ऐसे कहीं सद्-भाव बढ़ता है, जी!
जनार्दन भैया की पाती
पहले अशीष लो,
बहुतै खिन्न-मना कर दिया है तुमने। दरभंगा के बस में बाजूवाली सीट पर तुम्हें पहली दफा देख के खुशी हुई थी कि बिहार का नया चेहरा, नयी उम्मीद और जाने क्या-क्या देख रहे हैं। मगर पिछले आठ दिनों से देख रहे हैं बहुतै बदरंग चेहरा दिखाय रहे हो। छोटे-छोटे धंधों और छोटे सुखों के सहारे जीवन चलानेवाले, नेट पर कहीं रसभरा कोई कबित्त, दो चुटकुला पढकर सुखी रहनेवालों के बीच कैसा मनमुटाव और द्वेष भर दिया है तुमने। नाम ले-लेकर लोगों के नाक में दम किये हो। ऐसे सद्-भाव बढता है, जी?
मोहल्ला में आप तुलसी का पौधा रोपिये, नया ईंटा डलवा के सड़क पक्का कीजिये, और आप जो हैं कि और-और जमीन गोड़ के भाला और त्रिशूल निकलवा रहे हैं! और इतना टंटा फैलाके अब झुट्ठे बहस रोकने का ढोंग कर रहे हैं। रोकना ही था तो उसको रोकने के लिए बस तुमको एक इरफाने मिले थे? मसीजिवी, धुरविरोधी, प्रीतविरोधी किसी को आमंत्रित करते। मगर नहीं, तुमको तो अपनी ही ठसक लगी है- आइए, इरफान जी, आपै करिये सभा का समापन। और ये दांत दिखाये समापन कर रहे हैं। यहां इतना बखेडा फैल गया और इनको दांतचियारी सूझ रहा है! अ. श्रीवास्तव के जवाब में बाबू अ. तिवारी सहिये कमेंट किये कि इरफान चेत जावें। मगर ऊ त काहे ला चेतेंगे जबकि तुमहिंये नहीं चेत रहे हो। ई लेबल में कुल कितना टिप्पणी चढाये हो? बारह कि तेरह? और कमेंट अलग से? सोचे के हमारा कलेजा फट जाता है। प्रेम और धार्मिक शुद्धता का ऐसा अच्छा बयार बह रहा था, सबको तुम तूफानी मोड़ देकर जाने कौन अंधार में ले जाके चुपवा दिये। देख रहे हैं रिद्म आफ लाइफ चुपाये पडी हैं। प्रेम और पातियों के बहाव में जैसे शून्नता छा गई है। लोग गंभीर और सामयिक दिखने का चक्कर में रेल बजट और राजनीति वाले सहज मार्ग पर चले गये हैं। तुमरी वजह से ब्लाग जगत में बियाबानी सन्नाटा फैल गया है। लोग एक-दूसरा को देख रहा है कि ये मोहल्ला वाला इरफान के ओर हैं या धुरविरोधी के इरफान की पाल्टी में हैं। हमरा डायरेक्शन भी समझो बिगड़े गया है। सामान्य हो लें, तो ठीक तरीके से अब अगला हफ्ता ही बात करेंगे. हां, अच्छा किया कि बहस खतम किये। आगे कौन बहस का सूत्रपात करोगे- बाबूजी, रामचरण पांडे, सत्तप्रकाश और हमरी राय के बगैर मत शुरु करना। फिर गंडगोल फैलेगा। मुहल्ले का नुकसान होगा।
खुश रहो.तुम्हारा शुभाकांक्षी,
जनार्दन भैया







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