इति इरफान कथा अर्थात बहस स्थगित की जाती है
इरफान
सारा के स्कूली संस्मरण ने मोहल्ले वालों को बताया कि समाज में बहुत क़ायदे से भेदभाव है। लेकिन जो असहमत थे, उन्होंने लगभग चीखने के अंदाज़ में बताया कि सारा ग़लत बोल रही है। फिर कुछ समर्थन में भी उतरे। और इस पक्ष और विपक्ष का अंतहीन सिलसिला बनता गया। लेकिन लगता है कि बात कुछ लंबी खिंचती जा रही है, और बातों में दोहराव हो रहा है, इसलिए अब इसे स्थगित करते हैं। लेकिन चूंकि बहस की ज़मीन इरफान ने तैयार की थी, इसलिए आख़िर में वही इसका समापन भी कर रहे हैं।
अनिल इस्लाम मोटर्स पर सोचते हुए मैंने पिछले दिनों जो लाइनें लिखीं, उन पर इतनी हड़बड़ी में प्रतिक्रियाएं आएंगी मुझे नहीं मालूम था। मैंने जो बातें कहीं उनमें कोई नयापन या विचारोत्तेजकता का पहलू भी है, यह भी मैं नहीं मानता। मोहल्ले में पहले भी लोग आते और अपनी तरह से अपने अनुभवों और उद्-गारों का साझा करते रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। मोहल्लेवालों को भी यह बात समझ में आ रही होगी कि जिस सक्रियता और हस्तक्षेप की बानगी पिछले चार-पांच दिनों में दिखाई दी है, उसका संबंध एक ऐसी आबोहवा से है, जिसमें आत्मस्वीकार और आत्मान्वेषण के अंकुर नहीं फूटते और लगता है हम इसी आबोहवा में सांस भरना चाहते हैं।
आप सहमत होंगे कि एक निश्चित भौगोलिक-सांस्कृतिक परिवेश से अनुभवों की कुछ कतरनें मैंने पेश की हैं और मेरे ऑब्ज़र्वेशन्स आपके ऑब्ज़र्वेशन्स से हो सकता है मेल न खाएं। यारों ने जल्दबाज़ी और जि़म्मेदारी का एहसास करते हुए खुद को प्रस्तुत किया है। मैं सभी का आभारी हूं, जो मोहल्ले में आये अपनी अपनी तरह से हिमायत, हमदर्दी और लानतें भेजीं। इस बात पर अफ़सोस ज़ाहिर करने से मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूं कि अनिल इस्लाम के सरोकार मैं शायद ठीक ढंग से संप्रेषित नहीं कर पाया और आपकी प्रतिक्रियाओं से लग रहा है कि सांप्रदायिकता और उसके सामाजिक प्रभावों पर मैंने कोई बहस प्रस्तावित की थी। आप पूछने को आज़ाद हैं कि फिर मैंने क्या किया था?
मैं तो बस ये चाहता हूं कि हम सभी उस बनते हुए नये सामाजिक परिवेश पर दृष्टिपात करें, जो असावधानीवश एक धुंधलके में डूबता जा रहा है। बाज़ार और विकास की चकाचौंध में हम अपने बच्चों की दुनिया को लेकर थोड़े मुस्तैद हों। बात सिर्फ मेरे बच्चे की नहीं है, जिसके सामने भ्रमों और रुकावटों के लंगर डाले जा रहे हैं, बात सारे बच्चों की है, जिनके लिए हम जिज्ञासा और प्रगति के रास्ते उलझाव भरे बना रहे हैं। हां, ये भी सच है कि मैं इस विषय की जटिलता पर रोशनी डालने के लिए अपनी बेटी के अनुभव सामने लाया। इस तरह सामूहिक जि़म्मेवारियों का दायरा थोड़ा और विस्तृत होता है।
उदाहरण के लिए जब सोशलाइजेशन की प्रक्रिया में प्रियंकर का बेटा बंगाल में खान-पान के दबावों में मांसाहारी होता है, तब भी उसके सामने उसे पूरी कक्षा में अलगाव का सामना नहीं करना पड़ता। उसे उसके सहपाठी इस तरह नहीं देखते कि वह विधर्मियों और आक्रमणकारियों का प्रतिनिधि है। स्कूल आमतौर पर बच्चों में पस्तहिम्मती और नकारात्मकता को जन्म देते हैं, चाहे वे महंगे और अभिजात स्कूल हों या फिर सरकारी सस्ते स्कूल। मेरे एक दोस्त की पत्नी एक ऐसे ही नामी गिरामी स्कूल में नौकरी करती हैं और बताती हैं कि स्टाफरूम में अगरबत्तियां, साड़ियां, शेयर और पंचांग बेचे खरीदे जाते हैं। 'क्या सांप दूध पीते हैं?' एक दिन सारा ने अपनी मैम से पूछा था। 'हां, बिल्कुल, हम लोग नागपंचमी पर दूध नहीं पिलाते?' सारा चुप हो गयी थी और उसका पार्टनर और दूसरे बच्चे भी बाद में उससे कहने लगे 'अरे बुद्धू तुझे मालूम नहीं नागपंचमी में सांप को दूध पिलाया जाता है!'
'सिट डाउन' या टीचर के अनवेलकमिंग जेश्चर से शायद वह आगे कुछ पूछ नहीं पायी थी, जबकि टीवी पर उसने सुना था कि सांप दूध नहीं पीते। आप सोच सकते हैं कि इस सवाल पर टिके रहने से बच्चे की धार्मिक आस्थाएं बरामद होती हैं और इस तरह उसे उन नज़रों से भी देखा जाता है कि जिन नज़रों से प्रियंकर के बेटे को नहीं देखा जाता। हालांकि दोनों बच्चे आस्था, और इस तरह अज्ञान के भंवर में छोड़ दिये जाते हैं। स्कूल और घर दोनों जगह आज बच्चों को ऐसे माहौल में जीना है जहां उनके प्रश्नों को खुली हवा नसीब नहीं है।
'अनिल इस्लाम' लिखते हुए मैं यह कामना करता था कि अपने समाज की प्रगति की राह में पड़े हुए रोड़ों की तरफ आपका ध्यान आकृष्ट करूं ताकि हम और अधिक सजग रूप से अपने व्यवहार में सावधानी ला सकें। यारों ने इस ज़रूरी बात को ऐसे लिया, जैसे कि मुझे कोई हल चाहिए। हल मुझे क्यों चाहिए, हम सभी को क्यों नहीं चाहिए? गंगा एक पवित्र नदी तो है ही, वह हमें जल भी देती है। गंगा के प्रदूषण पर आंसू बहाये जाते हैं और अब तक उसकी सफाई पर हज़ारों करोड़ रुपये बरबाद किये जाते हैं। क्या गंगा को साफ़ रखना हम सब की ज़िम्मेदारी और गंगा को साफ़ मांगना हम सबका हक़ नहीं है? और क्या गंगा के प्रदूषण को ख़त्म कर देना बहुत पेचीदा काम है? क्या हम कह सकते हैं- 'मेरी मां को छेड़ा तो गोली मार दूंगा।'
उम्मीद है इस पोस्ट की अंतिम पंक्तियां आपको बदहवास और मरखना नहीं बनाएंगी, क्योंकि गंगा की सफ़ाई हिंदू और मुसलमान दोनों के हक़ में है।








0 comments:
Post a Comment