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Mohalla Live

Mohalla Live


कलाओं पर ये कैसा पहरा…?

Posted: 01 Dec 2009 11:20 PM PST

उत्तमा दीक्षित ♦ स्टूडेंट लाइफ में जब मैं न्यूड फिगर बनाती थी, तब अपने ही घर में मुझे लगता था कि सभी अच्छा फील नहीं कर रहे। हर सीखने वाले स्टूडेंट के साथ ऐसा ही होता होगा। न्यूड स्टडी करने के लिए किताबों का ही सहारा लेना पड़ता है चाहें वो मार्केट से ली जाएं या लाइब्रेरी से। स्टूडेंट को यह किताबें छिपाकर रखनी पड़ती हैं। डर ऐसा होता है कि कोई क्राइम कर रहा हो। मॉडल न्यूड हो या कपड़ों में, आर्टिस्ट के लिए महज एक आब्जेक्ट है। उसी तरह जैसे सामने कोई चीज़ रखी हो और उसका उसे चित्रांकन करना हो। जयशंकर प्रसाद की कामायनी पर पेंटिंग करने के दौरान जब मैंने श्रद्धा और मनु को कैनवास पर उतारा तो मुझे लगा कि कपड़ों के बिना दोनों पात्रों को ज़्यादा बेहतर अभिव्यक्त किया जा सकता है। ग्वालियर में इस सीरीज़ की पेंटिंग्स की एक्जीबिशन पर मैंने खूब हंगामा झेला। स्त्री होकर भी एक स्त्री को मैंने इस रूप में क्यों बनाया, यह सवाल मुझसे पूछा गया। मैं परेशान और दुखी थी।


वो तो एक क़ातिल रात थी…

Posted: 01 Dec 2009 10:21 PM PST

नंगई को यहां से देखो

[2 Dec 2009 | Read Comments | ]
nude female by hussain front2 विभा रानी ♦ अब या तो पश्चिम की देन कहिए या अपना बदलता नज़रिया, आज लड़कियां कम कपड़े में भी होती हैं, तो कोई उन्हें घूर-घूर कर नहीं देखता। Read the full story »

ब्रज को फेलोशिप

[2 Dec 2009 | Read Comments | ]
braj mohan डेस्‍क ♦ पानोश साउथ एशिया के लिए टीवी पत्रकार ब्रज मोहन का चयन किया गया है। पानोश साउथ एशिया पूरे दक्षिण एशिया में एड्स और एचआईवी पर काम कर रहा है। Read the full story »
परशुराम नागर ♦ आंखें इतनी तेज़ जल रही थीं कि रास्ते पर एक क़दम चलना मुश्किल था। जहां भी पानी दिखता, लोग आंखें धोने लगते। मैं बेहोश होकर सड़क पर गिर गया। नूर मियां ने मेरी जान बचायी।


पानोश साउथ एशिया के लिए टीवी पत्रकार ब्रज मोहन का चयन

Posted: 01 Dec 2009 10:20 PM PST

डेस्‍क ♦ पानोश साउथ एशिया के लिए एनडीटीवी के सीपीएच (चंडीगढ़-पंजाब-हरियाणा) स्‍टेट ब्‍यूरोचीफ ब्रज मोहन सिंह का चयन किया गया है। पानोश साउथ एशिया पूरे दक्षिण एशिया में पिछले 20 सालों से एड्स और एचआईवी पर काम कर रहा है। साल 2009-10 के लिए टेलीविज़न पत्रकारिता के लिए ब्रज मोहन को फेलोशिप दी गयी है। किसी भी हिंदी समाचार चैनल में काम कर रहे पत्रकार के लिए ये पहला मौका है, जब एड्स और एचआईवी जैसे संवेदनशील मसले पर काम करने का अवसर मिला है। एचआईवी के शिकार बच्चों पर डोक्युमेंट्री बनाने के अलावा इस फेलोशिप के दौरान एचआईवी से जुडे कई वैसे विषयों पर भी काम करने का अवसर मिला है, जिसे हम अक्सर 24 घंटे के टेलीविज़न चैनल में नज़रअंदाज़ कर जाते हैं।


