मुझे मुसलमान पसंद नहीं हैं!
इरफान
अनिल इस्लाम मोटर्स की पहली किस्त में इरफान भाई ने एक ऐसे दृश्य का वाक़या बताया, जो हमारे बीच कई बार सायास-अनायास मौजूद रहते हैं। इस किस्त में इस बार उन्होंने ऐसे दृश्यों के पीछे के अंधेरे को थोड़ा और साफ किया है।देश के सर्वोच्च पद पर आजकल एक मुसलमान बैठा है। हमारी गलियों में कश्मीर के नौजवान मुसलमान अपनी गठरियां उठाये शॉल और सूट के कपड़ों की फेरी लगा रहे हैं। छोटे छोटे मुसलमान शिल्पकार और उनके कारोबार ध्वस्त हो रहे हैं। प्रगतिशील कवियों ने अब उन्हें प्रजनन और हस्तमैथुन की मशीनें कहने काबिल भी नहीं समझा है। गुजरात में नरेंद्र मोदी ने एक आख़िरी लड़ाई में उन्हें अपदस्थ करके हिंदू संशयात्माओं को चैन की नींद दे दी है। हिंदू उदारवादी भी अब बेफिक्र हो गये हैं क्योंकि अब शहाबुद्दीनों ने अपने कोने तलाश लिये हैं। मदरसों को आइएसआई का अड्डा बता कर उन पर कड़ी निगाह रखी जा रही है। ज़रा अपने अपने कामकाजी अड्डों पर नज़र डालिए- कितने मुसलमान आपके साथ काम करते हैं? कालकाजी मंदिर को जाने वाली बस में कालका नहीं लिखा है जबकि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के नाम पर बने यमुना पुल का आधिकारिक नाम निज़ामुद्दीन पुल है। डेढ़ सौ बरसों से ज्यादा का समय यहां फूल वालों की सैर को गुज़र चुका है। पाठ्य पुस्तकों तक में इसे कौमी यकजहती (सांप्रदायिक सौहार्द) की मिसाल बताया जाता है जबकि यह इस काबिल भी नहीं कि इसकी बात की जाए। ऐसा क्यों हुआ, इसका ज़िक्र मोहल्ले में फिर कभी। फिलहाल...
इसे आख़िरी बार देख लो, जितनी स्वाभाविक और मौलिक वो अभी है, आगे कभी नहीं होगी। ये बात कहते हुए मुझे कई स्कूली बुराइयां मालूम थीं और जल्द ही हमारे होश ठिकाने लगाने की बातें आने लगीं। अपने टिफिन में वो एक दिन ऑमलेट ले गयी तो उसकी दोस्त ने कहा, 'अंडा खाएगी तो मुरगी बन जाएगी!' शाकाहार की वकालत और मांसाहार की आलोचना में यह बड़ा ही चुस्त फिकरा है। ज़ाहिर है यह फिकरा साढ़े तीन-चार साल के बच्चे खुद नहीं गढ़ सकते। सारा मुरगी नहीं बनना चाहती थी और अगले दिन से उसने अंडा ले जाना तो दूर खाना भी बंद कर दिया। जल्द ही अपनी मैम का संदेशा भी वो लायी- सबको सुबह उठ कर पूजा करनी चाहिए। 'मम्मी तुम क्यों पूजा नहीं करती?' उसका सवाल था। मोहल्ले में आम तौर पर बच्चे उसके साथ नहीं खेलते। सारा के अलावा इस मोहल्ले में कोई मुसलिम नहीं है। 'मुसलिम लोग बड़े गंदे होते हैं, वो बढ़ई होते हैं, कूड़ा उठाते हैं, दर्जी होते हैं। तू क्या है?' एक दिन सारा के साथ पढ़ने वाली एक लड़की ने पूछा। लौट कर उसने मुझे पूछा, 'पापा, हम हिंदू हैं कि मुसलिम?' अगले दिन से फ़रज़ाना ने ख़ास सवाधानी के साथ कपड़े धो धोकर पहनाने शुरू किये। बच्चे गंदा नहीं लगना चाहिए। पांच साल गुज़र चुके हैं और हमने अपने बच्चे को उसकी स्थायी पीड़ाओं से उबारने में खुद को लगातार असहाय पाया है। परसों जब उसकी पिकनिक कुतुब मीनार गयी तो मैम ने बताया कि कुतुब मीनार हिंदुओं का था, मुसलमानों ने आकर उसे हड़प लिया।मैं चाहता हूं आप मेरी बेटी के अनुभवों के आईने में देखें कि मुसलमान होना अस्वाभाविक विकास का साक्षी होना है। मेरी बेटी 'सारा' जब पहली बार स्कूल जाने लगी तो मैंने फ़रज़ाना से कहा-
'पापा मुसलमानों ने ऐसा क्यों किया? मुझे मुसलमान पसंद नहीं हैं, उनके फेस्टिवल भी कम होते हैं।'








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