आलोचना है... या स्यापा... या रुदालियां...!
विशाल श्रीवास्तव, फैज़ाबाद से
वाल्मीकि से लेकर अद्यतन हिन्दी कविता में भाषा और शिल्प के स्तर पर तमाम परिवर्तन आये हैं। इन लगातार परिवर्तनों के बाद भी कविता के सम्बन्ध में एक शाश्वत सत्य है, वह यह कि 'कविता' के मौलिक औजार आज भी वही हैं, उन्हें बदलना न सम्भव है और न ही उचित। इस सन्दर्भ में आज जब यह प्रश्न उठता है कि 'नया क्या है?' तो कुछ बातों पर अवश्य ध्यान दिया जाना चाहिए।
विजय कुमार जी ने शिल्प की नव्यता के बारे में बात की है। यह निश्चित है कि कविता ने कई बार अपने शिल्प को तोड़ा है और उसमें बदलाव किये हैं, लेकिन क्या हर बार आवश्यक रूप से कविता से इस बात की उम्मीद की जानी चाहिए कि वह अपने पूर्ववर्ती शिल्प को तोड़े ही। शिल्प को तोड़ने की इस मांग के पीछे भी कुछ निश्चित कारण होने चाहिए। कविता का इतिहास यह बताता है शिल्प का टूटना किसी आवश्यक दबाव या मांग के चलते कभी सम्भव नहीं हुआ है, वह पूरी सहजता के साथ हुआ है और इसके सबसे बड़े उदाहरण निराला हैं। इसके विपरीत यदि आज हर कवि से यह आशा करेंगे कि उसे शिल्प बदलना ही है तो निश्चित रूप से वह उसके लिए योजनाबध्द प्रयास करेगा और यह प्रयास उसकी कविता में अलग से जाहिर होगा। यह सप्रयास शिल्प का परिवर्तनीकरण कहीं न कहीं कविता को पृष्ठभूमि में ले जाएगा और हाल के समय में ऐसे असफल प्रयोगों के उदाहरण भी कम नहीं हैं।
मैं विनम्रता पूर्वक विजय कुमार जी से यह कहना चाहूंगा कि क्या यह विचार बार-बार हमें उसी पुरानी बहस 'टेक्स्ट' और 'फॉर्म ऑफ टेक्स्ट' के करीब नहीं ले जाता है। प्राय: जिन कविताओं को पूर्ववर्ती कविता-परम्परा को तोड़ने वाला माना जाता है वहां मुख्य रूप से फॉर्म का नयापन मिलता है। सोच का विषय है कि क्या सिर्फ फॉर्म का नयापन कविता के बोध को ग्रहण करने में किसी नयेपन की सृष्टि करता है। वस्तुत: नई और पुरानी कविता की जगह कविता-अकविता के भेद की बात को उठाना अधिक सार्थक होगा। वर्णन की शैली और काव्य-भंगिमा का अन्तर अपने-अपने स्तर पर यह कवि के यहाँ अलग-अलग होता है, विचार किया जाना चाहिए कि क्या मात्र काव्य-भंगिमा के आधार पर कवित्व का निर्धारण सम्भव है? यहाँ हम यह सोचने को विवश होते हैं कि शिल्प को लेकर अत्यधिक उत्सुकता और आग्रह कविता के मौलिक आस्वाद को कितना प्रभावित करेगा?
दूसरी बात यह कि, 'कविता के नये प्रतिमान' के लगभग 40 साल बाद आज भी उसकी भूमिका में उठाया गया यह सवाल प्रासंगिक बना हुआ है कि 'नया क्या है?' के साथ-साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि 'कविता क्या है?' । यह उस समय की एक बड़ी बहस थी कि नई कविता के प्रतिमान की बजाय अच्छी कविता के प्रतिमान की बात उठाना अधिक उचित होगा। साही ने कहा था कि समूची नई कविता को ठीक-ठीक देखने के लिए नई कविता के प्रतिमान की ज़रूरत नहीं है, बल्कि कविता के नए प्रतिमान की जरूरत है। इस सन्दर्भ में आज यह देखना अधिक सार्थक होगा कि नयी पीढ़ी के कवियों के पास कथ्य के स्तर पर वैविध्य है, उनके पास अनुभव और प्रेक्षण के स्तर पर अलग-अलग सरोकार और चिन्ताएं हैं और इन कवियों के पास संवेदना और अभिव्यक्ति के स्तर पर अपनी परम्पराओं से जुड़े रहकर कविकर्म को बचाये रखने की क्षमता भी है।
विजय कुमार जी ने आज की युवा पीढ़ी की कविता को लेकर परम्परा और प्रतिबद्धता को लेकर भी प्रश्न उठाया है। परम्परा के बारे में बात करते समय यह जानना ज़रूरी है कि क्या यह मान लेना आसान है कि जिसे हम परम्परा कह रहे हैं, वह मात्र इतिहास का नैरंतर्य है? वस्तुत: सच्चाई यह है कि विचाराधाराओं के आग्रह से परे जाकर हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि हिन्दी साहित्य में मात्र एक परम्परा नहीं है। यह बात एक ब्यापक बहस का हिस्सा है, परन्तु निश्चित रूप से यह मानना उचित होगा कि आज की कविता किसी एक परम्परा से नहीं उपजी है। ऐसे में यह निरीक्षण