हिटलर से बड़ा तानाशाह राहुल गांधी
मदन कश्यप
मदन कश्यप कवि हैं। बिहार में सांस्कृतिक आंदोलनों में इनकी सक्रिय भूमिका रही है। इन दिनों दिल्ली में हैं और अख़बारों-पत्रिकाओं में लगातार सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणियां कर रहे हैं। मोहल्ले के लिए इन्होंने राहुल गांधी के उस वक्तव्य के निहितार्थ निकाले हैं, जिसमें उसने कहा है कि अगर उनके परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्री होता, तो बाबरी मस्जिद कभी नहीं गिरती। मदन कश्यप ने अपनी उन दिनों की लिखी एक कविता भी मोहल्ले को दी, जब राजीव गांधी ने पूरे देश में राम-जानकी रथयात्रा निकलवायी थी।
राहुल गांधी ने बाबरी मस्जिद को लेकर जो बयान दिया है, वह सामान्यतया बचकाना और ग़ैरज़रूरी लगता है, लेकिन उसका निहितार्थ बड़ा भयानक है। विरोधी पार्टियां तो सिर्फ उसका राजनीतिक लाभ उठाना चाहती है, जबकि ज़रूरत गंभीरतापूर्वक उस संकट पर विचार करने की है, जो उस बयान ने भारतीय लोकतंत्र के सामने उपस्थित कर दिया है।
उनका बयान बचकाना तो है ही, उनके उस पिछले वक्तव्य से ज़्यादा बचकाना, जिसमें उन्होंने शीतल पेयों में अधिक कीटनाशक मिलाने वाली कंपनियों का बचाव करते हुए उसके लिए अपने देश के पानी को दोषी बताया था। उससे ज़ाहिर हो गया था कि यह भावी प्रधानमंत्री उस देश के मिट्टी-पानी के प्रति कैसी धारणा रखता है। अब उन्होंने अपनी उस पार्टी के प्रति अपनी धारणा का इज़हार कर दिया है, जो उन्हें बार-बार भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश करती आ रही है। ज़ाहिर है, पिछले संसदीय चुनाव में कांग्रेस की उपलब्धि तथा उसमें अपने परिवार की भूमिका का उनका मूल्यांकन ज़मीनी वास्तविकताओं पर आधारित नहीं है। उस चुनाव में कांग्रेस की जीत नहीं, भाजपा की हार हुई थी। वह भी उस अर्थनीति के कारण, जो उसे कांग्रेस से ही विरासत में मिली थी। कांग्रेस को इस देश की जनता ने केवल उन राज्यों में ही चुना, जहां कोई तीसरा विकल्प मौजूद नहीं था। आज भी इस पार्टी के जितने सांसद हैं, उससे अधिक सांसदों के साथ यह विपक्ष में बैठ चुकी है। फिर इस जीत पर लगातार अपनी पीठ ठोकते रहना कहां तक उचित है? वह भी तब, जब बढ़ती महंगाई के कारण कांग्रेस का अगला संसदीय चुनाव हारना लगभग तय है और उत्तर प्रदेश में तो उन्हें फिसड्डी ही बने रहना है। बहुत संभव है, वे अगले संसदीय चुनाव के वक्त भी कहें कि हमारे परिवार का कोई प्रधानमंत्री होता, तो महंगाई इतनी नहीं बढ़ती। कांग्रेसी इसे भले ही सिर झुका कर स्वीकार कर लेंगे, मगर क्या जनता भी इसे मान लेगी?दुखद यह है कि उन्हें इतिहास की उन ठोस सच्चाइयों का भी ज्ञान नहीं है, जो अभी भी जनता की स्मृति में बनी हुई है। पं. नेहरु की धर्मनिरपेक्षता को लेकर कभी कोई सवाल नहीं उठा, लेकिन यह भी सच है कि बाबरी मस्जिद में रातोरात रामलला की मूर्ति उनके ही शुरुआती शासनकाल में रखी गयी थी। उन्होंने न तो मस्जिद से मूर्ति हटवायी, न ही रखने वाले पर कोई कार्रवाई की। बस अदालती ताला लगवा दिया और मुसलमानों का नमाज़ पढ़ना बंद करवा दिया। उसके बाद यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया था और हिंदू-मुसलमान- दोनों ही इसे भूल चुके थे कि राहुल गांधी के पिता के प्रधानमंत्री रहने के दौरान ही उत्तर प्रदेश के एक मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने एक मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश के आधार पर मस्जिद का ताला खुलवा दिया। सवाल यह है कि ऐसे संवेदनशील मामले में किसी अदालत ने विसंगत फ़ैसला किया भी, तो सरकार ऊपरी अदालत में क्यों नहीं गयी?