नंगई को यहां से देखो

Posted: 01 Dec 2009 05:42 PM PST

विभा रानी ♦ आप कहते हैं कि इससे और भी व्यभिचार बढ़ेगा। दरअसल इससे नज़रिया और उदार हुआ है। हम बचपन में मेले ठेले में पान की दुकान पर फ्रेम मढ़ी तस्वीरें देखते थे, उन तस्वीरों में एक महिला या तो केवल ब्रा में रहती थी या उसे ब्रा का हुक लगाते हुए दिखाया जाता था। ये तस्वीरें इसलिए लगायी जाती थीं ताकि पान की दुकान पर भीड बनी रहे। लोग भी पान चबाते हुए इतनी हसरत और कामुक भरी नज़रों से उन तस्वीरों को देखते थे कि लगता था कि यदि वह महिला सामने आ जाए तो शायद वे सब उसे कच्चा ही चबा जाएं। मगर अब या तो पश्चिम की देन कहिए या अपना बदलता नज़रिया या महानगरीय सभ्यता, आज लड़कियां कम कपड़े में भी होती हैं, तो कोई उन्हें घूर-घूर कर नहीं देखता।


मीडिया वर्कशॉप में आज विनीत कुमार का व्‍याख्‍यान

Posted: 01 Dec 2009 05:14 PM PST

डेस्‍क ♦ टेलीविज़न का कोई सचमुच एक्टिव ऑडिएंस हो सकता है? दिल्ली विश्वविद्यालय से टेलीविजन की भाषिक संस्कृति पर शोध कर रहे विनीत कुमार सफर और सीएसडीएस सराय के संयुक्त प्रयास से हो रहे वैकल्पिक मीडिया वर्कशॉप (दिसंबर 01-03) में इन्हीं सवालों के आसपास अपनी बात रखेंगे। Watching Television : From Passive Consumption Of Sounds And Images To An Active Prosumer/Audience? विषय के तहत बातचीत के जरिये वो उन संभावनाओं की तरफ इशारा करेंगे जहां एक ऑडिएंस की हैसियत से टेलीविजन में भागीदारी की जा सके। इससे पहले इस वर्कशॉप में अभय कुमार दुबे, शिवम विज, दिलीप मंडल अपनी बात रख चुके हैं।


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आखि़र कैसे तय हों औरत-मर्द के प्राकृतिक गुण-दोष ?



और माफ़ कीजिए, मैं इस आधार पर किसीके बारे में अपनी राय नहीं बना सकता कि उसे रवींद्रनाथ टैगोर या बर्नार्ड शा पसंद करते थे कि नहीं करते थे। मैं किसी को पढ़ता हूं तो सीधे-सीधे पढ़ता हूं। मुझे एक लेखक की कोई बात जम रही है मगर चूंकि जयशंकर प्रसाद या अरुंधति राय को नहीं जमी इसलिए मैं भी विरोध करुं, मेरी समझ से कतई बाहर है।

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http://www.youtube.com/watch?v=Z4twQ2-glGQ

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युवा दखल: कितना बर्दाश्त करेगा दलित?

युवा दखल: कितना बर्दाश्त करेगा दलित?

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सिस्टम ,सोसाइटी और सहमे शहर -26/11