आवश्यक है कि ऑब्जेक्टिव रूप से हर कवि कौन सी परम्परा से स्वयं को जुड़ता हुआ पाता है। वस्तुत: 80 के दशक के बाद की कविता को लेकर अभी यह निरीक्षण होना बाकी है। इसी तरह यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि प्रतिबद्धताएं अलग-अलग हो सकती हैं और ऐसा होना उचित है। कभी-कभी कवि गैरप्रतिबध्द होने का दावा भी करते हैं, तो किसी विचारधारा के सन्दर्भ में प्रतिबध्द न होना भी एक विशेष किस्म की प्रतिबद्धता ही हो सकती है। आज की युवा पीढ़ी नितान्त अलग-अलग किस्म के अनुभवों से प्रेरित है, और लोक तथा विचार के स्तर पर उसकी कविता में वैविध्यपूर्ण परम्परा-बोध और प्रतिबद्धताएं हैं। आवश्यक है कि आज की कविता में उपस्थित इन छवियों को ठीक तरह से चिह्नित किया जाए।
मैं विजय कुमार जी से यह कहना चाहूंगा कि अगर नब्बे के दशक के बाद की कविताओं में यह चीज़ें नहीं देखी गयी हैं, तो यह कविता की नहीं अपितु एक बड़े स्तर पर आलोचना की समस्या है। ज्याद काम करने की आवश्यकता आलोचना में हैं, कविता तो अपना काम कर ही रही है।
नामवर जी ने कभी लिखा था मूल्यवान है एक भी ऐसे आलोचक का होना, जो किसी भी चीज़ को तब तक 'अच्छा' न कहे जब तक उस निर्णय के लिए वह अपना सब कुछ दाँव पर लगाने को तैयार न हो। आज सबसे बड़ी और नितान्त आवश्यकता समकालीन कविता के सही और तटस्थ मूल्यांकन की है। आलोचना को लेकर एक सार्थक बहस का निर्माण होना चाहिए जिससे समकालीन कविता की नयी पीढ़ी को उसके पूरे समूचेपन में देखा जा सके। यह विडम्बना ही है कि हिन्दी कविता में आलोचना की स्थिति पर एक वरिष्ठ कवि को कहना पड़ता है कि सम्बन्धवाद और सत्ता प्रतिष्ठान की दुरभिसन्धियों ने हिन्दी में आलोचनात्मक विचार की प्रक्रिया और सम्भावना और अवरुध्द कर रखा है। प्राय: यह कहा जाता है कि आठवें दशक के बाद की हिन्दी कविता में एक गतिरोध है। मेरा यह मानना है इसके सापेक्ष एक बड़ा गतिरोध हिन्दी कविता की आलोचना में है। आखिर क्या कारण है कि हमारे पास कविता के नये प्रतिमान जैसी दूसरी किताब नहीं है। यह कह देना आसान है कि आठवें दशक के बाद कविता नहीं लिखी गयी और ज्ञानरंजन के बाद कहानी नहीं लिखी गयी, लेकिन इस बात पर भी गौर होना चाहिए कि छिटपुट समीक्षाओं और निबन्धों के संग्रह के अतिरिक्त कविता की आलोचना में ऐसा कौन सा महत्वपूर्ण कार्य हुआ जो हमारे समय की कविता की गिरह-गांठें खोल सके। सिर्फ कवियों को उनकी अलग-अलग काव्य-शैलियों से पहचानना अगर महत्वपूर्ण होता तो आचार्य शुक्ल का हिन्दी साहित्य का इतिहास महत्वपूर्ण न होता, उससे पहले लिखे गए ग्रन्थ अधिक महत्वपूर्ण होते। आलोचना सिर्फ रचना को शिल्प और कथ्य के स्तर पर खोलने का नाम नहीं है, अच्छी आलोचना रचना के साथ-साथ रचना-समय को पारिभाषित करती है। तो यह जो आलोचना का गतिरोध है, यह अधिक प्रभावित कर रहा है हमारे समय की रचनाशीलता को। आज तो प्राय: हमें कविता की आलोचना के नाम पर 'स्यापे' और 'रुदालियां' ही देखने को मिलती हैं।
यह एक बड़ा प्रश्न है, 'स्वीकृति' नहीं तो 'नकार' ही सही, आज के कवि को कुछ तो दीजिये। आलोचना के नाम पर यह सन्नाटा निश्चित रूप से कविता के लिए भयावह है। यह एक अजीब किस्म का मौन है, अजीब इसलिए क्योंकि यह मौन एक बड़े शोर के बीच उपस्थित है। शायद यही कारण है कि मंगलेश जी लिखते हैं, लगभग 150 साहित्यिक पत्रिकाएँ इस समय मौजूद हैं, जिनका एक बड़ा हिस्सा आलोचना को समर्पित है। तब भी अगर कोई सार्थक बहस नहीं बन पा रही है और तमाम कवियों को शिकायत है कि यह उनकी अनदेखी करती आलोचना है, तो मेरे ख्याल से सभी आलोचकों को किसी जगह मिलकर इसके बारे में सोचना चाहिए।
आज का युवा कवि निश्चित रूप से अस्वीकृति से अधिक अनदेखेपन के खतरों से घबराता है। उसे दरकार है आलोचना की सम्यक दृष्टि की। हम उम्मीद करते हैं कि ऐसी आलोचना-दृष्टि का विकास सम्भव होगा।







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