बात यहीं तक रहती तो इस पूरे प्रकरण को राज्य सरकार के मत्थे मढ़ा जा सकता था, लेकिन उसके बाद उनके पिता के ही निर्देश पर पूरे देश में रामजानकी रथयात्रा निकाली गयी। पार्टी में और तरह के भी लोग थे, इसलिए थानों के माध्यम से प्रखंड स्तरीय युवा कांग्रेस के नेताओं को रथयात्रा के स्वागत में जुलूस, सभा आदि आयोजित करने का निर्देश दिया गया। दरअसल राजीव गांधी, एक उन्माद पर ही आरूढ़ होकर सत्ता में आये थे (वह उन्माद उनकी माता इंदिरा गांधी की हत्या से पैदा हुआ था...) और एक दूसरा उन्माद पैदा करके दुबारा चुनाव जीतना चाहते थे, लेकिन उन्हें उनके ही रक्षामंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भ्रष्टाचार के मामले को उठा कर उन्माद की हवा निकाल दी। इस सच्चाई की रोशनी में राहुल के बयान को रख कर देखने पर यह निर्णय लेना थोड़ा कठिन लगता है कि वे सचमुच अज्ञानी हैं अथवा इस देश की जनता को मूर्ख समझते हैं।लेकिन राहुल का उपक्रम लोगों को मूर्ख बनाने तक ही सीमित नहीं है। यह संसद और लोकतंत्र की गरिमा पर प्रहार है। तानाशाही से भी आगे बढ़ कर पारिवारिक राज्य चलाने की दुराकांक्षा है। यह हिटलर से भी घृणित नस्ली सोच है, क्योंकि हिटलर पूरी दुनिया में अपनी आर्य जर्मन नस्ल को श्रेष्ठ मानता था, जबकि राहुल केवल अपने परिवार को श्रेष्ठ मानते हैं और ऐसा समझते हैं कि केवल उनके परिवार के लोग ही सही ढंग से देश चला सकते हैं। वे तो अपनी पार्टी को भी किसी लायक नहीं मानते। सत्ता का यह अहंकार राजतंत्र के कुछ अज्ञानी राजाओं में होता था, लोकतंत्र में इसके लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। गौरतलब है कि ज्ञान का अहंकार भी निंदनीय होता है, लेकिन अज्ञान के अहंकार को तो एक पल के लिए भी सहन नहीं किया जा सकता।
राम-जानकी रथयात्रा
यह कविता 1986 में तब लिखी गयी थी, जब बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाने के बाद राजीव गांधी की प्रेरणा से पूरे देश में रामजानकी रथयात्रा निकाली गयी थी। तब जनसंस्कृति मंच की नाट्य इकाई दिशा ने इस कविता को अपनी प्रस्तुतियों से उत्तरप्रदेश में लोकप्रिय बना दिया था।देखा क्या प्रभु की माया है
आज तुम्हारे दरवाजे पर
राम-जानकी-रथ आया है
आओ-आओ
आओ-आओ
करबद्ध हो
पंक्तिबद्ध हो
एक किनारे खड़े हो जाओ
बनियो आओ, सेठों आओ
ठाकुर, बाभन, जाटों आओ
सब सनातनी मिलजुल आओ
हिंदू एकात्मता मनाओ
