ कहते हैं कि इस यात्रा में हमें कई लाभदायक बातें सीखने को मिलीं... सबसे महत्वपूर्ण बात हमने यह जानी कि एक देश का आर्थिक विकास उसके तकनीकी विकास पर निर्भर करता है।लेकिन चे के भारत-दर्शन में मुझे सबसे अहम बात यह लगी कि उन्होंने बगैर झिझक, भारत की स्वतंत्रता में गांधीजी के सत्याग्रह की भूमिका को पहचाना। रिपोर्ट में उनके अपने शब्द हैं: जनता के असंतोष के बड़े-बड़े शांतिपूर्ण प्रदर्शनों ने अंग्रेज़ी उपनिवेशवाद को आख़िरकार उस देश को हमेशा के लिए छोड़ने को बाध्य कर ही दिया, जिसका शोषण वह पिछले डेढ़ वर्षों से कर रहा था।
मेरे मन में यहां पुरानी खुदबुद फिर उठती है। पढ़ने-लिखने वाला, शब्दों और दृश्यों में अभिव्यक्ति खोजने वाला संवेदनशील युवक क्यूबा लौटकर फिर हिंसा के उसी रास्ते पर क्यों लौट गया, जो कहीं नहीं ले जाता?
इसका जवाब चे ने भारत में ही देने की कोशिश की, केपी भानुमती को अपनी ओर से, तब जब वे दिल्ली के अशोक होटल में ऑल इंडिया रेडियो के लिए उनका इंटरव्यू लेने पहुंचीं। भानुमती के मुताबिक चे ने कहा, आपके यहां गांधी हैं, दर्शन की एक पुरानी परंपरा है, हमारे लातिनी अमेरिका में दोनों नहीं हैं। इसलिए हमारी मन:स्थिति (माइंड-सेट) ही अलग ढंग से विकसित हुई है।
मगर यह बात भानुमती की किताब में नहीं है, जिसमें दुनिया के अनेक बड़े नेताओं के साथ चे गेवारा से उनकी बातचीत शामिल है। दिल्ली में सुजानसिंह पार्क के अपने घर में चे से मुलाकात के नोट्स और फोटो दिखाते हुए भानुमती ने मुझे आहत भाव से बताया कि प्रकाशक ने उनके कई अध्याय बेमुरव्वत होकर काट-छांट डाले।
भानुमती से बात करना दिलचस्प अनुभव है। वे उम्र के आख़िरी पड़ाव पर हैं, पर सक्रिय हैं। ऑल इंडिया रेडियो के साथ उनका नाम उस दौर में चमक के साथ जुड़ा रहा, जब हमारे यहां रेडियो का जलवा था। भानुमती की टीस है कि उन्होंने एक दक्षिणपंथी राजनीतिक दल (वे नहीं चाहतीं कि नाम छपे) की शिकायत पर महानिदेशक मेनन से जिरह के बाद नौकरी छोड़ दी। बाद में वे अख़बारों के लिए लिखने लगीं। बहरहाल, रेडिया के लिए उन्होंने हो ची मिन्ह, चाऊ एनलाई, जूलियस न्येरेरे जैसे नेताओं से लेकर गुन्नार मिर्डल, आंद्रे मालरो, अगाथा क्रिस्टी जैसी जाने कितनी शख्सियतों को इंटरव्यू किया। चे गेवारा उनमें प्रमुख थे। भानुमती के घर की दीवारों पर टंगी दर्जनों तस्वीरों में दो चे गेवारा की हैं।पहली जुलाई, 1959 की सुबह साढ़े आठ बजे भानुमती अशोक होटल के छठे माले पहुंचीं। चे गेवारा ने दरवाज़ा खुद खोला। अकेले थे। कोई सुरक्षाकर्मी तक नहीं। भानुमती के साथ ब्लिट्ज के संवाददाता राघवन और छायाकार पीएन शर्मा थे। राघवन भानुमती से मिन्नत कर इस शर्त पर साथ हो लिये थे कि इंजीनियर की जगह वे बातचीत की रेकार्डिंग कर देंगे और कोई सवाल नहीं पूछेंगे। भानुमती कहती हैं, वे संकोच के साथ मान गयीं, क्योंकि राघवन ने ही उन्हें चे के दौरे की सूचना दी थी। छायाकार शर्मा को गेवारा का फोटो लेने के लिए वॉयस ऑफ अमेरिका ने तैनात किया था, जिसका ऑल इंडिया रेडियो से प्रसारण का कोई तालमेल था। दिलचस्प बात यह है कि यहां के रेडियो को फोटो की दरकार नहीं थी, वाशिंगटन के रेडियो को थी!
