क्या हम सचमुच लफ्फाजी कर रहे हैं?
अविनाश बाबू, भूखे-नंगों की तस्वीरें छापकर ही एनजीओ विदेश से डॉलर और यूरो जुटाते हैं और आप जैसे लोग प्रगतिशील और जनवादी होने की प्रशस्ति बटोरना चाहते हैं। बंधुवर, ऐसी लफ्फाजी करने वाले मैंने घनेरों देखे हैं। वर्ग-युद्ध की बातें करनेवालों ने अगर सचमुच अपनी जयगुरुदेव टाइप किसान मानसिकता से निकल कर इस मुल्क की सच्चाई को समझने की कोशिश की होती, तो यहां की सूरत बदल गयी होती। फिर, बात जब व्यक्तिगत स्वतंत्रता की हो रही हो, तो उसमें जबरदस्ती कोई प्रतिबद्धता घुसेड़ने का क्या तुक है। वैसे भी व्यक्ति की आजादी और उसकी संपूर्ण संभावनाओं का विकास ही आज का मूल नारा बन चुका है।
अनिल जी, हम शायद पहली बार बात कर रहे हैं। यह सच है कि व्यक्ति की आज़ादी और उसकी संपूर्ण संभावनाओं का विकास आज का मूल नारा बन चुका है। हालांकि ये नारा समाजवाद के सपने के साथ लड़ी जाने वाली हर लड़ाई के साथ शुरू से उच्चरित होता रहा है। क्या आपको नहीं लगता कि यही नारा स्वामी रामदेव से लेकर श्री श्री रविशंकर और मोरारी बापू जैसे लोग भी भज रहे हैं? और क्या आप ये भी नहीं महसूसते कि सिर्फ इसी नारे के आधार पर भावनाओं, भंगिमाओं (योग) का शिविर लगाने वाले ये गुरु भरपेट दाल-भात खाने वाले लोगों के ज़रिये हमारे-आपके मुल्क के नियंता होते जा रहे हैं? क्या सिर्फ ये नारा लगा भर देने की वजह से हम उनका चरण स्पर्श करें? जबकि हम अच्छी तरह जानते हैं कि इनका और मानवाधिकार से जुड़ी लड़ाइयों के संदर्भ में इस नारे का निहितार्थ क्या है। बहरहाल, मेरा दुख ये है कि मैं सिदो हेम्ब्रम की कहानी आपको नहीं समझा सका। या शायद आप सिर्फ इसलिए नहीं समझ सके कि वो आपको कहानी भर लगी। वो मेरे हिस्से का सच था, जिसको बहुत संकोच के साथ मैंने सुनाया। उसके आखिरी दिनों का मेरा कहा वृत्तांत अगर आपको मेरी प्रतिबद्धता पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित कर रहा है, तो ज़ाहिर है आप मानते हैं कि मैंने जो कहा- वह झूठ कहा। अनिल जी, सच कह रहा हूं- सिदो हेम्ब्रम की कहानी झूठी नहीं है। ठीक है, वो मर गया। उसके साथ उसकी सारी प्रामाणिकता भी चली गयी। लेकिन सिदो जैसे लोग हमारे वक्त में अभी भी हैं। उस तरह से नहीं, जिस तरह से प्रमोद सिंह ने उसका वृत्तांत रखा है। आज से पचास साल पहले की वो तस्वीर, जिसके बारे में आपका बयान है कि ऐसी तस्वीरें छापकर ही एनजीओ विदेश से डॉलर और यूरो जुटाते हैं और आप जैसे लोग प्रगतिशील और जनवादी होने की प्रशस्ति बटोरना चाहते हैं, आज भी हमारे-आपके मुल्क के गांवों में रेंग रही हैं। आप अगस्त, 2003 से 2004, मार्च तक की प्रभात ख़बर, देवघर संस्करण की फाइल उठाएं- आपको पहले पन्ने पर टॉप स्टोरी के रूप में दर्जनों गांवों की रिपोर्ट ऐसी ही मार्मिक और रोंगटे खड़ी कर देने वाली तस्वीरों के साथ छपी हुई मिल जाएगी। और आपको बताऊं अनिल जी, प्रबंधन ने मुझे दर्जनों बार कहा होगा कि सुबह-सुबह ऐसी तस्वीरें देख कर लोग अख़बार देखने से बचना चाहेंगे। यानी लोगों का मन रखने के लिए, एक खास किस्म की सामाजिकता बनाये रखने के लिए, किसी का दिल न टूटे- इसका पूरा-पूरा खयाल रखने के लिए मुल्क की सही-सही तस्वीर न दिखाएं। यही मैं ब्लॉग की दुनिया में भी देख रहा हूं। सबको अपनी निजता को सुरक्षित रखने या उससे छेड़छाड़ करने का पूरा हक़ है। लेकिन ये हक़ जब सुबह-सुबह अच्छी तस्वीरें दिखाने के प्रबंधकीय फरमान की तरह पेश किया जाएगा- तो मैं इस बात की परवाह किये बिना चीखने का हक़ हासिल करूंगा कि कोई मेरे चीखने को नाटक कहता है या क्या कहता है।
एक और बात, जो मेरे मन में बार-बार आती है। हम ये बड़ी आसानी से कह देते हैं कि वर्ग-युद्ध की बातें करनेवालों ने अगर सचमुच अपनी जयगुरुदेव टाइप किसान मानसिकता से निकल कर इस मुल्क की सच्चाई को समझने की कोशिश की होती, तो यहां की सूरत बदल गयी होती। छोड़िए जयगुरुदेव टाइप किसान मानसिकता से वर्ग युद्ध की बातें करने वालों के निकलने की बात, क्या हम इससे निकल पाये हैं? हम जो, कॉरपोरेट मीडिया के हिस्से हैं। जो लोग अभी लड़ रहे हैं, हम, आप, प्रमोद, अभय, अनाम उन पर भले हंस लें- लेकिन सच ये है कि समाज को बदलने की आस्था के साथ वे लड़ रहे हैं। हम मानें कि हममें इतनी हिम्मत नहीं थी कि हम समाज बदलने की लड़ाई लड़ सकें। अगर ये हिम्मत होती, तो जो लड़ाई हमें अधूरी लग रही थी, उसे छोड़ कर लड़ाई का ही कोई दूसरा रास्ता खोजते। न कि अपने दाल-भात के जुगाड़ में लड़ाई से भाग खड़े होते। और जब जुगाड़ हो गया है, तो आप जो कह रहे हैं, वो कहना भी कोरी लफ्फाजी नहीं है अनिल जी?
तस्वीर साभार : सूडान में अकाल की बहुचर्चित तस्वीर








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