सबसे न्यारा
धर्म हमारा
यहां सैकड़ों हैं भगवान
जिसको चाहो शीश नवाओ
छुआछूत और जात-पांत
ये तो हरि के आशीर्वाद
एकमात्र पवित्रता ही तो हिंदू धर्म की है बुनियाद
जटा-जूट और त्रिफटा चंदन
दिखे जहां भी कर लो बंदन
धरम-करम में नेह लगाओ
आओ-आओ
आओ-आओ
ओझा, पांडे, शर्मा आओ
सिन्हा, त्यागी, वर्मा आओ
देखो हिंदू धर्म के आगे
आयी है कैसी मजबूरी
हरिजन अब बेगार न करते
मांग रहे पूरी मजदूरी
पाली, पुनपुन या सहार हो
अलवर, विक्रम या हिलसा हो
हरिजन की पूरी आबादी
आज हो गयी 'नक्सलवादी'
कब तक रहियो आंखें मीचे
फेंक दो उनकी रथ के नीचे
पाप नहीं हरिजन को सताना
पाप नहीं बहुओं को जलाना
नारी देह नरक की खान
उस पर कुपित सदा भगवान
औरत, हरिजन, म्लेच्छों पर तुम
जितना चाहो ढाओ जुलुम
आओ-आओ
आगे-आओ
घूस कमाओ
सूद कमाओ
ठगी करो या
लूटो, लाओ,
केवल प्रभु का हिस्सा दे दो
पाप तुम्हारे धुल जाएंगे
बाबाओं के खुश होते ही
फूल भाग्य के खिल जाएंगे
बाद पांच सौ वर्षों के अब
मुक्त हुए हैं राम तुम्हारे
(धरम-करम कैसे चलता था,
कैदी थे भगवान तुम्हारे!)
बहुत दिनों तक झुकी थी गर्दन
खुद तान सीना चिल्लाओ
आगे आओ
आगे आओ
तुम्हें मुक्ति क्या और चाहिए
राम तुम्हारे मुक्त हो गये
हरिजन-गांवों को फुंकवा कर
दंगे की ज्वाला फैला कर
बस्ती-बस्ती में रथ आकर
बंधु तुम्हारे पाप धो गये
मुक्त 'भूमि' को किया जिन्होंने
उन पर महंगाई का लांछन
अरे पापियो
तुम्हें कभी क्या माफ करेंगे
राजीव लोचन
रोटी-दाल का चक्कर छोड़ो
रामचरण में नेह लगाओ
अगले जनम मिलेगी रोटी
अब के जनम तो पुण्य कमाओ
धर्म-रक्षा में आगे आओ
लोरिक सेना
भूमि सेना
ब्रह्मर्षि या
कुंवर सेना
आपस में अब सब मिल जाओ
शिव सेना का पथ अपनाओ
हिंदू सेना एक बनाओ!
आगे पीछे क्या करना है
तुम्हें किसी से क्यों डरना है
पुलिस-प्रशासक यार तुम्हारे
सत्ता पर अधिकार तुम्हारा
केवल गांठ में बांधे रहना
वह 'चौरासी वाला नारा'
फिर तो सब कुछ चांदी है
जय-जय महात्मा गांधी है
र से राम
र से राजीव
स से सीता
स से सोनिया
राजीव की बड़ी कृपा है
राम-जानकी रथ निकला है
राम चरण में शीश नवाओ
राजीव-हाथ पे मुहर लगाओ
फिर तो सब कुछ चांदी है
जय-जय राजीव गांधी है
आओ-आओ
आओ-आओ
देखो क्या प्रभु की माया है
आज तुम्हारे दरवाजे पर
राजीव जी का रथ आया है!
(ये कविता मदन कश्यप के किसी संग्रह में संकलित नहीं है।)







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