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कहां हैं मकबूल फिदा हुसैन ?

अपूर्वानंद

मकबूल फिदा हुसैन में बहुत लोगों की रुचि हैं। जिनकी नहीं है, वे भी जानना चाहते हैं कि फिदा इन दिनों किस खुराफात में लगे हुए हैं। और जो सृजन को सामाजिक मान्‍यताओं की सभी चौहद्दियां लांघकर अभिव्‍यक्ति की आज़ादी के सर्वोच्‍च शिखर की तरह मानते हैं, उनके लिए फिदा साहसी भी हैं और समर्थ शिल्‍पी भी। इसलिए, सबके लिए ये जानना ज़रूरी है कि मकबूल फिदा हुसैन इन दिनों कहां हैं? दरअसल मकबूल फिदा हुसैन से हमारे मुल्‍क की सरकार नाराज़ है। वो सरकार, जिनको लोकतांत्रिक मानी जाने वाली कुछ पार्टियों का समर्थन सांप्रदायिकता विरोध के नाम पर मिला हुआ है। शायद यही वजह है कि वे पराये मुल्‍क में मन मसोस कर रह रहे हैं, और यहां नहीं लौट पा रहे। दिल्‍ली युनिवर्सिटी में प्राध्‍यापक और सांप्रदायिकता विरोधी अधिकतर मुहिमों में शामिल रहने वाले अपूर्वानंद ने ये सूचना जनसत्ता के जरिये दी है।


हिंदी संवाद जगत के लिए यह प्रश्‍न अभी पूछे जाने योग्‍य नहीं बना है। बाकी लोग जानते हैं कि वे दुबई में हैं और चित्र बनाने के अपने पुराने काम में लगे हुए हैं। क्‍या हुसैन हिंदुस्‍तान आने से इसलिए तो नहीं बच रहे कि यहां आते ही उनकी गिरफ्तारी का ख़तरा है? क्‍या वे अघोषित निर्वासन में हैं? हुसैन ने खुद इस पूरे प्रसंग को हल्‍का करने की कोशिश करते हुए एक अंग्रेज़ी दैनिक के संपादक को कुछ समय पहले कहा था‍ कि वे अपनी मर्जी से भारत आ सकते हैं। लेकिन शायद वे वाकिफ हैं कि मई 2006 के बाद वे इसे लेकर निश्‍िचंत नहीं हो सकते कि भारत में वे सुरक्षित रह पाएंगे।

पिछले साल पांच मई को संयुक्‍त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के गृह मंत्रालय ने कानून मंत्रालय से सलाह करने के बाद मुंबई और दिल्‍ली पुलिस को इस आशय का निर्देश जारी किया कि कलाकार एमएफ हुसैन के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाए, क्‍योंकि उनकी कलाकृतियां धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाती हैं। अधिकारियों का एक समूह हुसैन की कलाकृतियों की समीक्षा करने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा कि उनमें भड़काऊ तत्‍व हैं और वे घृणा पैदा कर सकती हैं। इसलिए पर्याप्‍त आधार है कि हुसैन पर इन अपराधों के लिए प्रासंगिक धाराओं के अंतर्गत कार्रवाई की जाए।

फरवरी 2006 में इंदौर की एक अदालत ने हुसैन के विरुद्ध एक मामला दर्ज करते हुए उन्‍हें अदालत में हाजिर होने का सम्‍मन जारी किया। आरोप था कि वे अपनी कलाकृतियों के जरिये भारत की एकता को तोड़ने और अश्‍लीलता बढ़ाने जैसे अपराध कर रहे हैं। मेरठ की एक अदालत ने भी हुसैन के खिलाफ मामले की सुनवाई शुरू की। महाराष्‍ट्र, इंदौर, राजकोट, मेरठ के अलावा दिल्‍ली और बिहार आदि में हुसैन के खिलाफ बीसियों मामले दर्ज हैं।

पिछले साल संसद में जब एनसीआरटी द्वारा प्रकाशित हिंदी की नयी स्‍कूली किताबों पर भारतीय जनता पार्टी की पहल पर लगभग सारे राजनीतिक दलों ने हमला किया, तो प्रेमचंद, पांडे बेचन शर्मा उग्र, धूमिल, मोहन राकेश, ओमप्रकाश वाल्‍मीकि के साथ हुसैन की आत्‍मकथा के अंश को सांसदों ने खास तौर पर अश्‍लील ठहराते हुए उसे किताब से हटाने की मांग की।