-आवेश तिवारी



हम मुंबई में घटित २६/११ के आतंकी हमले की बरसी मना रहे हैं ,मोमबत्तियां जला रहे हैं ,मर्सिया पढ़ रहे हैं ,और यह सब कुछ यह मानते हुए कि इस देश में कभी भी कहीं भी २६/११ जैसी घटनाएँ हो सकती हैं |जब सिस्टम का आम जनता से कोई वास्ता नहीं रह जाता तब सिर्फ और सिर्फ मर्सिया ही किया जा सकता है ,जब प्रजा का विश्वास राज्य की व्यवस्था पर नहीं रह जाता, तब वही होता है जो आज हिंदुस्तान में हो रहा है |क्या इस बात पर जिन्दा कौमें यकीन करेंगी कि जिस शहर में, जिस राज्य में सैकड़ों बेगुनाहों को आतंकियों ने भून डाला था उसी शहर ,उसी राज्य में एक विक्षिप्त जिसकी अब विधान सभा में भी भागीदारी है कभी भाषा तो कभी धर्म के नाम पर आम आदमी को आम आदमी के विरुद्ध खड़ा करने में सफल हो रहा था ,और सत्ता के दावेदारों के साथ- साथ हम -आप अपना चेहरा नयी नवेली दुल्हनों की तरह छुपाये मुस्कुरा रहे थे |क्या इस बात पर यकीन किया जा सकता है कि २६/११ की बरसी से महज चंद दिनों पहले देश में हिन्दुओं के ठेकेदार सीना ठोककर बाबरी मस्जिद गिराए जाने को गर्व का विषय बता रहे थे ,जी हाँ ,ये वो घटना थी जिसने हिंदुस्तान में मुस्लिम फिरकापरस्ती की नयी फसलें पैदा की हैं | आज देश को तो सत्ता ही कानून व्यस्था और ही मीडिया चला रही है वस्तुतः देश को देश की सामाजिक व्यवस्था चला रही है |कहा जा सकता है सरकार से पूरी तरह निराश,नाराज और असंतुष्ट आम जनता का सामाजिक सम्बंध ही देश को और इस बेहद अविश्वश्नीय सिस्टम को जीवित रखे हैं |व्यवस्था या सिस्टम शब्द का एक अर्थ यह है कि अच्छे विचारों और परिकल्पनाओं पर संगठित सरकार ,सिस्टम शब्द का हिन्दुस्तानी अर्थ ये भी है कि यह वो कार्यप्रणाली है जिसे हम चाहकर भी नहीं बदल पाते ,अपने देश में व्यवस्था और सिस्टम की व्यापकता में सिर्फ सरकार ही नहीं सभी राजनैतिक ,आर्थिक ,सामाजिक ,धार्मिक ,सांस्कृतिक ताकतें जाती हैं |फिलहाल हिन्दुस्तान में सर्वशक्तिमान सिस्टम ही है ,इस सिस्टम ने तानाशाही को लोकतंत्र के सांचे में ढालने की तरकीब सीख ली है यह वह प्रणाली है ,जिस पर देश की आम जनता को भरोसा नहीं है ,लेकिन फिर भी वो ख़ामोश है |


