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एक भगोड़े मीडियाकर्मी का बयान

अव्‍यक्‍त शशि

कई बार जो बात व्‍याख्‍याओं में नहीं साफ हो पाती है, वो आपबीती के रेशों के ज़रिये रौशन होती है। ये प्रतिक्रिया कुछ ऐसी ही है। भारत में मीडिया के सच को सामने रखता एक मार्मिक संस्‍मरण हम इसे कह सकते हैं- लेकिन ये शायद सिर्फ संस्‍मरण नहीं है। आत्‍मस्‍वीकारोक्तियों की रोशनाई में लिखा गया एक ऐसा आत्‍मकथांश है- जो बताता है कि हम जहां से समाज को बदलने के सपने देखते रहे हैं, वह जगह खुद कितनी बदल गयी है, बेगानी हो गयी है। मोहल्‍ले में यह एक टिप्‍पणी के रूप में आयी थी, जिसे हम अलग से प्रकाशित कर रहे हैं। पहले लगा कि लेखक ने अनाम सेवा की है, लेकिन जब हम नाम पर क्लिक करके उनके घर तक पहुंचे, तो लगा कि ये तो मुक़म्‍मल शब्‍दकार हैं।

पुर्तगाली कवि फरनांदो पैसोआ की वह भगोड़ा मैं हूं शीर्षक से एक कविता है। कवि कहता है,
वह भगोड़ा मैं हूं,
मेरे जन्मने बाद
उन्होंने मुझे मेरे अंदर बंद कर दिया
लेकिन मैं छूट निकला।
मैं उस दौर का स्वयंभू भूतपूर्व पत्रकार हूं, जिसने न तो दिनमान और धर्मयुग के समय की स्वर्णिम (??) पत्रकारिता देखी थी और जिसे न ही एसपी सिंह के साथ काम करने या उन्हें काम करते देखने का रोमांच नसीब हो पाया था। वह तो पत्रकारिता संस्थानों से डिग्री-डिप्लोमा लेकर किसी जुगाड़ से इस पेशे में घुसनेवाला और आम तौर पर लुच्चा और अगंभीर मानी जाने वाली तुरंता पीढ़ी का एक प्रतिनिधि मीडिया प्रोफेशनल था।

देश के सबसे बड़े मीडिया संस्थान में दाखिले के लिए चयनित होने की जो खुशी होती है, उसे मैंने भी अपने उन मित्रों, शुभचिंतकों और उन गुरुजनों के साथ मनाया था, जिन्हें लगता था कि यह आदमी मीडिया में जाकर अपनी उन्हीं संवेदनाओं, मुद्दों और यथार्थ को जगह दे पाएगा, जिसे वह अपने ग्रामीण परिवेश से लेकर इस महानगरीय जीवन को भोगते हुए विश्वविद्यालयी चर्चाओं में बड़े ही शिद्दत से मुखर होकर व्यक्त करता रहा है।

इस ख़्वाबगाह में घुसते ही मुझे एहसास कराया जाने लगा कि मुझमें भीम की तरह दसियों हज़ार हाथी का बल आ गया है और इसलिए मैं खास हूं। जबकि इसके उलट कई लोगों ने तो एकेडेमिया का भावी करियर छोड़ कर इस ओर चल पड़ने को त्याग तक की संज्ञा दे डाली थी।

मेरा एक नया जन्म होने वाला था। गांव-घर के लोग मानने लगे थे कि मैं अख़बार में छपने वालों, रेडियो सेट पर सुनाई देनेवालों और टीवी स्क्रीन पर दिखाई देनेवालों के एक ख़ास वर्ग में शामिल होने का विशेषाधिकारी होने ही वाला था।
संयोग से कोर्स की अवधि भी नौ महीने की थी, जो किसी गर्भकाल से कम नहीं थी। यह एक विचित्र अनुभव था, जहां साक्षात्कार हेतु विशेषज्ञों से अप्वाइंटमेंट लेने से लेकर, कैमरे के एंगल, और स्टूडियो के भीतर कैमरे के सामने के बॉडी मूवमेंट से लेकर पीटूसी के तेवरों तक के गुर बताये जाने लगे। अपने कथित क्रांतिकारी विचारों का परित्याग कर बाज़ार के इशारों पर कदमताल करने की घुट्टी भी पिलायी जाने लगी। एक वीभत्स किस्म के भाषिक फ्रेमवर्क को रचनात्मकता की चाशनी में घोलकर फीचर लिखने-बनाने तक की कला इस क्षेत्र में हमारे अग्रज होने के चलते मठाधीश बने बैठे रिपोर्टर, सब-एडिटर, और प्रोड्यूसर लोग हमारी कक्षाओं में विज़िटिंग टीचर की हैसियत से हमें बताने आते।