बातचीत कोई आधा घंटा चली। पर रेडियो पर प्रसारण मुश्किल से दो मिनट हुआ होगा। न्यूज़रील कार्यक्रम में कई घटनाएं समेटनी होती थीं। उसी में कहीं वह इंटरव्यू खप गया, भानुमती ने बताया। उसका टेप अब मौजूद नहीं है, क्योंकि तब रेडियो में एक ही स्पूल (टेप की पुरानी चकरी) मिटा कर बार-बार इस्तेमाल करने की प्रथा थी। लेकिन हमेशा की तरह चुनिंदा प्रश्नोत्तर उन्होंने लिख कर रख लिये। एक रोज़ क्यूबा के राजदूत उसकी प्रति लेने उनके घर आये। भानुमती ने खुशी-खुशी उन्हें चे से मुलाक़ात की दो तस्वीरें भेंट कर दी।
भानुमती कहती हैं, चे से साक्षात्कार उनकी यादगार मुलाकात था। उनके शब्दों में: कोई फौजी वर्दी की तरफ ध्यान न देता तो कल्पना करना मुश्किल था कि वह शख्स कभी गुरिल्ला रहा होगा। वकीलों या नेताओं की तरह चे तेज़ भी नहीं लगते थे। उनकी आवाज़ नम्र थी और लहज़ा किसी याचक की तरह भद्र। किसी परिजन की सी सहजता में, मगर बहुत सोच कर और लंबे अंतराल देकर बोलते थे, जैसे ज्योतिषी बोला करते हैं। पूरी मुलाक़ात के दौरान वे मोंटी-कारलो सिगार पीते रहे, जिसका डिब्बा मेज़ पर रखा था। बचपन से दमे के रोगी रहे जुझारू व्यक्ति में यह आदत देख कर मुझे कुछ आश्चर्य हुआ। हर सवाल को सुनते वक्त वे कश खींचते, जवाब देने से पहले राख झटक कर सिगार राखदानी पर ठहरा देते और माइक्रोफोन की ओर झुक जाते।
भानुमती ने सबसे पहले उनसे भारत आने का सबब पूछा।
तस्वीरें कुछ कहती हैंपहली तस्वीर: चे गेवारा ने प्रधानमंत्री नेहरू को क्यूबा के सिगार का डिब्बा भेंट किया। धूम्रपान के शौकीन नेहरू के चेहरे पर फैली मुस्कान तस्वीर में देखी जा सकती है। नेहरू ने लड़ाके गेवारा को कटारी भेंट की थी। (फोटो: कुंदनलाल)
दूसरी तस्वीर: 3 जुलाई, 1959 को चे गेवारा और उनके सहयोगी दिल्ली के पास पिलाना गांव में सहकारी परियोजना देखने गये। किसानों ने वहां उनका स्वागत किया।
तीसरी तस्वीर: एक ख़ूबसूरत पोट्रेट
चौथी तस्वीर: दिल्ली के अशोक होटल में ऑल इंडिया रेडियो के लिए बात करतीं केपी भानुमती। (फोटो: पीएन शर्मा)







0 comments:
Post a Comment