२६/११ के सन्दर्भ में कुछ ताजा उदाहरण महत्वपूर्ण है |हरकत उल जेहाद अल इस्लामी का मास्टर माइंड शहजाद उत्तर प्रदेश में कहीं गुम है ,पिछले दिनों पाकिस्तानी मूल के आतंकी टी हुसैन राजा और डेविड हैडली को इटली से ,और आतंकियों के मोबाइल में पैसे भेजने वाले मोहम्मद याकूब जंजुआ और उसके बेटे आमेर याकूब को विदेशों में पकड़ा गया |इंग्लॅण्ड के शहर वेस्ट मिनिस्टर में चार आतंकी पकडे गए |गृहमंत्री कहते हैं कि जस्टिस लिब्राहन की बाबरी मस्जिद विध्वंस वाली रिपोर्ट की सिर्फ एक प्रति है ,जो गृह मंत्रालय के पास है ,तब रिपोर्ट कैसे लीक हो गयी ?कहा है इन्टेलीजेन्स?कहाँ है आतंक के खिलाफ भुजाओं का जोर ?कहाँ हैं देश को देश बनाये रखने की राजनैतिक इच्छाशक्ति ?जानते हैं ?इन सभी विफलताओं इन सभी कमियों की सिर्फ और सिर्फ एक वजह है आम आदमी का सिस्टम में विश्वास न होना |यकीन करें न करें मगर कभी भी कहीं भी किसी भी वक़्त एक और २६/११ पैदा हो सकता है ,फिर कोई आम्टे मरा जायेगा ,फिर किसी करकरे की शहादत होगी ,फिर न जाने कितनो की आँखें कभी न ख़त्म होने वाला इन्तजार बना रहेगा |ये सब सिर्फ इसलिए की सिस्टम और आम आदमी के बीच की दूरी दिन प्रतिदिन और भी बढती जा रही है |जो आम आदमी अपने हिस्से की रोटी न मिलने के बावजूद उफ़ नहीं करता वो भला पडोसी के गम की साझेदारी , क्यूँ करेगा ?हाँ ,ये इंसानियत नहीं है ,ये विश्वासघात है ,ये देशद्रोह है फिर भी वो करेगा,जिस वक़्त ,जिस दिन मुंबई में समुद्र के किनारे करांची के रास्ते पहुंचे आतंकियों के बारे में मल्लाहों ने स्थानीय प्रशासन को सूचना न देने का फैसला किया था उस वक़्त ,उस दिन भी सिस्टम से दूरियां थी ,आज भी हैं |
आज भी देश के नगरों ,महानगरों की ३० फीसदी आबादी अपने चक्कर में व्यस्त है ,वह कदापि जोखिम नहीं लेना चाहती ,उसके पास डयूटी,व्यापार,बीबी बच्चों और बाजार के बाद घाटों पर दीप , स्मारकों पर मोमबत्ती जलाने और शोकसभा करने की फुर्सत है ,उसके लिए देशभक्ति भी फैशन है |मुझे ये कहने में कोई गुरेज नहीं है कि आज धार्मिक ,सांस्कृतिक,पाखण्ड ,जाति भाषा और संप्रदाय के कलह में आम जनता की भागीदारी भी सिस्टम की विफलता का कारण है |सिस्टम की विफलता का प्रतीक वो ५५-६०करोड़ लोग है जो रोजी रोटी ,कपडा,घर,दवाई,के ही जुगाड़ में जीते मरते हैं ,इन्हें जिस दिन भरपेट भोजन और नींद भर आराम मिल जाता है उस दिन वे स्वय को सौभाग्यशाली मान लेते हैं , इस बड़े मेहनतकश वर्ग के प्रति सिस्टम संवेदनही है ,अन्याय भी गरीब के साथ ही होता है ये कोई सुचना इसलिए नहीं देते क्यूंकि पुलिस उल्टे इन्हें ही फंसा देती है ,हमने नक्सल प्रभावित राज्यों में पाया कि जहाँ गरीब के घर नक्सली जोर जबरदस्ती करते हैं वहीँ पुलिस भी उन्हें परेशान करती है |वह करें तो क्या ?पुलिस की सूचना नक्सली को दे या नक्सली की सुचना पुलिस को दे उन्हें मरना ही पड़ता है ,वे होंठ सी लेते हैं ,सिस्टम पर उन्हें विश्वास नहीं |प्रसंगवश नक्सलियों को रोकने के लिए हाई फाई सुरक्षा बंदोबस्त करने वाला सिस्टम..आदिवासियों की सुरक्षा तो दूर ,उन्हें लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से ही बाहर कर देता है .बैलेट का हक़ छिनकर बूलेट से मुकाबले की उम्मीद सिस्टम करता है तो सच्चाई पर पर्दा डालता है |
देश राष्ट्र,भारत माता के प्रति सिर्फ आंसू नहीं ,पसीने और रक्त की निष्ठा होनी चाहिए ,गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के जो लड़के लड़कियां फ़ौज -सुरक्षाबल में नौकरी करते हैं ,और जो आम आदमी संवेदनशील हैं वही विश्वसनीय रह गए हैं ,जिस दिन व्यवस्था और जनता के सपने एक होंगे ,उसी दिन २६/११ की चिंताएं ख़त्म हो जाएँगी |मर्सिया पढने से बेहतर है अपने मन में देश प्रेम की भावना की ज्योति पैदा करें |अन्यथा ये हकीकत है कि अन्याय,गैरबराबरी , राजनैतिक स्वार्थपरता और भ्रष्टाचार ने देशवासियों की सोच के साथ साथ समर्पण की राष्ट्रीय भावना पर धूल की मोटी परत जमा दी है |ये परत जितनी मोटी होती जाएगी उतने ही २६/११ पैदा होते रहेंगे |