नाम नहीं लूंगा, लेकिन देश के एक सर्वश्रेष्ठ हिंदी चैनल के प्रबंधन में ऊंचे ओहदे पर आसीन एक महोदय ने हम युवा भावी पत्रकारों को 5W1H के फार्मूले से आगे जाकर 3 C’s का एक मंत्र बताया था। कहा था कि आजकल केवल क्राइम, सिनेमा, और क्रिकेट बिकता है, इसलिए नौकरी पाना है तो इन पर ध्यान दीजिए। बाद में उन्होंने एस फॉर सेक्स का भी एक एंगल इसमें जोड़ा था।

आठ से दस हजार की नौकरी पाने के लिए अपने विचारों और सोच की धार को कुंद करने के प्रयास का शिकार होने और लोकतंत्र के कथित चौथे स्तंभ के अंदर से इतने खोखले होने का साक्षी बनते हुए हममें से कुछ का मन कचोटता और कुछ प्रफुल्लित भी होते। उन्हें प्रोफेशनल होने के सही मार्ग का ज्ञान हो रहा था और विचारधारा के बोझ से दबी हमारी प्रतिभा को पुराने पड़ चुके नैतिक आग्रहों से मुक्त किया जा रहा था। और एक दिन हम में से चंद भाग्यशालियों को एक न्यूज़ चैनल एक लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के बाद उठा ले गया। घर के लोगों ने सत्यनारायण भगवान की कथा करवायी और इधर शुभचिंतकों ने बधाइयों के साथ-साथ हौसला भी बढ़ाया कि अब सिस्टम में जाकर सिस्टम को बदलना। दो महीने के इंटर्नशिप के बाद हमें नौकरी पर रख लिया जाना था।

चैनल के अंदर की दुनिया निराली थी। न्यूज़रूम की गहमागहमी, पीसीआर की चखचख और रिपोर्टरों और कैमरामैनों की भागदौड़ और तपस्या, पद सोपान में ऊपर से नीचे तक आती गालियों का एक के द्वारा दूसरे को पास किया जाना। तकनीक, भाषा और व्यावसायिक रणनीति के आधार पर चलने वाले इस व्यापार में सबके अपने सेल्फ के खो जाने और नौकरी को नौकरी की तरह से लेते हुए बाकी सरोकारों से समझौता करने के दबाव में असल मुद्दों के गुम हो जाने की दुनिया। कोई जेएनयू में पढ़कर दुनिया को समझने की एक दृष्टि लेकर आया था। प्रोड्यूसर है आजकल। एक चैनल से दूसरे चैनल में शिफ़्ट करता रहता है। चेहरे पर एक अज़ीब सी मुहछी मारी हुई है। कहता है, आठ साल इस इंडस्ट्री में रहकर सोचने-समझने की शक्ति इतनी क्षीण हो चुकी है कि अब कुछ और करने लायक बचे ही नहीं। इसलिए पापी पेट की ख़ातिर यहीं बने रहना पड़ेगा।

इसके अलावे बुढ़ाते हुए ज़्यादातर लोग उन्हीं अख़बारों से थे, जो टीवी को गाली देनेवाले कॉलम लिखकर खुद के गंभीर होने का दावा करते हैं। कॉपी लिखने और पैकेज बनाने वाले से लेकर टेली-प्रॉम्प्टर चलाने वालों, एजेंसी से आ रही ख़बरों को कॉपी पेस्ट कर फ़्लैश, टिकर, हेडलाइंस, चलाने वाले, एसाइनमेंट डेस्क में फोन लाइनों पर व्यस्त लोग, दूसरे चैनलों की ख़बरों पर निगाह रखने वाले कुछ दढ़ियल गिद्धनुमा लोग, मिडडे, मिरर, टुडे और दूसरे अखबारों से लेकर जागरण की वेबसाइट तक से कुछ अज़ूबी खबरों और सनसनीखेज़ रिपोर्टों को छान कर निकालने वालों की बेचैनी। कम पैसों के चलते हिंदी अख़बारों से भागे हुए कॉपी लिखने और पैकेज़ बनाने वाले लोग, कुछ एलीट संस्थानों के बिरवों से निकले पौधे, और फिर स्पेशल केबिन में चेकड़ी मार कर बैठे कुछ खुराफ़ाती रणनीति बनाते बरगद के वृक्ष, जिसकी नज़रों में हिंदी का दर्शक दुनिया का सबसे बड़ा मूर्ख, अंधविश्वासी और ज़ाहिल होता है, इंटर्नशिप के नाम पर पिछले कई महीनों से अवैतनिक सेवा देने वाले शोषित युवक-युवतियों की जिजीविषा और आशावाद जो लाइब्रेरी से इंजेस्टिंग रूम तक पीटी उषा से भी तेज गति से दौड़ लगाते और मुफ़्त की कॉफी और मांग कर पी गयी सिगरेट पीकर जिराते, पीसीआर में आ रही फ़ीड में पीटूसी के लिए तैयार होने वाले रिपोर्टर, लाइव जाने के लिए कान में जंतर लगाकर टेस्ट करते अभी हल्के-फुल्के अंदाज में बतियाते एंकर-रिपोर्टर का ब्रेक के तुरंत बाद तमतमाता चेहरा, अंदर से घबराये हुए किसी अपरिपक़्व एंकर के कुछ वाहियात सवाल और रनडाउन पे टिकी धड़कन और टेली-प्रॉम्प्टर पर टिकी नज़रों से संचालित उनकी ज़ुबान, वीडियो एडिटिंग में बैठे लोगों द्वारा फुटेज में भूत, हत्या की चीख़, चीत्कार, और पुलिस की सायरन के साथ रिपोर्टरों के नायकन अंदाज़ और तेवर की मिक्सिंग कर बनाये गये प्रोमोज़, और इस सब को एक तकनीकी कुशलता से लोगों के घर-घर पहुंचाने वाले लोग किस मशीनी स्पीड और सोच से काम करते हैं- उनके अनुभव, ग्लैमर, मिथ्या अहं, और उनकी पीड़ा बाहर बैठे दर्शक शायद ही कभी समझ पाएं।

