क्या टीवी संपादक मदारी हो गये हैं ?
उमाशंकर सिंह
मीडिया पर जब भी बहस होती है- बाज़ार और विवेक दो पक्ष होते हैं। उमाशंकर सिंह ने आईबीएन 7 पर एक कार्यक्रम में हुई बहस पर अपनी राय रखी है। जैसा कि उनकी राय से ज़ाहिर होता है, वे विवेक के साथ हैं और मंशा ये कि नैतिकताएं किसी भी कीमत पर बची रहनी चाहिए। लेकिन जब ये कीमत कुछ सौ या हज़ार करोड़ को नुक़सान पहुंचाने लगे, तब भी क्या उमाशंकर का यही पक्ष रहेगा, यह इस विश्लेषण में साफ नहीं है। आज मीडिया एक इंडस्ट्री है, उसे बाज़ार के नियम-कायदे के हिसाब से अपने को तय करना पड़ता है। इसमें विचार के लिए जगह बनाने की लड़ाई बड़ी है। बात ये होनी चाहिए कि ये जगह कैसे बनेगी। हम मोहल्ला के व्यूअर्स से इस मुद्दे पर उनकी राय चाहते हैं। रवीश ने इसी मुद्दे पर अपने ब्लॉग पर लेख लिखा है, मोहल्ले में पढ़ते हैं उमाशंकर की बात।
एक मदारी निकलता है। जहां आठ-दस लोगों के जुड़ने की उम्मीद होती है, वहीं मदारी अपना बंदर नचाने लगता है। न्यूज़ चैनल का एक संपादक बोलता है- जिसमें लोगों की दिलचस्पी है, उसे क्यों न दिखाएं। नचाने और ख़बर दिखाने के मौजूदा खेल में आपको ज्यादा फर्क नज़र नहीं आएगा। अरे संपादक जी, लोगों की दिलचस्पी तो ब्लू फिल्म देखने में भी होती है। लगा कर छोड़ दीजिए न अपने चैनल पर। एक दिन शायद आप ऐसा कर भी देंगे और फिर ऐसे ही सीना तान कर कहते नज़र आएंगे कि भई जो लोग देखना चाहते हैं दिखाने में हर्ज़ क्या है।संदर्भ एक न्यूज़ चैनल पर बहस का। कई वरिष्ठ पत्रकार बैठे हैं। कुछ टीवी के लोग हैं, तो कुछ अख़बार के। मुद्दा है क्या दिखाया जाना चाहिए, क्या नहीं। टीवी संपादक कहते हैं कि अमिताभ के घर के बाहर एक लड़की कलाई काटती है, तो लोग जानना चाहते हैं। बहुत ख़ूब। आपको लड़की की कटी कलाई दिख रही है, लेकिन नशे की खुमारी नहीं। फील्ड में खड़ा आपका रिपोर्टर हो सकता है कि ख़बर के सही आयाम को नहीं पकड़ पाया हो, लेकिन आप तो वरिष्ठ हैं! आपको पकड़ना चाहिए था! ठीक है, तुरंत मौक़े पर तथ्य नहीं तलाशे जा सकते थे, जिनके आधार पर फौरी तौर पर ये तय किया जा सके कि लड़की सही कह रही है या सफेद झूठ। लेकिन कॉमन सेंस तो लगाते। जिन सवालों को खड़ा कर बाद में उस लड़की की मंशा को एक्सपोज़ करने की बात की गयी, उन सवालों पर पहले ही चिंतन कर लेते। ठीक शादी के दिन, नशे की हालत में, एक लड़की, एक नामी अभिनेता के नामी बेटे के साथ अपना नाम जोड़ रही है... बयानों के अलावा कुछ नहीं है उसके पास साबित करने को और बयानों में भी इतना विरोधाभास है कि साफ लग रहा है, उसके पास खोने को कुछ नहीं पाने को सारा जहां है। जिन संपादकों ने उस ख़बर को तानने का फ़ैसला किया लगता है, उनके पास भी खोने को कोई क्रेडिबिलिटी नहीं, पाने को टीआरपी है। शादी के अंदर का मसाला नहीं मिला, तो बाहर ही सही। कहीं ये शादी में कैमरा नहीं घुसने देने का बदला तो नहीं था, जो चैनलों ने अपने ढंग से अमिताभ के परिवार से चुकाना चाहा!