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मोहे अगला जनम ना दीजो-2

अब उसमें और जगजीत सिंह में कोई फ़र्क नहीं। साथ-साथ बैठे कोरस गा रहे हों जैसे।


खुले में जितना छुपना पड़ता है, बंद में ख़ुदको उतना ही खोल देना चाहता है सरल।

‘‘मैं भी कुछ हंू, देखो कितनी कलाएं हैं मुझमें, सुनो...!’’

कैसी है ख़ुदको अभिव्यक्त करने की यह जानलेवा छटपटाहट !?

क्या बाहर कोई मुझे सुन रहा होगा !

‘‘मोहल्ले की सबसे पुरानी निशानी.......’’



एकाएक कुछ याद आ जाता है सरल को। कोई चीज़ है जो कचोट रही है भीतर से।



यह किसके बचपन के बारे में बात चल रही है आखि़र ! ऐसा क्या था जिसे लौटाने के लिए दुआएं, प्रार्थनाएं हो रही हैं ! गिड़गिड़ाया जा रहा है ! होगा यह जगजीत सिंह का बचपन। होगा यह तलत अजीज़ और सुदर्शन फ़ाकिर का बचपन। सरल क्यों इसके गुणगान में इस कदर लीन है !
 
 


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अयोध्या 'सड़ी दाल में घी का तड़का'

