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आप कैसे बहस स्‍थगित कर सकते हैं?

प्रियंकर

तस्वीर में इतने प्रसन्नचित्त दिखते इरफ़ान इतने असंवेदनशील तो प्रतीत नहीं होते जैसे वे बहस स्थगित करते हुए दिख रहे हैं। अफ़लातून और मैं दोनों ही ब्लॉग और परिचर्चा के अन्तर्गत धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में लगातार बहस चलाते रहे हैं और साम्प्रदायिक सोच रखने वालों से लड़ते रहे हैं। पर हम को भी उनमें ही गिन लिया जाएगा ऐसा तो कभी ख्वाब में भी नहीं सोचा था। ऐसा लगता है अविनाश और उनकी मंडली के पास धर्मनिरपेक्षता का 'कॉपीराइट' है और दूसरा कोई धर्मनिरपेक्ष हो ही नहीं सकता बगैर उनसे इस आशय का सर्टीफ़िकेट लिये। यानी अपने शिकायती इरफ़ान चोर रास्तों से गुजर-गुजर कर भी (बकौल उनके मित्र अभय तिवारी) धर्मनिरपेक्ष हो गये और हम हमेशा सीधे लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष रास्ते पर चलते हुए भी साम्प्रदायिक हो गये वह भी महज इसलिये कि हमारी टिप्पणी के आसपास कुछ साम्प्रदायिक चरित्र की टिप्पणियां भी थीं।

भाई मेरे, मेरी टिप्पणी में क्या सांप्रदायिक था? सारा के प्रश्न को बिना 'कम्युनलाइज़' किये समझने की चेष्टा थी क्योंकि मेरा बेटा भी कुछ वैसी ही समस्या से गुजर रहा है। और मैं एक पिता के रूप में इरफ़ान के साथ 'आइडेन्टीफ़ाई' कर पा रहा था। पर दिक्कत यह थी कि मैं एक पिता के रूप में सोच रहा था और इरफ़ान पिता से कहीं अधिक एक मुसलमान के रूप में।

अगर धुरविरोधी के निकट एक आत्मविश्वास से भरा बेहतर इरफ़ान है तो आपको उससे भी शिकायत है। धुरविरोधी का इरफ़ान आपके इरफ़ान से बेहतर कैसे हो सकता है? अतः वह काल्पनिक और झूठा है। अगर प्रत्यक्षा के परिचय के दायरे में कोई सच्चा-शानदार इरफ़ान है तो वह आपके लिए बड़ी बेचैनी की बात है। आपको वह एक व्यक्ति की आपवादिक कथा प्रतीत होती है। और लगता ऐसे कितने लोग हैं?

सच्चा इरफ़ान तो वही हो सकता है जो धर्म की पतली गली से निकल कर शिकायतों के राजमार्ग पर आकर अविनाश की गाड़ी में लिफ़्ट ले ले। और उसके बाद प्रायोजित चर्चा हो जिसमें मित्र कथाकार-पटकथाकार एक-से-एक धांसू 'वेलस्क्रिप्टेड' पटकथाएं लेकर प्रकट हों और उसकी प्रतिक्रिया में पंकज बेंगानी को अपना मेलोड्रामा प्रस्तुत करने का अवसर मिले।

साम्प्रदायिकता के ये नये नमूने हैरानी में डालने वाले हैं। इरफ़ान सब बच्चो की दुहाई देते हैं और उसके तुरंत बाद इस पर आ जाते हैं कि सारा का दुःख विशिष्ट दुःख है और उसके सामने शुभंकर के दुःख के क्या मायने। मांसाहारी बच्चा यदि बहुसंख्यक समाज के दबाव में शाकाहारी बन जाये तो घोर अन्याय है और शाकाहारी बच्चा बहुसंख्यक के दबाव में मांसाहारी हो जाये तो कोई खास बात नहीं। यह उस आदमी का तर्क है जो अन्याय से दुखी है और आदर्श दुनिया गढने की बात करता है।

सांप अगर दूध नहीं पीता और ऐसा उस बच्चे को टीवी द्वारा अर्जित ज्ञान से पता है, अब अध्यापिका अगर गलत तथ्य उस बच्चे के सामने रखेगी तो बच्चा चाहे हिंदू हो या मुस्लिम चकराएगा ही। इरफ़ान भाई इसे भी साम्प्रदायिक नज़रिये से देखते हैं। और इसमें नागपंचमी और पंचांग का जिक्र बात में 'पंच' या 'इफ़ेक्ट' पैदा करने के लिये करते हैं। जो बात अवैज्ञानिक है वो है। उसे कोई भी धर्म कहे वह अवैज्ञानिक ही रहेगी।

मेरी टिप्पणी में इस बात के अलावा और भी बिंदु थे पर उन से इरफ़ान को क्या लेना-देना। उनकी तृप्ति के बिंदु दूसरे हैं। कमीज़ की सफ़ेदी वाले। मुझे उनका दुःख यशपाल की कहानी 'महाराजा का इलाज़' के महाराजा का-सा दुःख प्रतीत होता है, जिसमें बीमारी के वास्तविक इलाज़ की रुचि कम और बीमारी के गौरव और वैशिष्ट्य का बोध ज्यादा दिखाई देता है। हमारा दुर्भाग्य है कि धार्मिक हिंसा से भरे इस समय में धर्मनिरपेक्षता की फ़ायरब्रिगेडी गाड़ी इन दिनों पानी कम फ़ेंकती है और घंटी ज्यादा जोर से टनटनाती है।

चूंकि इरफान ने अपनी पोस्ट में मुझे संबोधित किया है, अतः मुझे लगा कि मेरा जवाब भी उन तक पहुंचना चाहिए।

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