भारत की धर्मनिरपेक्ष गठबंधन की सरकार ने जब दिल्‍ली और मुंबई पुलिस को साक्ष्‍यों की पर्याप्‍तता के आधार पर हुसैन के विरुद्ध मुनासि‍ब कार्रवाई करने को हरी झंडी दिखायी, उसके ठीक बाद लंदन में उनकी कलाकृतियों की एक बड़ी प्रदर्शनी में कुछ लोग ज़बर्दस्‍ती घुस आये और हुसैन की कलाकृतियों को नष्‍ट करने की कोशिश की। एशिया हाउस गैलरी ने प्रदर्शनी बंद कर दी। उसने अपनी वेबसाइट से हुसैन प्रदर्शनी से संबंधित प्रत्‍येक उल्‍लेख को हटा दिया। लॉर्ड मेघनाद देसाई जैसे बुद्धिजीवियों ने इस हमले और एशिया हाउस के इस फैसले की भर्त्‍सना की और इसे अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता पर गहरे आघात की संज्ञा दी। इस घटना पर लंदन के भारतीय दूतावास के पास टिप्‍पणी करने को कुछ नहीं था।

सबसे आश्‍चर्यजनक थी केंद्र सरकार की सक्रिय पहलकदमी। कानून व्‍यवस्‍था पर ख़तरे की आशंका जताते हुए कानून मंत्रालय ने हुसैन की छह कलाकृतियों की जांच की और कहा जाता है, इस नतीजे पर पहुंची कि हुसैन के खिलाफ कार्रवाई का पुख्‍ता आधार है। यह वही केंद्र सरकार है, जो मध्‍यप्रदेश, राजस्‍थान, कर्नाटक, गुजरात में मुसलमानों और ईसाइयों पर लगातार हमलों, हत्‍याओं पर अपनी निष्क्रियता के पक्ष में यह दलील देती है कि कि कानून व्‍यवस्‍था बनाये रखना राज्‍यों का मामला है और वह संवैधानिक लाचारी में है। हुसैन पर फिर यह केंद्रीय सक्रियता क्‍यों? राजीव धवन जैसे विधिवेत्ता कहते हैं कि ऐसा बिना किसी नीतिगत निर्णय के किया नहीं गया होगा।

क्‍या हुसैन विरोधी अभियान की अनदेखी करना उसका समुचित उत्तर है? भारतीय कला और संस्‍कृति जगत तो ऐसा ही मानता प्रतीत होता है। हुसैन क्‍यों संप्रदायवादियों के लिए एक ज़रूरी निशाना हैं? इसका एक उत्तर तो यह है कि हुसैन संभवत: रवि वर्मा के बाद पहले ऐसे चित्रकार हैं, जो जिनके द्वारा निर्मित छवियां किसी न किसी प्रकार प्रतीकात्‍मक दर्जा हासिल कर चुकी हैं। हुसैन भारत की स्‍मृतियों को ऐंद्रिक, मांसल रेखाओं के जरिये जीवंत करने के अभियान में जुटे प्रतीत होते हैं। वे दोहरे दूषण में संलिप्‍त हैं। मुसलमान होते हुए भी वे रूपाकारों के सर्जन-व्‍यापार में संलग्‍न हैं। और मुसलमान होने के बावजूद वे हिंदू मिथकीय स्‍मृतियों को आधुनिक रूपाकार में ढालने की कोशिश कर रहे हैं। हुसैन इस लिहाज से भी एक महत्‍वपूर्ण निशाना बनते कि वे बिंबों, छवियों के संसार में काम करते हैं और पिछले दो दशक से संप्रदायवादी राजनीति बिंबों और छवियों के आधार पर ही एक नयी लोकप्रिय और आक्रामक सामूहिक स्‍मृति के निर्माण के कार्य में लगे हुए हैं।

राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ और उसके सैकड़ों छोटे-बड़े संगठन ऐसी हिंदू देवमाला का निर्माण करना चाहते हैं, जो उनके हिंदू राष्‍ट्र के प्रथम नायक-नायिकाओं की भूमिका का निर्वाह करते हुए दिखाई पड़े। अत्‍यंत हृष्‍ट-पुष्‍ट शरीर वाले शस्‍त्रधारी देवता, युद्ध का आह्वान करते हुए या आक्रमण का नेतृत्‍व करते हुए देवताओं की छवियों के समांतर उनको चुनौती देने वाली देवमाला मात्र एमएफ हुसैन ने निर्मित की। उनकी मोटी रेखाओं में यथार्थ भ्रम से मुक्‍त सीता, सरस्‍वती, हनुमान, राम, दुर्गा आदि के बिंबों में एक स्‍वप्निल काव्‍यात्‍मकता है, जो उन्‍हें किसी हिंदू राष्‍ट्र की आक्रमणकारी सेना का नेतृत्‍व करने के लिए अयोग्‍य भी बना देती है। इसलिए भी इस वैकल्पिक देवमाला का विनाश आवश्‍यक है। यह बात दीगर है कि हुसैन लगातार कहते हैं, भारत की मंदिर कला परंपरा स्‍वयं धार्मिक स्‍थलों को अत्‍यंत ऐंद्रिक देह व्‍यापार के वलय में घेरती है। इस प्रकार देखें तो धर्म यहां दैहिक आवरण को छोड़ कर नहीं, उसके साथ, उसके भीतर चलने वाला व्‍यापार है। फिर यहां किसी प्रकार के शुद्धतावाद की जगह कहां है?

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