बाबरी मस्जिद

इतनी हाय तोबा मचाने की ज़रूरत नहीं है जो होना था हो चूका है उसके बाद खून की गर्मी निकालने वाले गर्मी भी निकाल चुके हैं कानून बघारने वाले कानून बघार चुके हैं और नोट कमाने वाले नोट कमा रहे हैं वोट कमाने वाले वोट कमा रहे हैं रही बात मस्जिद या मंदिर की तो जब ईमान ही यहाँ मुर्दा है तो खुदा के घरों के होने या न होने की बात कोई मायने नहीं रखती 'मरी इंसानियत' को ढोते-ढोते हम बच्चे से जवान हो गए अब इतने सालों बाद फिर से वही खेल शुरू हुवा शायद अबकी बार हमारे जवानी के कंधे इसको बुढ़ापे तक ढोएंगे क्या करें आदत सी पड़ चुकी है जस्टिस लिब्राहन तो बेचारे फुटबाल बन गए मार्च १९९२ से लेकर अब तक जो भी सत्ता में आया अपने हिसाब से किक करता रहा है और अब देखिये बेचारे की ऐसी किरकिरी हुई की पूरी तरह से बुढ़ापा ख़राब हो गया लोग सवाल करते हैं की १६ साल ये जांच क्यूँ चली लेकिन किसी ने जाँच की रिपोर्ट जो ३ महीनो में देनी थी जब पूरी नहीं हुई तो सरकार से सवाल क्यूँ नहीं किया क्यूँ पंजे वाली सरकार को कटघरे में नहीं खड़ा किया या उसके बाद कमल वालों को क्यूँ नहीं जाँच पूरी करने के लिए बोले सीधी सी बात है हर कोई अपनी अपनी रोटियां सेंक रहा था अब जब सब कुछ भुला कर लोग फिर से देश और विकास की बात करने लगे हैं तो फिर से वही सब शुरू किया जा रहा है और इसको शुरू करने में देश को खोखला करने वाले सबसे बड़े दल ने फिर से पहेल की है जब रिपोर्ट मिल चुकी थी तो उसको संसद में पेश करने के बजाये हमेशा की तरह संसद के बाहर ही बहस शुरू कर दी इसके पीछे क्या है किसी से छुपा नहीं अब देखना है की अयोध्या को फिर से अशांत करने की कोशिश कितना रंग लाती है और मुर्दा हो चुके तथाकथित देशभक्त संगठनों को संजीवनी देने वाला ये काम देश को फिर से कितने पीछे धकेलता है कितने घोटाले इसके पीछे दबे रह जायेंगे कितने भ्रष्टाचारी आसानी से जनता की आँखों के सामने से निकल जायेंगे लेकिन हमें इनसे क्या मतलब हमको फिर से मौका जो मिलेगा अपनी अपनी रोटियां सेंकने का,
यहाँ कौन नहीं जनता की न मंदिर बनने वाला है न ही मस्जिद क्यूंकि जैसे ही इनमे से कुछ भी बना सब पहले जैसा हो जायेगा और इन राजनितिक दलों के चकलाघरों में चढ़ावा आना बंद हो जायेगा ये ऐसा कभी नहीं होने देंगे बस सवा अरब आबादी में से चंद हज़ार इनके दिखाए रास्ते पर चलके कटते मरते रहेंगे और पूरे देश को अशांत किये रहेंगे.........,
क्या कोई ये भी जानना चाहेगा की अयोध्या को क्या चाहिए क्या किसी ने अयोध्या के मर्म को भी समझने की कोशिश की है क्या आस्था के नाम पर धर्म को पैरों तले रौंदती ये अंधों की भीड़ कभी ये समझ पायेगी की उसने शांत,शीतल, पवित्र अयोध्या को पूरे संसार में किस रूप में प्रचारित कर दिया है अपने ही देश में अपने ही लोगों के बीच अयोध्या असुरक्षित सी है सिसकती सी डरी सहमी सी अयोध्या अपनों के लहू से लहू-लुहान अपनों के दिए ज़ख्मो को नासूर बनते ख़ामोशी से देख रही है आखिर अपनी व्यथा सुनाये भी तो किसको यहाँ तो हर तरफ व्यापारी घूम रहे हैं जिनका धर्म बस एक है धन और सिर्फ धन.......शायद अब पहेल करने की बारी हम सभी की है अयोध्या को इन व्यापारियों से आजाद कराने की......

आपका हमवतन भाई ...गुफरान सिद्दीकी (अवध पीपुल्स फोरम अयोध्या,फैजाबाद)

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DIL ka RAJ: गरीबी ने पैदा किए हैं लालगढ़ की समस्याएं