हमारी स्थिति बड़ी गंभीर थी। थोड़े चिड़चिड़े हो गये थे। और रात को सोते तो भूत, क्राइम और अर्द्धनग्न नायिकाओं की दृश्यावलियों के बाद हैबरमास, ग्राम्स्की, फूक़ो और चोम्स्की की बातें कानों में गूंजती। भूख भी कम हो गयी थी और किताबों में पढ़ी गयी चीज़ें बेमानी लगने लगी थीं। लगा जैसे जीवन महज़ एक नौकरी और खोखले ग्लैमर और झूठे रोब के लिए किसी के हाथों गिरवी रख दी गयी हो। सो हम एक दिन सुबह-सुबह उठे। धूल जम गयी किताबों और मृतप्राय इच्छाशक्ति को फिर से समेटे और सब मायामोह छोड़छाड़ कर तत्काल सेवा में टिकट कटाये और वापस अपनी दुनिया में लौट आये। यह किसी कंफर्ट ज़ोन के प्रति अपना अनुराग या होमसिकनेस नहीं था। हम कुछ अर्थपूर्ण करना चाहते थे। अपनी संवेदनाओं को ज़िंदा रखना चाहते थे। एक वैकल्पिक दुनिया और समाज का सपना टूटने नहीं देना चाहते थे। सो हम आ गये। भाग के आये। वहां रहकर लड़ते तो वैसे भी टिक नहीं पाते लंबे समय तक।

और हां, भाग कर आये, इसलिए भगोड़े हैं। इस तकनीक के साथ चल नहीं पाये और इसके रूल्स ऑफ द गेम्स को समझ और पचा नहीं पाये। इसलिए उनकी नज़रों में नाक़ारा और मीडियॉकर कहलाये।

सोचा प्रिंट तो फिर भी ठीक है। वह लिखता है। लिखतन के आगे बकतन क्या। लेकिन अख़बारों में भी क्लर्की से अधिक का काम नहीं था। वह भी चार से पांच हज़ार रुपयों में महीने भर का जगरना। कुछ दिन सुस्ताये। फिर नौकरी के लिए यहां-वहां चक्कर लगा-लगाकर पछताये। फिर सोचा फ्रीलांसरी करेंगे। समस्या हम्हीं में है कहीं। फिर इससे उबरते हुए... सत्ता के गलियारों को क़रीब से देखने के लिए इसमें पैठे। कुछ अच्छे लोगों का साक्षात्कार, कुछ अच्छी रिपोर्टिंग में योगदान, कुछ मंजे हुए गंभीर संपादकों के साथ काम करने का मौक़ा मिला। बहुत कुछ सीखने-जानने का अवसर भी। लेकिन जठराग्नि की ज्वाला नहीं बुझ पा रही थी। सरोकार, विचारधारा और आजीविका की उलझनों में उलझकर ऐसा लड़खड़ाये कि आत्मविश्वास और सरोकारों के प्रति आस्था फिर डगमगाने लगी।

फिर मुख्यधारा मीडिया की इस चलती ट्रेन से एक दिन कूद गये। आत्महत्या के लिए नहीं। सामने नज़र आ रही मौत से बचने के लिए। क्योंकि हमने पाया कि यह चौथा स्तंभ नहीं बल्कि कोशी के पेट में स्थित बदला और धमारा घाट के बीच की एक जर्ज़र और कमज़ोर हो चुका पुल है, जिसपर गुज़रती हुई हिलती ट्रेन में सवार लोग पिछली दुर्घटना में शिकार लोगों की भूत-आत्माओं और मां कात्यायनी का सुमिरन करते हुए उन्हीं के भरोसे पार करते हैं।

हम फिर भागे। इसलिए भगोड़े हैं। कुछ हिंदीसेवा अब भी कर रहे हैं लेकिन हवाबाज़ी करने से बचते हैं। किताबों और इनसे अर्जित ज्ञान पर पड़ती धूल बहुत हद तक हट चुकी है। कुछ ठोस करने की बेचैनी भी अपनी जगह कायम है। लेकिन आपसे भागे इसलिए हुए तो भगोड़े ही। इसलिए बात फरनांदो पैसोआ की बातों से शुरु की... आख़‍िर, मैं छूट भी तो निकला जनाब...

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