क्रिकेट के महामेला में 22 गज का देश

पंकज पचौरी

देश के दिग्‍गज पत्रकार पंकज पचौरी मोहल्‍ले में आपके सामने हैं, क्रिकेट में उलझी देश की दिलचस्‍प गुत्थियां लेकर। पंकज बता रहे हैं कि वर्ल्‍डकप के दौरान कैसे ये खेल देश का भाग्‍य विधाता हो जाएगा ? कैसे ये देश क्रिकेट का मैदान हो जाएगा और बाज़ार इसकी अंपायरिंग करेगा ? मोहल्‍ले में विमर्श के लिए पंकज के सवाल आपके सामने हैं। आप अपनी राय ज़ाहिर करें। सहमति-असहमति के तमाम बिंदुओं पर पंकज से सीधे बात करें, मोहल्‍ले की गलियों में।

वही एक गेंद है, दो बल्लेबाज हैं और ग्यारह फिल्डर हैं। अंदर आती गेंद पर फ्रन्ट फुट का डिफेंसिव शॉट है- बैक टू द बॉलर। तो फिर इतना हंगामा क्यों है? संसद में चर्चा क्यों है? प्रधानमंत्री की बधाई क्यों है? देश में दीवानापन क्यों है? उस देश में जहां हर चीज़ को खुले बाज़ार के हवाले किया जा रहा है, क्रिकेट के टेलीकास्ट को काबू में करने का नया क़ानून क्यों है? क्योंकि क्रिकेट अब 22 गज की पिच तक सीमित नहीं है। पूरा देश उसका मैदान है। ये खेल नहीं, धर्म है। धर्म का कारोबार है।

2003 के विश्व कप में क्रिकेट के सिर्फ 227 विज्ञापन थे। अब 324 हैं। चार साल पहले अपनी टीम पर विज्ञापनकर्ताओं ने 320 करोड़ रुपये लगाये थे। आज अपनी टीम पर नौ सौ करोड़ रुपये लगे हुए हैं। हर दिन पांच से छह हज़ार सैटेलाइट डिश बिक रहे हैं। विश्वकप खत्म होने तक सौ करोड़ रुपये के सैटेलाइट डिश बिक जाएंगे और साढ़े सात करोड़ घरों में सौरव और सचिन के जौहर पहुंचने लगेंगे। जब सिर्फ भारत और श्रीलंका के मैचों ने कौन बनेगा करोड़पति और क्योंकि सास भी कभी बहू थी को लोकप्रियता में पछाड़ दिया तो अब तो पूरे 16 देशों का मजमा है वेस्ट इंडीज़ में! चार साल पहले देश में औद्योगिक विकास की दर 7.4 फीसदी थी, अब 11.5 फीसदी है। साढ़े सात करोड़ घरों में जहां क्रिकेट पहुंचेगा, वहां अगले साल 15 लाख एसी खरीदे जाएंगे, 80 लाख मोटरसाइकिलें खरीदी जाएंगी, दस लाख मोटरगाड़ियां खरीदी जाएंगी, 25 लाख टीवी खरीदे जाएंगे और 40 लाख मोबाइल फोन खरीदे जाएंगे।

तो इस बार विश्व कप के मैचों के दौरान साढ़े सात घंटों के मैच में एक घंटा 15 मिनट सिर्फ विज्ञापनों पर खर्च किये जाएंगे ताकि आप और आपके घरवाले ये तय कर सकें कि उन्हें कौन सा मोबाइल, कौन सा टीवी, कौन सी कार, कौन सी मोटरसाइकिल और कौन सा एसी खरीदना है।

ये उपभोक्ता जनतंत्र है, जिसमें बाज़ार की डिक्टेटरशिप है। बाज़ार फैसला करेगा कि आप क्या देखें, क्या न देखें। बाज़ार ये दिखा कर माल नहीं बेच सकता कि 26 करोड़ जनता ग़रीबी की रेखा से नीचे रहती है, कि उड़ीसा में एक हज़ार में से 83 बच्चे पैदा होने से पहले ही मर जाते हैं, कि उत्तरप्रदेश में 25 फीसदी बच्चों को खसरे का टीका नहीं लगता। या बिहार के अररिया में साक्षर महिलाओं का प्रतिशत सिर्फ 11 फीसदी है। बाज़ार का काम ये नहीं है कि वो आपको बताये कि देश के साठ करोड़ किसानों की औसत आय उस टीवी की कीमत की एक तिहाई है, जिसे आप क्रिकेट प्रवचनों के बीच खरीदने की योजना बना रहे हैं।

क्रिकेट देश में पहले भी होता था, लेकिन बाज़ार ने उसे धर्म का दर्जा दे दिया है।

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