DIL ka RAJ: गरीबी ने पैदा किए हैं लालगढ़ की समस्याएं

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क्या आपका फोन चोरी नही हुआ



उमेश पंत

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सिट यार फोन चोरी हो गया। घर आकर बताया तो भाई लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट तैर आई। पहली बार जब घर आकर बताया था तो ऐसा नहीं हुआ था। तब सबको लगा था कि हां कुछ चोरी हो गया। ऐसा होना नहीं चाहिये था। कैसे कोई फोन चोरी कर सकता है। जेब से निकाल कैसे लिया फोन। ब्ला ब्ला...तब घर वालों ने बड़ी जिज्ञासा दिखाई थी फोन चोरी होने की घटना के बारे में। घर में पहला फोन जो चोरी हुआ था। मुझे भी सदमा सा लगा था। जैसा पहले पहले प्यार के न मिलने या समय के साये में खो जाने पर लगता है। क्योंकि फोन केवल फोन कहां होता है अब। उसमें कई यादें होती हैं। उसकी कौल लिस्ट में, उसके मैसेज बौक्स में। उसके मीडिया सेन्टर में। कितने तो कौन्टेक्ट जो आप रेंडम तरीके से फीड कर लेते हैं। एक नाईस टू मीट यू के बाद। कैन आई हैव युअर नम्बर का आग्रह करके आपको अंकों का एक जखीरा सा मिलता है। माने ये कि आप चाहें तो उससे जुड सकते हैं। जिससे मिलने में आपको अच्छा लगा था और आपने अभी अभी कहा भी था। कभी किसी ट्रेन में, बस में, चलते हुए रास्ते में, बस का इन्तजार करते किसी स्टाप में, किसी सेमिनार में, शादी या किसी फंक्शन में। ऐसे कई नम्बर जुटा तो लेते हैं आप पर कहीं और नोट नहीं करते। आपकी सिम आपका दिमाग हो जाती है। कम से कम मेरा तो थी ही। मुझे अपने पापा, मम्मी, भाई किसी का भी नम्बर याद नहीं है। जब घर में एक लैंडलाईन फोन होता था कैसे तो सारे नम्बर याद रह जाते थे। ये राहित का, ये सोनी का, ये प्रंिसिपल सर का ये फंलां का.....लेकिन अब अपना नम्बर याद करने में भी कन्फयूजन होने लगा है कि ये नम्बर फोन चोरी होने से पहले वाला है या बाद वाला। खैर मैं बात कर रहा था होम औडियन्स रिएक्शन की। जब फोन चोरी होने की घटना घर में सुनाई तो भैया का रिएक्शन था- चलो भई तेरा और भाई का स्कोर दो दो हो गया। और हम लोग अभी 2 1 से पीछे हैं। किसी को घटना सुनने में भी कोई खास इन्टेªस्ट नहीं था कि आंखिर कैसे हुआ ये सब। कुछ वैसे ही जैसे आजकल ब्लास्ट होने के बाद होता है। अच्छा हो गया। ये तो होना ही था टाईप्स।
लेकिन मुझे याद नहीं है कि मेरे फोन चोरी हो जाने के बाद मेरा रिएक्शन टाईम दो सेकंड का भी रहा हो। मैने किसी को फोन किया, फोन वापस जेब में रखा और हाथ बाहर निकालने तक फोन चोरी। और चोरी हो जाने के बाद एक नागरिक होने के नाते मेरे अधिकार यहीं तक सीमित हैं कि मैं थोड़ा सा शोर मचा लूं। और यहां आकर ब्लाग पर कुछ लिख लूं। इसी आशा के साथ कि शायद ही इससे कुछ हो। लेकिन बात क्या यहीं खत्म हो जानी चाहिये कि दो सेकंड की ही सही लापरवाही मेरी थी। वो तो चोर थे। उन्हें पूरा हक है कि वो चोरी करें। और उन्होंने अपने अधिकार का प्रयोग कर जो किया वो सही किया। आंखिर वो भी लोकतंत्र में पूरी भागीदारी रखते हैं। पुलिस उनकी इस कला का पूरा सम्मान कर उनके साथ खड़ी रहेगी। आंखिर कैसी तो सफाई से अपने काम को पूरी निष्ठा से अंजाम देते हैं ये चोर कि दो सेकंड के रिएक्शन टाईम के बावजूद हमें पता नहीं चल पाता कि चोरी किसने की। बसों में फोन चोरी की ये वारदातें इतनी आम हो गई हैं जितने आजकल आम के सीजन में आम नहीं होते।