अरे अपनी कैपिसिटी में आप भी फेमस होंगे। चार लोग आपको भी चाहते होंगे। दो दीवाने या दीवानी आपकी भी होगी, कोई किसी दिन मौक़ा पा कर तन जाए तो आपकी क्या हालत होगी। किस तर्क के साथ सामने आएंगे। ऐसी हालत में आप भी चुप रहेंगे, जैसे कि अमिताभ का परिवार चुप रहा। क़ाबिलियत भी इसी में थी। हैरत होती है कि सभी इसे लड़की की पब्लिसिटी स्टंट कहते रहे, फिर भी पब्लिसिटी देते रहे। पब्लिसिटी स्टंट की मारी सिर्फ वो लड़की नहीं, कई टीवी संपादक भी नज़र आते हैं। लड़की अभिषेक की नहीं, चैनलों की इज्ज़त उतार गयी और आप इसी तर्क में भटकते रहे कि लोग जो देखना चाहते हैं, क्यों न दिखाएं।
चर्चा रिचर्ड गेरे की शिल्पा को प्यार की झप्पी की भी हुई। टीवी संपादक कहते हैं कि मंच पर शिल्पा का हावभाव बता रहा था कि उसे गेरे की ये हरकत अच्छी नहीं लगी, इसलिए ख़बर उठाना ज़रूरी था। गज़ब की नज़र है आपकी संपादक जी। यही हावभाव बॉडी लैंगुएज़ आप कलाई काटने वाली लड़की की क्यों नहीं पहचान पाये। शायद इसलिए कि उसकी खुमारी को पहचान कर आप एक मसाला नहीं गंवाना चाहते थे और शिल्पा की कही बात का भाव समझना-समझाना आपको मसाले के मुफीद लगा। संपादकत्व का ये दोहरापन नहीं चलेगा।
और तो और, मंच पर मौजूद एक दक्षिणपंथी नेता की तरफ मुख़ातिब हो टीवी संपादक ने कहा- ये एक ऐसा मामला था जैसे मामलों को आपके कार्यकर्ता भी भारतीय संस्कृति पर हमला मानते हैं। तोड़फोड़ मचा देते हैं। कहने का मतलब कि इस बार शिवसैनिकों की ज़िम्मेदारी संपादकों ने उठा ली। लगे मोरल पुलिसिंग करने। जब शिल्पा ने कहा कि शिकायत नहीं है, तब जा कर चुप हुए। ख़बर को लेकर ये अपने तरह की दक्षिणपंथी सोच है।
टीवी संपादक कहते हैं कि अमिताभ के बेटे की शादी के बारे में लोग जानना चाहते हैं। लोग अमिताभ जैसा बनना चाहते हैं, इसलिए वो देखते हैं। दिखाने में हर्ज़ क्या है। अख़बार के संपादक कहते हैं कि भई अगर अमिताभ नहीं चाहते तो ताकझांक करने की ज़रूरत क्या है। लेडीज़ संगीत के दौरान बजे गाने और बरातियों के खाने पर अंदाज़ा लगा लगा कर आप क्या बता रहे थे। तो टीवी संपादक का जवाब देखिए, अंदाज़ा तो कैबिनेट और कार्यकारिणी की बैठकों के दौरान भी लगाये जाते हैं, ख़बर उनसे भी बनाये जाते हैं।
अरे भई, अभिषेक-ऐश की शादी और सरकार या राजनीतिक पार्टियों की बैठक में तुलना कर आप क्यों अपनी भद पिटवा रहे हैं। इस शादी का आम लोगों की ज़िन्दगी पर कोई असर नहीं पड़ने वाला... सिवाय इसके कि वो भी इसी तरह से शादी करने या कम से कम ऐसी शादी में शिरकत करने का सपना देखें। लेकिन सरकार या दल की बैठकों में लिये जाने वाले फ़ैसले आम लोगों पर सीधा असर डाल सकते हैं। उसके बारे में सचेत रखना, जागरूक करना, पब्लिक ओपिनियन बनाना मीडिया का फर्ज़ है। इसलिए कई बार बात सूत्रों के हवाले से भी होती है। आपने अगर शादी की सूचनाएं समारोह के सूत्रों के हवाले से दी हों, तो ये आपके संपादकत्व की पराकाष्ठा है।
आम लोगों को ग्लैमर खींचता है। पर वो आपको क्यों खींचता है। आपको तो इन सब से ऊपर उठ कर सोचना चाहिए। ज़्यादातर मौक़ों पर ऐसा तब होता है, जब इंसान ऐसे माहौल में पला-बढ़ा हो, जहां भयंकर वैचारिक दीनता छायी हो। समय के साथ उसका कद और पद तो बढ़ गया हो लेकिन सोच वहीं रह गयी हो। कइयों का पद भी सिर्फ और सिर्फ इसलिए बढ़ा है, क्योंकि टीवी में वे ऐसे वक्त आये, जब जानकार ज़्यादा नहीं थे। लेकिन हमेशा ऐसा नहीं रहने वाला।
वो दिन आएगा, जब मदारी बंदर ही नचाएगा और संपादक ख़बर ही दिखाएगा।








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