Mohalla Live
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- कलाओं पर ये कैसा पहरा…?
- वो तो एक क़ातिल रात थी…
- पानोश साउथ एशिया के लिए टीवी पत्रकार ब्रज मोहन का चयन
- नंगई को यहां से देखो
- मीडिया वर्कशॉप में आज विनीत कुमार का व्याख्यान
| Posted: 01 Dec 2009 11:20 PM PST उत्तमा दीक्षित ♦ स्टूडेंट लाइफ में जब मैं न्यूड फिगर बनाती थी, तब अपने ही घर में मुझे लगता था कि सभी अच्छा फील नहीं कर रहे। हर सीखने वाले स्टूडेंट के साथ ऐसा ही होता होगा। न्यूड स्टडी करने के लिए किताबों का ही सहारा लेना पड़ता है चाहें वो मार्केट से ली जाएं या लाइब्रेरी से। स्टूडेंट को यह किताबें छिपाकर रखनी पड़ती हैं। डर ऐसा होता है कि कोई क्राइम कर रहा हो। मॉडल न्यूड हो या कपड़ों में, आर्टिस्ट के लिए महज एक आब्जेक्ट है। उसी तरह जैसे सामने कोई चीज़ रखी हो और उसका उसे चित्रांकन करना हो। जयशंकर प्रसाद की कामायनी पर पेंटिंग करने के दौरान जब मैंने श्रद्धा और मनु को कैनवास पर उतारा तो मुझे लगा कि कपड़ों के बिना दोनों पात्रों को ज़्यादा बेहतर अभिव्यक्त किया जा सकता है। ग्वालियर में इस सीरीज़ की पेंटिंग्स की एक्जीबिशन पर मैंने खूब हंगामा झेला। स्त्री होकर भी एक स्त्री को मैंने इस रूप में क्यों बनाया, यह सवाल मुझसे पूछा गया। मैं परेशान और दुखी थी। |
| Posted: 01 Dec 2009 10:21 PM PST नंगई को यहां से देखो विभा रानी ♦ अब या तो पश्चिम की देन कहिए या अपना बदलता नज़रिया, आज लड़कियां कम कपड़े में भी होती हैं, तो कोई उन्हें घूर-घूर कर नहीं देखता। Read the full story »ब्रज को फेलोशिप डेस्क ♦ पानोश साउथ एशिया के लिए टीवी पत्रकार ब्रज मोहन का चयन किया गया है। पानोश साउथ एशिया पूरे दक्षिण एशिया में एड्स और एचआईवी पर काम कर रहा है। Read the full story »परशुराम नागर ♦ आंखें इतनी तेज़ जल रही थीं कि रास्ते पर एक क़दम चलना मुश्किल था। जहां भी पानी दिखता, लोग आंखें धोने लगते। मैं बेहोश होकर सड़क पर गिर गया। नूर मियां ने मेरी जान बचायी। |
| पानोश साउथ एशिया के लिए टीवी पत्रकार ब्रज मोहन का चयन Posted: 01 Dec 2009 10:20 PM PST डेस्क ♦ पानोश साउथ एशिया के लिए एनडीटीवी के सीपीएच (चंडीगढ़-पंजाब-हरियाणा) स्टेट ब्यूरोचीफ ब्रज मोहन सिंह का चयन किया गया है। पानोश साउथ एशिया पूरे दक्षिण एशिया में पिछले 20 सालों से एड्स और एचआईवी पर काम कर रहा है। साल 2009-10 के लिए टेलीविज़न पत्रकारिता के लिए ब्रज मोहन को फेलोशिप दी गयी है। किसी भी हिंदी समाचार चैनल में काम कर रहे पत्रकार के लिए ये पहला मौका है, जब एड्स और एचआईवी जैसे संवेदनशील मसले पर काम करने का अवसर मिला है। एचआईवी के शिकार बच्चों पर डोक्युमेंट्री बनाने के अलावा इस फेलोशिप के दौरान एचआईवी से जुडे कई वैसे विषयों पर भी काम करने का अवसर मिला है, जिसे हम अक्सर 24 घंटे के टेलीविज़न चैनल में नज़रअंदाज़ कर जाते हैं। |
| Posted: 01 Dec 2009 05:42 PM PST विभा रानी ♦ आप कहते हैं कि इससे और भी व्यभिचार बढ़ेगा। दरअसल इससे नज़रिया और उदार हुआ है। हम बचपन में मेले ठेले में पान की दुकान पर फ्रेम मढ़ी तस्वीरें देखते थे, उन तस्वीरों में एक महिला या तो केवल ब्रा में रहती थी या उसे ब्रा का हुक लगाते हुए दिखाया जाता था। ये तस्वीरें इसलिए लगायी जाती थीं ताकि पान की दुकान पर भीड बनी रहे। लोग भी पान चबाते हुए इतनी हसरत और कामुक भरी नज़रों से उन तस्वीरों को देखते थे कि लगता था कि यदि वह महिला सामने आ जाए तो शायद वे सब उसे कच्चा ही चबा जाएं। मगर अब या तो पश्चिम की देन कहिए या अपना बदलता नज़रिया या महानगरीय सभ्यता, आज लड़कियां कम कपड़े में भी होती हैं, तो कोई उन्हें घूर-घूर कर नहीं देखता। |
| मीडिया वर्कशॉप में आज विनीत कुमार का व्याख्यान Posted: 01 Dec 2009 05:14 PM PST डेस्क ♦ टेलीविज़न का कोई सचमुच एक्टिव ऑडिएंस हो सकता है? दिल्ली विश्वविद्यालय से टेलीविजन की भाषिक संस्कृति पर शोध कर रहे विनीत कुमार सफर और सीएसडीएस सराय के संयुक्त प्रयास से हो रहे वैकल्पिक मीडिया वर्कशॉप (दिसंबर 01-03) में इन्हीं सवालों के आसपास अपनी बात रखेंगे। Watching Television : From Passive Consumption Of Sounds And Images To An Active Prosumer/Audience? विषय के तहत बातचीत के जरिये वो उन संभावनाओं की तरफ इशारा करेंगे जहां एक ऑडिएंस की हैसियत से टेलीविजन में भागीदारी की जा सके। इससे पहले इस वर्कशॉप में अभय कुमार दुबे, शिवम विज, दिलीप मंडल अपनी बात रख चुके हैं। |
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