हर दिन दिल्ली की बसों में कई फोन चोरी होते हैं और हम कुछ नहीं कर पाते सिवाय उदास होने के। लेकिन ऐसा नहीं है कि ये मोबाईल चोरी करने वाले लोग इतने विलुप्त प्रकार के प्राणी हैं जिन्हें पकड़ा ही नहीं जा सकता। इनका बाकायदा अपना रैकेट है। एक बस में कम से कम पा्रच छह लोग एक साथ चढ़ते हैं। सामान्य से यात्रियों की तरह। इनमें से कुछ लोग चोरी करते हैं और कुछ ध्यान बटाने का काम। अक्सर चोरी करते ही ये लोग उतरकर भाग जाते हैं। और पता चलने तक बस स्टाप से आगे बढ़ चुकी होती है। जब तक आप अपना नम्बर किसी और के फोन से डायल करते हैं आपका फोन स्विच आफ किया जा चुका होता है। लेकिन कई बार लोगों को पता चल भी जाता है। ऐसी स्थिति में या तो ये लोग फोन बस में ही गिरा देते हैं या फिर चाकू या किसी धारदार हथियार से आप पर हमला तक कर देते हैं। अब सवाल ये है कि इन लोगों की हिम्मत इतनी बढ़ कैसे जाती है। जवाब साफ है। आप पुलिस के पास जाते हैं कि आपका फोन चोरी हो गया तो पुलिस आपसे यही कहती है कि गलती और लापरवाही दोनो आपकी है। अगली बार से ध्यान रखें। उल्टा आपको दो चार नसीहतें देकर पुलिस अपना पल्ला झाड़ लेगी। क्या पुलिस को कोई ऐसा सिस्टम नहीं बनाना चाहिये जिससे फोन चोरी करने वाले इस रैकेट का परदार्फाश किया जा सके। पुलिस की ओर से क्या ऐसी कारवाईयां नहीं होनी चाहिये कि इन चोरों की नाक में दम किया जा सके।
ऐसा क्या हो सकता है। मेरे खयाल से कुछ समाधान हैं इसके लिये। पुलिस चाहे तो जैसे डीटीसी टिकट चेक करने के लिए टिकट चेकर्स को नियुक्त करती है ऐसे ही कुछ पुलिस वाले सादी वर्दी में बसों में औचक निरीक्षण करें। बस के पूरे एक चक्क्र में वो ऐसे इलाकों पर खास ध्यान रखें जहां अक्सर चोरी की वारदातें होती हैं। ऐसे समय में बसों में छापे मारे जांए जब बसों में बहुत भीड़ रहती है। सुबह साढ़े आठ से ग्यारह बजे और शाम को चार बजे से आठ या नौ बजे इन बसों के लिए रस आवर्स होते हैं। इस समय सबसे ज्यादा भीड़ बसों में रहती है। नौएडा मोड़, आईटीओ, ओखला मोड़, राजघाट, लक्ष्मीनगर सहित अन्य सारे इलाकों में कड़ाई से छापे मारे जांयें जहां चोरी की वारदातें ज्यादा होती हैं।
लोग अपने फोन के आईएमईआई या इन्टरनेश्नल मोबाईल इक्विप्मेंट आईडेंटिटी नम्बर को अपने पास रखें। ये नम्बर आपकी बैटरी के पीछे लिखा होता है और इसे आप फोन पर स्टार हेस 06 हेस टाईप करके भी पता कर सकते हैं। ये नम्बर आजकल मोबाई नेटवर्क को ट्रेस करने के लिये प्रयोग किया जाता है। इस नम्बर को नोट कर अपने पास रखें। और फोन चोरी हो जाने पर पुलिस को सूचना दें। पुलिस चाहेगी तो आपकी मदद करेगी। नहीं चाहेगी तो भगवान मालिक।
खैर दूसरा फोन चोरी होने के बाद ये खतरा उठाते हुए कि आप लोग मुझे लापरवाह कहेंगे मैं अपनी बात ब्लौग के माध्यम से कह रहा हूं। इस आशा से कि एक ऐसा सिस्टम पुलिस या प्रशासन तैयार करे जिसमें फोन चोरी पहले तो न हो और यदि हो जाये तो ऐसे चोरों को पकड़ा जा सके। क्योंकि अभी जो हालात हैं उनमें फोन चोरी होना उसी तरह हो गया है। जैसे मैं कहूं आज पता है क्या हुआ मैने अपने लिए पालिका से जैकेट खरीदी, कालेज में मैने एक स्टूडियो प्रोग्राम बनाया, कैंटीन में बिरियानी खाई, ठंड होने लगी है, दिन में धूप सेंकने में बड़ा मजा आने लगा है, मैने दिन की पंाच चाय पी और हां आज भी मेरा फोन चोरी हो गया। हा हा हा।

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